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 L A T E S T    U P D A T E   

 

V E D I C T E R M S

वैदिक पारिभाषिक शब्द

 

त्रिलोकीwhats new

त्रिलोकी वैदिकविज्ञान का मुख्य पारिभाषिक शब्द है। इसको समझने से ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता है। यह त्रिलोकी पृथ्वीलोक से स्वयम्भूलोक तक फैला हुआ है। रोदसी, क्रन्दसी और संयती ये तीनों मिलकर त्रिलोकी है। ये तीनों शब्द स्त्रीलिंग में एवं द्विवचन में हैं, क्योंकि पृथ्वी और द्युलोक को बतलाती हैं। आगे पढ़े

 

आनन्द

भारतीय दर्शन में आनन्द का विशेष स्थान है। उपनिषद् कहती है कि आनन्द ही ब्रह्म है। ओझाजी के अनुसार आनन्द ही रस है और आनन्द दो प्रकार का है-शान्त और समृद्ध। जिस आनन्द का विषयों के साथ सम्बन्ध नहीं होता वह शान्त है और जिस आनन्द का विषयों के साथ सम्बन्ध होता है वह समृद्ध है। आगे पढ़े

 

Bala

The two primary building blocks of all creation are rasa and bala. Pandit Madhusudan Ojhai has explained thus: while rasa was enduring and eternal, bala was transitory and impermanent. Although bala is impermanent, rasa cannot manifest itself without it. Similarly if rasa does not illuminate it, on what support will bala exist? Therefore rasa and bala are both always intertwined. Read more

बल

सृष्टि का मूल  बल है। बल का अर्थ है- जो हमेशा सभी वस्तुओं में रहने वाला सत्तारूप है, अनेक प्रकार के परिवर्तन वाला है और जिसकी प्रतीति होती है वही बल है, यही बल का लक्षण है। ‘घड़ा’ है, ‘कार है’ किताब है, इन सभी वस्तुओं में जो ‘है’ है वही सत्ता है और यह सदैव रहता है। आगे पढ़े

Rasa

The term `rasa` has many meanings, some very profound, others more ordinary and popular. But all these different meanings derive from the foundational definition of rasa--one of the two building blocks of Creation. Without rasa, no creation is possible. In Vedic vijnana, rasa is the basic element by which creation takes place; rasa is abhu. Hence, there is considerable reference to rasa in the Vedic texts. Pandit Madhusudan Ojha has explained this meaning of rasa in great depth in Brahmavinaya, Brahmasamanvya, Brahmachatushpadhi and Sharirikavijnana. Read more here.

 रस

जगत् की रचना में रस एक मूल तत्त्व है। इसी रस तत्त्व से सृष्टि होती है। जिस प्रकार अद्वैतवेदान्त दर्शन में ब्रह्म, सांख्य दर्शन में पुरुष और न्याय दर्शन में परमाणु मूलतत्त्व कारण के रूप में वर्णित है। उसी प्रकार वैदिकविज्ञान में रस का मूलतत्त्व के रूप में अथवा कारणरूप में वर्णन मिलता है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार रस् धातु से अच् प्रत्यय होकर रस शब्द निष्पन्न होता है। रस का शाब्दिक अर्थ है किसी वस्तु का साररूप ।यह लोक में प्रसिद्ध है। साहित्यशास्त्र में काव्य, नाटक, कहानियों में  जो तत्त्व आनन्द देता है वह तत्त्व रस है। आयुर्वेद में भी वस्तु के  साररूप रस का उपयोग होता है।  अत एव रस का भारतीय परम्परा में अत्यधिक महत्त्व है। तैत्तिरीयोपनिषद् में रस का उल्लेख मिलता। जिसको सभी ने प्रमाण के रूप में अपने-अपने ग्रन्थ में स्थान दिया है। वैदिकविज्ञान में रस के लक्षण से बल का एवं बल के लक्षण से रस का लक्षण बनता है।आगे पढ़े

READ MORE VEDIC TERMS HERE-- यज्ञ , yajnaऋषि ,rishi , ksharaक्षर ,अक्षर,aksharaabhu and abhva,  अभ्वआभुavyaya,vO;; ,   uktha and उक्थ         


 

REPORT

Vedic Paricharcha 
Indian Archaeological Society
May 7,2018

 

What is Veda? Is it a collection of texts? Is it a textbook for rituals? Is it a collection of mantras (hymns)? What is that makes the Vedas apaureshya (not created by man)? Are the texts, the samhitas, different from Veda tatva? Or are they same?

