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 संस्कृत / हिंदी ग्रंथ यहां उपलब्ध हैं  / Sanskrit/ Hindi texts are available here   

 

We are happy to announce that the Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture is being organised on September 28, 2017, at the India International Centre (Annexe), Lodhi Road. The Programme will start at 2.30 pm. You are cordially invited. 

 


RELEASING SOON!

BHARATAVARSHA-THE INDIA NARRATIVE as told in Indravijayah by Pandit Madhusudan Ojha. 
Publisher: Rupa & Co, New Delhi
October 2017

 

Madhusudan OjhaBHARATAVARSHA--THE INDIA NARRATIVE is the much-awaited translation of Pandit Madhusudan Ojha's magnificient work on creation, life and Bharatavarsha. It is a book within books, of stories within a story, of worlds that are within and outside.On first reading, it is the story of Bharatavarsha. But more than that it is the story of Bharatavarsha in the configuration of the continents, the world’s peoples, and their location in the brahmanda. It is thus a fascinating account of how a vast geographical expanse is integrated by cosmic awareness. Rivers and mountains criss-cross the landscape of this dramatic story, livened up by great and colourful races and individuals. Read more

 

 पण्डित मधुसूदन ओझा वैदिक वाङ्मय के अत्यन्त प्रसिद्ध विद्वान् थे। उन्होंने वर्षों वेद, वेदाङ्ग, इतिहास, पुराण, दर्शनशास्त्र आदि का अध्ययन मनन  करने के बाद अपने ग्रन्थों का प्रणयन किया था। ओझाजी ने अपने ग्रन्थों का पाँच खण्डों में विभक्त किया है- ब्रह्मविज्ञान, यज्ञविज्ञान, इतिहास,  वेदाङ्गसमीक्षा एवं आगमरहस्य।ब्रह्मविज्ञान विषय को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करने के लिए ब्रह्मविज्ञान को सात भागों में विभाजित कर प्रतिपाद्य  का निरूपण किया है। ब्रह्मविज्ञान का प्रथमभाग ‘दिव्यविभूति’ है। इस विषय के विवेचन के लिए ओझा जी ने पाँच ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें  इन्द्रविजय एक प्रमुख ग्रन्थ है।


National Seminar on Chhandasamiksha was organised jointly by Delhi University and Shri Shankar Shikshayatan at Delhi University on August 19, 2017. 

seminar on chhandhasamiksha

national seminar on chhandhasamiksha

 

 

 

 

 

 

 

 

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READ THE CONCEPT NOTE  AND  THE INVITATION CARD FOR PROGRAMME DETAILS

READ Pandit Madhusudan Ojha's treatise Chhandasamiksha.

 


 

V E D I C  T E R M S

वैदिक पारिभाषिक शब्द

 

Rasa

The term `rasa` has many meanings, some very profound, others more ordinary and popular. But all these different meanings derive from the foundational definition of rasa--one of the two building blocks of Creation. Without rasa, no creation is possible. In Vedic vijnana, rasa is the basic element by which creation takes place; rasa is abhu. Hence, there is considerable reference to rasa in the Vedic texts. Pandit Madhusudan Ojha has explained this meaning of rasa in great depth in Brahmavinaya, Brahmasamanvya, Brahmachatushpadhi and Sharirikavijnana. Read more here.

 रस

जगत् की रचना में रस एक मूल तत्त्व है। इसी रस तत्त्व से सृष्टि होती है। जिस प्रकार अद्वैतवेदान्त दर्शन में ब्रह्म, सांख्य दर्शन में पुरुष और न्याय दर्शन में परमाणु मूलतत्त्व कारण के रूप में वर्णित है। उसी प्रकार वैदिकविज्ञान में रस का मूलतत्त्व के रूप में अथवा कारणरूप में वर्णन मिलता है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार रस् धातु से अच् प्रत्यय होकर रस शब्द निष्पन्न होता है। रस का शाब्दिक अर्थ है किसी वस्तु का साररूप ।यह लोक में प्रसिद्ध है। साहित्यशास्त्र में काव्य, नाटक, कहानियों में  जो तत्त्व आनन्द देता है वह तत्त्व रस है। आयुर्वेद में भी वस्तु के  साररूप रस का उपयोग होता है।  अत एव रस का भारतीय परम्परा में अत्यधिक महत्त्व है। तैत्तिरीयोपनिषद् में रस का उल्लेख मिलता। जिसको सभी ने प्रमाण के रूप में अपने-अपने ग्रन्थ में स्थान दिया है। वैदिकविज्ञान में रस के लक्षण से बल का एवं बल के लक्षण से रस का लक्षण बनता है।आगे पढ़े

