pratishtha

Pratishta

 

Existence is satta. When existence takes a form, it is known as pratishtha. There is only one existence but existence can be experienced in all material things. It is different in different entities and is not mutually dependent. Pratishtha in fact is existence but it takes different forms in different substances. Existence or satta is unchanging but pratishtha changes with every form which satta inhabits. (Pandit Motilal Shastri, Jyotikrishnarahasya, page 1)

 

 प्रतिष्ठा   

 व्यापक सत्ता का नाम - सत्ता है, भिद्यमान सत्ता का नाम प्रतिष्ठा है। व्यापक सत्ता एक है - भिद्यमान सत्ताएँ अनन्त हैं। संसार में जितने भी पदार्थ हैं,  उतनी ही,  प्रतिष्ठाएँ हैं।  घट, पट, मठ, सूर्य, चन्द्र, पर्वत, नदी, तालब, समुद्र, चन्द्र, उपवन इत्यादि सभी पदार्थों की प्रतिष्ठा भिन्न-भिन्न है । अस्तित्व का नाम ही प्रतिष्ठा है । ‘है’- इसका नाम ही प्रतिष्ठा है। यह प्रतिपदार्थ में भिन्न भिन्न है। घट का अस्तित्व पट के अस्तिव से भिन्न है । पट का अस्तित्व घट के अस्तित्व से भिन्न है। घट के अस्तित्व-विनाश से पट के अस्तित्व का कुछ नहीं बिगड़ता । पट के अस्तित्व विनाश से घट के अस्तित्व का कुछ नहीं बिगडता। कहने का तात्पर्य यही है कि पदार्थ भेद से प्रतिष्ठा - तत्त्व सर्वथा भिन्न हो जाता है।     (पण्डित मोतीलाल शास्त्री, ज्योतिकृष्णरहस्य, पृ. १)