Shatpatha Brahmana

Year of Publication
1956

 

 

शतपथब्राह्मण प्रथमखण्ड

Shatpatha Brahmana Part I

 

साधारणतया  लौकिक दृष्टि से ‘यजुर्वेद’ और तत्त्वदृष्टि से ‘यज्जूर्वेद’ है । इस में दो पद हैं-यत् और जूः। जिसका क्रमशः अर्थ  प्राण, वायु,गति और वाक्, आकाश स्थिति है ।

शतपथब्राह्मण में एक सौ अध्याय हैं । इस के कारण इसका नाम शतपथ है। यजुःसंहिता के व्याख्यारूप यजुर्ब्राह्मण है । जिसके शाखा भेद से एक सौ एक विभाग माने गये हैं। इनमें 15 शाखाएँ ‍‘शुक्लयजुर्वेद’ नाम से प्रसिद्ध हैं और 86 शाखाएँ ‘कृष्णयजुर्वेद’ नाम से व्यवहृत होते हैं । सामान्यतया शुक्लयजुर्वेद की ‘माध्यन्दिनशाखा’ और काण्वशाखा ही उपलब्ध होता है । पण्डित मोतीलाल शास्त्री के अनुसार संहितावेद ‘मन्त्रवेद’ और विधि, आरण्यक तथा उपनिषद् के भेद से विभक्त वेदसमष्टि ही ‘ब्राह्मणवेद’ है । शतपथब्राह्मण के 14 काण्डों में 13 काण्ड केवल ‘विधि’ का विश्लेषण करते हैं। 14 वां काण्ड आरण्यक और उपनिषद् इन दोनों का संग्रह है।

माध्यन्दिन और काण्व ये दोनों सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य हैं । इन दोनों शाखाओं का नाम वाजसनेयी है । वाजसनेय याज्ञवल्क्य का ही दूसरा नाम है, क्योंकि सम्पूर्ण शुक्लयजुर्वेद के आचार्य  याज्ञवल्क्य हैं ।

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने शतपथब्राह्मण पर हिन्दी विज्ञानभाष्य की रचना की है।  

नोट-प्रथमकाण्ड का प्रथमखण्ड  Download के लिए दिया गया है ।