Abhu and abhva

Creation is a seamless, eternal process in which two fundamental elements, diametrically opposite in character, are involved. ne of them has existed eternally, has no form and do not change. It is pervasive and exists in all living and non-living beings. It is known as abhu. The second element emerges from abhu itself and is known as abhva. These two elements constitute Brahma, the fountainhead of Creation.

Abhu is known by many names. Since it is eternal, it is known as amruta. It is called brahman because it is the tattva or essence which forms the observed universe. It is called satya or truth because it is present at all time. It is rasa or nectar because it is the fuel of existence, without which nothing can exist.When rasa is infused with bala or power, Creation comes into motion.Whereas rasa is abhu, what emerges from its interaction with bala is abhva    Read more 

अभ्व

जगत् के दो मूल तत्त्व हैं- आभु और अभ्व।अभ्व का अर्थ है- दृश्य जगत् अर्थात् दिखाई देने वाला सारा संसार। यह जगत् परिवर्तनशील है। इसीलिये यह विनाशशील है। इसकी प्रतीति होती है। अत एव अभ्व की व्युत्पत्ति है- ‘अभूत्वा भाति’ और ‘न भवन् भाति’ अर्थात् जो संसार का रूप, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, नदी, कीड़े, गाड़ी और घर हैं वे अभ्व के ही रूप हैं। जो वास्तविक रूप में नहीं है परन्तु विद्यमान रहता है। माया और प्रकृति के रूप में अभ्व को जान सकते हैं । बल, कर्म, माया, प्रकृति, मर्त्य, असत्य, आदि को भी अभ्व शब्द का पर्यायवाची माना है। अभ्व शब्द का वैदिक साहित्य में उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों में मिलता है। रूप, कर्म और नाम ये तीनों अभ्व के स्वरूप हैं।
आगे पढ़े

 

आभु

इस विश्व की रचना में आभु और अभ्व ये दो मौलिक तत्त्व हैं।आभु इस संसार के सभी चल और अचल वस्तुओं में नित्य तत्त्व के रूप में सदा रहने वाल एक मूल तत्त्व है।जिस प्रकार अद्वैतवेदान्त दर्शन में सृष्टि का मूल तत्त्व ब्रह्म है। सांख्य दर्शन में सृष्टि का मूल तत्त्व पुरुष है । न्याय दर्शन में सृष्टि का मूल तत्त्व परमाणु है । उसी प्रकार वैदिकविज्ञान में सृष्टि का मूल तत्त्व आभु है। आभु शब्द का उल्लेख क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। आभु के दूसरे नाम भी हैं जैसे- रस, आत्मा, ब्रह्म, अमृत, पुरुष, अव्यय, ज्ञान, सत्य आदि ।आभु द्रष्टा है।[द्रष्टा का अर्थ है देखने वाला। सम्पूर्ण जीव मात्र अपने जीवन में प्रतिक्षण कुछ न कुछ देखता ही रहता है। जैसे ‘मैं घड़ा को देखता हूँ’ ‘ मैं इस किताब को देखता हूँ’ । इन दोनों वाक्यों में जो देखने वाला तत्त्व है, वह द्रष्टा कहलाता है। ऐसे ही अनुभव करने वाला जो तत्त्व है वह आभु ही है। आगे पढ़े
 

 READ MORE VEDIC TERMS HERE-- यज्ञ (in Hindi), yajna (in English)ऋषि  (in Hindi) and rishi (in English).