These were some of the questions, profound and complex, which were at the heart of the discussion organised by Shri Shankar Shikshayatan at the Indian Archaeological Society, New Delhi, on May 7, 2018. The discussion, attended by several professors from different Sanskrit universities in the city, centred on Pandit Motilal Shastri’s explanation of his guru, Pandit Madhusudan Ojha’s writings on the Veda. Read full report

vedic paricharcha
A view of the meeting


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NEW BOOK ONLINE

 

Vedic Concept of Man and Universe--Five lectures of Pandit Motilal Shastri at Rashtrapati Bhawan,
translated by Rishi Kumar Mishra  ---download

Three Thousand Years of Indian Decadence--edited by Rishi Kumar Mishra  whats new

This is an introduction to the epoch-making Vedic literature and fundamental viewpoints of Pandit Motilal Shastri. An excerpt:

`Three thousand years of Indian decadence are a direct consequence of emotionalism that has crept into this nation. Indians, and particularly the Hindus, are suffering from this deadly characteristic of emotionalism and due to this weakness, foreign aggressions have been consecutively successful. Proper understanding of these two words--nishtha (resolute conviction) and bhavukta (emotionalism) will unfold before us a significant aspect of the entire span of Indian history and will make our basic defect clear to us. It will also guide us in removing these defects.`   Download

 

 

 

 

                                 

                                           PANDIT MOTILAL SHASTRI MEMORIAL LECTURE SERIES 2017 
                                      AND LAUNCH OF BOOK, BHARATAVARSHA--THE INDIA NARRATIVE

 

BOOK LAUNCH

 

Shri Shankar Shikshayatan's first publication, Bharatavarsha--The India Narrative authored by Pandit Madhusudan Ojha and translated by Prof. Kapil Kapoor, was formally launched by renowned art historian Dr Kapila Vatsyayan on September 28, 2017 at the India International Centre annexe, New Delhi. Prof. Kapoor, Chancellor, Mahatma Gandhi Hindi Antar-rashtriya Vishvavidyalaya, Wardha, is seen with Prof. Ramesh Kumar Pandey, Vice Chancellor, Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit Vidyapeeth, New Delhi ,Mr Anand Bordia, Trustee, Shri Shankar Shikshayatan Trust and Mr Wilson John, editor, Shri Shankar Shikshayatan.  

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NEW BOOK !

BHARATAVARSHA  THE INDIA NARRATIVE

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Bharatavarsha-The India Narrative
Pandit Madhusudan Ojha
Translated by Prof. Kapil Kapoor
Published by Rupa & Co., New Delhi

 

BHARATAVARSHA--THE INDIA NARRATIVE is the much-awaited translation of Pandit Madhusudan Ojha's magnificient work on creation, life and Bharatavarsha. It is a book within books, of stories within a story, of worlds that are within and outside.On first reading, it is the story of Bharatavarsha. But more than that it is the story of Bharatavarsha in the configuration of the continents, the world’s peoples, and their location in the brahmanda. It is thus a fascinating account of how a vast geographical expanse is integrated by cosmic awareness. Rivers and mountains criss-cross the landscape of this dramatic story, live

 


 
I N T R O D U C T I O N  T O  B O O K S  I N  R E S O U R C E S

PATHYASVASTI by Pandit Madhusudan Ojha 

The unique quality of Pandit Ojha’s scholarship was his effort to present the Vedas as they are—repositories of profound and timeless wisdom. He therefore has not offered any critique or commentary on the Vedic texts. His life-long search had been on decoding the terms and means of the Vedas which were lost due to ignorance and disuse over the centuries. One of the principle thrusts of Pandit Ojha’s enormous volumes of work has been to lay out the tools and means to understand the Vedas. An extraordinary collection of his works therefore focused on reconstructing lost terms and meanings of the Vedic texts. Pathyasvasti forms part of this unusual effort.


In the Vedic literature, pathyasvasti means alphabets. But like all Vedic terms, pathyasvasti has several other meanings. The most significant is wak or word. Pandit Ojha has extensively dealt with this aspect in this work. Another equally important meaning of this term is the path of Sun’s movement across the heavens. This is the path taken by earth which moves around the Sun. In the Vedas, this path is also referred to as pathyasvasti.

This book is divided into five chapters, dealing with alphabets, words and other characteristics of word or wak.

This book gives a comprehensive account of meaning and pronunciation of Vedic terms. It is complimentary to Pandit Ojha’s other important work, Varnasamiksha.

 

पथ्यास्वस्ति 

वेद में वर्णमातृका (वर्णमाला) को पथ्यास्वस्ति कहा गया है। अतः पथ्यास्वस्ति का अर्थ वर्णमातृका है।पण्डित मधुसूदन ओझजी केवेदाङ्ग समीक्षाविभाग के अन्तर्गतवाक्पदिकाग्रन्थ विभाग मेंपथ्यास्वस्तिग्रन्थ का स्थान है। यह ग्रन्थवर्णसमीक्षाका अवान्तर प्रकरण है। इस ग्रन्थ में वाक् के विभिन्न स्वरूप एवं प्रकार के विश्लेषण करते हुए वर्णरूपा वाक् को जिसे पथ्यास्वस्ति कहते हैं।आगे पढ़े


