samvatsara

Samvatsara 

 

Samvatsara is commonly understood as a year--the time taken by the earth in completing one revolution around the sun. This is known as the solar year or samvatsara of surya or the sun. The term also includes the movement of the moon around the earth which constitutes a lunar year.  

There are, however, varied dimensions of the term, samvatsara, in the Veda-vijnana, related to the process of Creation. 

Samvatsara of the sun denotes the time taken by the earth in completing one revolution around the sun. It has 360 parts, the smallest of them being the day and night unit. Since these constitute half-half units, there are in total 720 parts. 

The second division is that of paksha or lunar phases. This is caused by the simultaneous movement of the moon and the earth in which, at a certain time, the moon comes between the earth and the sun. This phase lasts for fifteen days and is known as a `bright fortnight` or shukla paksha. In this continuing passage of both the earth and the moon, the earth comes between the moon and the sun causing krishna paksha or dark fortnight for the next fifteen days. Thus a year has 24 pakshas and these are 24 divisions of samvatsara.

The third division is that of month or masa like chaitra; the fourth is that of season or ritu--there are three main seasons, summer, winter and monsoon. The fifth is that of ayan or movement of the earth--uttarayan and dakshinayan. All these constitute samvatsara. 

In Veda-vijnana, the term samvatsara has many dimensions, all of which are closely related to the process of creation.  It refers to the movement of the sun (surya), earth (prithvi) and moon (chandra) in parameshthi witnessed by svayambhoo. All these five constitute the dimensions of the universe. This movement includes both mobility and stasis--like a potter’s wheel. The potter’s wheel in motion is moving but is also rooted on its central axis.These movements cause supraphysical energies like agni or fire , either independently or together, to fuse or coalesce and create a ceaseless stream of new padartha or ‘individuals’, the unfolding of the process of creation. This inflow and outflow of supraphysical energy is the yajnya taking place in nature. Samvatsara is thus yajnya prajapati from whom the triple worlds of earth, interspace and the solar system are born. These energies that stimulate creation is samvatsara prajapati. It is the primary tattwa from which living beings are created. 

 

References:

Pandit Motilal Shastri has given a concise description of the term in his two books,  Parameshtikrishna-rahasya (pages 49-50) and Ishvarkrishna-rahasya (pages 80-81).

Rishi Kumar Mishra, Pandit Shastri’s disciple, has given a vivid explanation in English of samvatsar in his two books, The Cosmic Matrix:In the Light of the Vedas and Before the Beginning and After the End.

 

संवत्सर

 

संवत्सर की पहली व्याख्या में शास्त्री जी ने काल की गणना को समझाया है। दूसरी व्याख्या में वैदिकविज्ञान की दृष्टि से अर्थ को स्पष्ट किया है।

संवत्सराग्नि को आत्मसात् करने का नाम ही सोमयज्ञ है । यह संवत्सराग्नि 6 भागों में विभक्त है। पहला विभाग 720 है । एक संवत्सर के 360 दिन एवं 360 रात्रि होती हैं। जब दिन-रात से ऊपर बढ़ते हैं तो पक्ष का स्थान आता हैं। पक्षों के हिसाव से वही अग्नि 24 भागों में विभक्त मिलता है। उस के बाद महीनों के हिसाब से 12 भागों में विभक्त मिलता है। उस के बाद  तीन ऋतुओं में विभक्त मिलता है। उन के बाद वही अग्नि दक्षिणायन और उत्तरायण के भेद से दो भागों में विभक्त मिलता है। इसके बाद पूरा संवत्सर का  स्वरूप बनता है। इस प्रकार से एक ही संवत्सराग्नि अहोरात्र (720), शुक्ल-कृष्ण पक्ष (24), मास (12), ॠतु (उष्ण-शीत-वर्षा ), अयन और संवत्सर । इस प्रकार वैदिक गणित को ७२० की संख्या से समझाना चाहते हैं।  (पण्डित मोतीलाल शास्त्री,  परमेष्ठीकृष्ण रहस्य पृ. ४९-५०)

 

 प्रजापति ने इच्छा की संवत्सरस्वरूप जो मेरी आत्मा की प्रतिभा है उसे उत्पन्न करूँ अतएव प्रजापतिः संवत्सरः  - यह कहा जाता है। जिन चारों प्रतिमा प्रजापतियों (परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा और पृथिवी) को स्वयम्भू प्रजापति ने उत्पन्न किया है, वे ही चारों वास्तव में संवत्सरस्वरूप हैं ।

‘सम’ का अर्थ है - एकीभाव (समित्येकीभावे)। ‘वस्’ का नाम है - ‘स्थिति’, ‘सर’ का नाम है -‘गति’। जो एक स्थान पर ठहरता हुआ चलता है, उसी को ‘संवत्सर’ कहते है। ‘सम्- एकरूपे, वसन्सन् सरति स संवत्सरः-’ यही शब्द की व्युत्पत्ति है। वास्तव में चारों ऐसे ही हैं, चारों बिल्कुल स्थिर हैं एवं चारों ही खूव चलते हैं। कुम्हार के घूमते हुए चाक पर दृष्टि डालिए। चाक का बिन्दु-बिन्दु घूम रहा है। चल रहा है परन्तु चाक स्थिर है। यदि चाक चलता होता तो वह स्व स्थान से आगे बढ़ा हुआ मालूम होता। अवयव प्रतिक्षण चल रहे हैं, समष्टि नहीं चल रही है। इन चारों के घूमने की जो एक लाइन है, उससे ये कभी बाहर नहीं जाते हैं। अपने अपने क्रान्ति वृत्त के बाहर एक बिन्दु भी नहीं जाते हैं। वृत्त के प्रतिबिन्दु पर ये भ्रमण करते रहते हैं, सदा परिक्रमा किया करते हैं अतएव इन्हें ‘गतिमान्’ भी कह सकते हैं। इस स्थितियुक्ता गति के कारण ही इन चारों को हम संवत्सर कह सकते है।

       स्वयम्भू स्थिर है, वह चलता नहीं है अतएव उसे हम ‘संवत्सर’ नहीं कह सकते। संवत्सर शब्द की यह व्युत्पत्ति अन्य ब्राह्मणों के अनुसार है। शतपथ ब्राह्मण में इसकी व्युत्पत्ति दूसरी तरह से मानी गई है। ‘सर’ कहते हैं - ‘वक्रगति’ को। ये चारों ही सारे मण्डल में वक्रीभूत बन कर चलते हैं अतएव ‘सर्वत्र सर्वदैव सरति अर्थात् वक्रीभूतः सन् गच्छति’ इस व्युत्पत्ति से इसे सर्वत्सर कहा जाता है। सर्वत्सर को ही परोक्षाप्रिय देवता संवत्सर कहते हैं।

 

 (पण्डित मोतीलाल शास्त्री, ईश्वरकृष्ण रहस्य पृ. ८०-८१)