                                                           
Report

yagyasarasvati National Seminar on Vaidik Yagyaswarup Vimarsh
 Organised jointly by Shri Shankar Shikshayatan and Indian Archaeological Society

 What is yajna? Who created it? What are the benefits of yajna? These are some of the many fundamental questions which have evoked awe and curiosity among humanity for ages.Yajna is seemingly a simple term but its meaning and importance is as complex as it is compelling. Yajna is the essence, act and process of Creation; it is eternal and seamless, transcending life, matter and thought. Renowned Vedic scholar, Vidyavachaspati Madhusudan Ojha has lucidly and comprehensively explained the term, yajna, its meaning and context in several of his works. He has specifically dealt with the subject in his Yagyasaraswati.

Shri Shankar Shikshayatan, in collaboration with Indian Archaeological Society, organised a day-long National Seminar on Vaidik Yagyaswarup on April 29, 2017 in New Delhi. Several well-known scholars from different universities were invited to discuss and debate the term, yajna, in the context of adhibhautika (material world in its entirety), adhidavika (world of supraphysical energies) and adhyamtika (spiritual). Read the full report here.   See pictures of the event on our Facebook page.

 

संगोष्ठी
वैदिकयज्ञस्वरूप विमर्श (आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक व्याख्याओं के सन्दर्भ में)

श्री शंकर शिक्षायतन एवं भारतीय पुरातत्त्व परिषद्, दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में “वैदिकयज्ञस्वरूप विमर्श (आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक व्याख्याओं के सन्दर्भ में)” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी २९ अप्रैल २०१७ को भारतीय पुरातत्त्व परिषद्, के सभागार में सम्पन्न हुई। इस संगोष्ठी में विविध स्थानों से वाराणसी, पश्चिम बंगाल, कुरुक्षेत्र, गुजरात, दिल्ली, हरिद्वार से प्रतिभागी विद्वान् ने भाग ग्रहण किया।

भारतीय परम्परा में यज्ञ एक आधारभूत स्तम्भ है । यह मानव जीवन में निरन्तर चलता रहता है। वेदों, ब्राह्मणग्रन्थों, आरण्यकों श्रौतसूत्रों एवं स्मृतियों में यज्ञ का विस्तार से वर्णन मिलता है। यज्ञ का सामान्य अर्थ क्रिया है। सम्पूर्ण सृष्टि क्रियारूप ही है। अत एव यह सृष्टि यज्ञस्वरूपात्मक है। यज्ञ तीन प्रकार के हैं- पाकयज्ञ, सोमयज्ञ और हविर्यज्ञ। पाकयज्ञ में अन्न से, सोमयज्ञ में सोम एवं हविर्यज्ञ में घृत से आहुति दी जाती है। आगे पढ़े


रचना क्रम 

भारतीय हिन्दूमानव और उसकी भावुकता 
पण्डित मोतीलाल शास्त्री

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने भारतीय हिन्दूमानव और उसकी भावुकता नामक ग्रन्थ का एक शृङ्खला प्रस्तुत किया है। इस शृङ्खला के प्रथमखण्ड में असदाख्यानस्वरूपमीमांसा एवं विश्वस्वरूपमीमांसा है। इसके चतुर्थखण्ड का नाम दिग्देशकालस्वरूपमीमांस है। इन दोनों खण्डों का प्रकाशन उनके जीवन काल में ही हो चुका है।

प्रस्तुत खण्ड के अन्तर्गत निष्ठा और भावुकता की शास्त्रीय मीमांसा का वर्णन हुआ है।  इस में  शास्त्री जी ने ‘माङ्गलिकम्’ में निष्ठा शब्द का प्रयोग जहाँ-जहाँ  उद्धृत हुए हैं उसको उपस्थापित करते हुए निष्ठा और भावुकता शब्दों की विशद व्याख्या  किया है। इसमें प्रतिष्ठा, धृति, वेद विद्या ब्रह्म, उक्थ, साम  और ज्योति आदि अनेक विषयों को समाहित किया है। लेखक ने इस ग्रन्थ में यह दिखाने का प्रयास किया है कि कैसे वैदिक शब्दावली को वैदिककालिन अर्थों से भिन्न  वर्तमानकालिक अर्थों में  भ्रान्तरूप से व्यवहार हो रहा है।