शारीरकविमर्श

पण्डित मधुसूदन ओझा के ब्रह्मविज्ञान खण्ड में आर्यहृदयसर्वस्व नामक विभाग में शारीरकविमर्श ग्रन्थ का स्थान है। यह ग्रन्थ एक प्रकार से ब्रह्मसूत्र के प्रमुख विषयों को आधार बनाकर लिखा गया है। शरीर में जो रहता है उसका नाम शारीरक है। शरीर में जीवात्मा रहती है। अत एव शारीरक का अर्थ जीवात्मा है। शारीरकविमर्श में जो विमर्श है उसका अर्थ है विचार। इस प्रकार जीवात्मा के विचार सम्बन्धी ग्रन्थ का नाम शारीरकविमर्श है। अत एव ग्रन्थ का मुख्य विवेच्य जीवात्मा ही है। आगे पढ़े

वर्णसमीक्षा

पण्डित मधुसूदन ओझजी के ‘वेदाङ्ग समीक्षा’ विभाग के  अन्तर्गत ‘वाक्पदिका’ ग्रन्थ विभाग में  ‘वर्णसमीक्षा’ ग्रन्थ  का स्थान है। ‘वर्णसमीक्षा’ में वर्णमाला की उत्पत्ति का वैज्ञानिक रहस्य, स्वरभक्ति, विवृति, यम, नियम आदि का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है।

व्याकरण के अनुसार मात्रा शब्द से स्वार्थ में ‘क’ प्रत्यय लगाने पर मात्रिका शब्द निष्पन्न है। यही शब्द उच्चारण की समानता से मातृका भी कहलाता है। वर्णमाला मातृवत् भिन्न-भिन्न देशों की भाषाओं की जननी है। इसी कारण वर्णमाला को मातृका कहा जाता है।

वर्णसमीक्षा  में पाँच मातृकाओं की चर्चा है। इनके अनुसार उन मातृकाओं को आर्य मातृका कहा है जिनमें  स्वर और व्यञ्जन पृथक् रहते हैं, जहाँ ऐसा नहीं होता है वे अनार्य मातृकायें हैं, आर्यमातृका चार हैं- ब्रह्म, अक्ष, सिद्ध और भूत। अनार्यमातृकाओं में होड़ामातृका को भी आर्यों ने अपना लिया । इन पाँचों प्रकार की मातृकाओं में ये सभी वर्ण हैं जो आज प्रयोग में आते हैं किन्तु उनके क्रम में पर्याप्त भेद है। अक्षमातृका में दीर्घ लॄ तथ ळ  का भी समावेश है। रुद्रमातृका में प्रत्याहारसूत्र में आने वाले सभी वर्णों का समावेश है किन्तु उनका क्रम थोड़ा भिन्न है।

इन मातृकाओं के वर्णन में पण्डित ओजा ने प्रातिशाख्यों को आधार बनाकर कुछ ऐसी सञ्ज्ञाओं का विवेचन किया है जिनका विवरण प्रायः पाणिनीय व्याकरण में पढ़ने में नहीं मिलता हैं। यथा- सिम्, नामि, भावी, मुत्, धि। इन संज्ञाओं का मूल प्रातिशाख्यों मिलता है।

 इन मातृकाओं के अन्तर्गत आये हुए स्वर-व्यञ्जनादि संज्ञाविशेष के सम्बन्ध में प्रातिशाख्यादि ग्रन्थों में विस्तृत विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थ के दो भाग हैं-प्रथमभाग का नाम वर्णसमीक्षा तथा द्वितीयभाग का नाम गुणप्रकरण है।  इस में अधोलिखित विषय  वर्णित है-स्वर,व्यञ्जन,समानाक्षर,सन्ध्यक्षर,विवृत्ति,स्वरभक्ति,यम,अनुस्वार,नाद,अन्तस्था,रङ्ग, ऊष्मा, वाग्विज्ञान , वाक् की उत्पत्ति, स्वरसमीक्षा, यह ग्रन्थ न केवल वैयाकरणों के लिये अपितु भाषावैज्ञानिकों के लिये भी आत्यन्त उपादेय है।आगे पढ़े


Varnasamiksha by Pandit Madhusudan Ojha

Varnasamiksha is one of the many important works of Pandit Madhusudan Ojha. A profound scholar of the Vedas, Pandit Ojha had realised during his life-long study of ancient texts that over the time, terms used in the Vedic texts, their meaning and context had become extinct due to neglect and wrong interpretation. He thought it was necessary to rediscover the true meaning of the Vedic terms to understand the Vedas. In Varnasamiksha, he has gone to the extraordinary length of explaining the basic structure of the Vedic language which forms the foundational basis for studying the Vedas. Beginning with the basic alphabet, Pandit Ojha has critically examined the issue of pronunciation of the Vedic syllables and the pitfalls of flawed diction. Although there are several acclaimed books on the subject, including that of great grammarian and linguist, Panini, Pandit Ojha has presented profound and original thoughts on this complicated subject.


All Hindi texts appearing on the website (barring published books) are authored by Dr  Lakshmi Kant Vimal. New scanned copies of various texts are posted by Bishnu Mahapatra.