यह ग्रन्थ वैदिकविज्ञान के पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट करने वाला अमूल्य ग्रन्थ है। पाठकों को इस के अध्ययन से वेदविज्ञान को समझने में उपकार होगा । इस दृष्टि से श्री शंकर शिक्षायतन इसको शृङ्खला के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।  

पहला भाग
दूसरा भाग  

तीसरा भाग
चौथा भाग

 E X C E R P T S  (IN HINDI)  F R O M
Bharatiya Manav aur Uski Bhavukta (The Emotional Indian)
Pandit Moti Lal Shastri


 



I N T R O D U C T I O N  T O  B O O K S  I N  R E S O U R C E S

 

PATHYASVASTI by Pandit Madhusudan Ojha 

The unique quality of Pandit Ojha’s scholarship was his effort to present the Vedas as they are—repositories of profound and timeless wisdom. He therefore has not offered any critique or commentary on the Vedic texts. His life-long search had been on decoding the terms and means of the Vedas which were lost due to ignorance and disuse over the centuries. One of the principle thrusts of Pandit Ojha’s enormous volumes of work has been to lay out the tools and means to understand the Vedas. An extraordinary collection of his works therefore focused on reconstructing lost terms and meanings of the Vedic texts. Pathyasvasti forms part of this unusual effort.


In the Vedic literature, pathyasvasti means alphabets. But like all Vedic terms, pathyasvasti has several other meanings. The most significant is wak or word. Pandit Ojha has extensively dealt with this aspect in this work. Another equally important meaning of this term is the path of Sun’s movement across the heavens. This is the path taken by earth which moves around the Sun. In the Vedas, this path is also referred to as pathyasvasti.

This book is divided into five chapters, dealing with alphabets, words and other characteristics of word or wak.

This book gives a comprehensive account of meaning and pronunciation of Vedic terms. It is complimentary to Pandit Ojha’s other important work, Varnasamiksha.

 

पथ्यास्वस्ति 

वेद में वर्णमातृका (वर्णमाला) को पथ्यास्वस्ति कहा गया है। अतः पथ्यास्वस्ति का अर्थ वर्णमातृका है।पण्डित मधुसूदन ओझजी केवेदाङ्ग समीक्षाविभाग के अन्तर्गतवाक्पदिकाग्रन्थ विभाग मेंपथ्यास्वस्तिग्रन्थ का स्थान है। यह ग्रन्थवर्णसमीक्षाका अवान्तर प्रकरण है। इस ग्रन्थ में वाक् के विभिन्न स्वरूप एवं प्रकार के विश्लेषण करते हुए वर्णरूपा वाक् को जिसे पथ्यास्वस्ति कहते हैं।आगे पढ़े


शारीरकविमर्श

पण्डित मधुसूदन ओझा के ब्रह्मविज्ञान खण्ड में आर्यहृदयसर्वस्व नामक विभाग में शारीरकविमर्श ग्रन्थ का स्थान है। यह ग्रन्थ एक प्रकार से ब्रह्मसूत्र के प्रमुख विषयों को आधार बनाकर लिखा गया है। शरीर में जो रहता है उसका नाम शारीरक है। शरीर में जीवात्मा रहती है। अत एव शारीरक का अर्थ जीवात्मा है। शारीरकविमर्श में जो विमर्श है उसका अर्थ है विचार। इस प्रकार जीवात्मा के विचार सम्बन्धी ग्रन्थ का नाम शारीरकविमर्श है। अत एव ग्रन्थ का मुख्य विवेच्य जीवात्मा ही है। आगे पढ़े

वर्णसमीक्षा

पण्डित मधुसूदन ओझजी के ‘वेदाङ्ग समीक्षा’ विभाग के  अन्तर्गत ‘वाक्पदिका’ ग्रन्थ विभाग में  ‘वर्णसमीक्षा’ ग्रन्थ  का स्थान है। ‘वर्णसमीक्षा’ में वर्णमाला की उत्पत्ति का वैज्ञानिक रहस्य, स्वरभक्ति, विवृति, यम, नियम आदि का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है।

व्याकरण के अनुसार मात्रा शब्द से स्वार्थ में ‘क’ प्रत्यय लगाने पर मात्रिका शब्द निष्पन्न है। यही शब्द उच्चारण की समानता से मातृका भी कहलाता है। वर्णमाला मातृवत् भिन्न-भिन्न देशों की भाषाओं की जननी है। इसी कारण वर्णमाला को मातृका कहा जाता है।

वर्णसमीक्षा  में पाँच मातृकाओं की चर्चा है। इनके अनुसार उन मातृकाओं को आर्य मातृका कहा है जिनमें  स्वर और व्यञ्जन पृथक् रहते हैं, जहाँ ऐसा नहीं होता है वे अनार्य मातृकायें हैं, आर्यमातृका चार हैं- ब्रह्म, अक्ष, सिद्ध और भूत। अनार्यमातृकाओं में होड़ामातृका को भी आर्यों ने अपना लिया । इन पाँचों प्रकार की मातृकाओं में ये सभी वर्ण हैं जो आज प्रयोग में आते हैं किन्तु उनके क्रम में पर्याप्त भेद है। अक्षमातृका में दीर्घ लॄ तथ ळ  का भी समावेश है। रुद्रमातृका में प्रत्याहारसूत्र में आने वाले सभी वर्णों का समावेश है किन्तु उनका क्रम थोड़ा भिन्न है।

इन मातृकाओं के वर्णन में पण्डित ओजा ने प्रातिशाख्यों को आधार बनाकर कुछ ऐसी सञ्ज्ञाओं का विवेचन किया है जिनका विवरण प्रायः पाणिनीय व्याकरण में पढ़ने में नहीं मिलता हैं। यथा- सिम्, नामि, भावी, मुत्, धि। इन संज्ञाओं का मूल प्रातिशाख्यों मिलता है।

 इन मातृकाओं के अन्तर्गत आये हुए स्वर-व्यञ्जनादि संज्ञाविशेष के सम्बन्ध में प्रातिशाख्यादि ग्रन्थों में विस्तृत विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थ के दो भाग हैं-प्रथमभाग का नाम वर्णसमीक्षा तथा द्वितीयभाग का नाम गुणप्रकरण है।  इस में अधोलिखित विषय  वर्णित है-स्वर,व्यञ्जन,समानाक्षर,सन्ध्यक्षर,विवृत्ति,स्वरभक्ति,यम,अनुस्वार,नाद,अन्तस्था,रङ्ग, ऊष्मा, वाग्विज्ञान , वाक् की उत्पत्ति, स्वरसमीक्षा, यह ग्रन्थ न केवल वैयाकरणों के लिये अपितु भाषावैज्ञानिकों के लिये भी आत्यन्त उपादेय है।आगे पढ़े


Varnasamiksha by Pandit Madhusudan Ojha

Varnasamiksha is one of the many important works of Pandit Madhusudan Ojha. A profound scholar of the Vedas, Pandit Ojha had realised during his life-long study of ancient texts that over the time, terms used in the Vedic texts, their meaning and context had become extinct due to neglect and wrong interpretation. He thought it was necessary to rediscover the true meaning of the Vedic terms to understand the Vedas. In Varnasamiksha, he has gone to the extraordinary length of explaining the basic structure of the Vedic language which forms the foundational basis for studying the Vedas. Beginning with the basic alphabet, Pandit Ojha has critically examined the issue of pronunciation of the Vedic syllables and the pitfalls of flawed diction. Although there are several acclaimed books on the subject, including that of great grammarian and linguist, Panini, Pandit Ojha has presented profound and original thoughts on this complicated subject.