manota

manota



Manota in vedic vijnana relates to the process of creation. It is an attribute of existence. It establishes existence in an individual. (here `individual` does not mean person but a padartha or an element). It stabilises existence in a form.

According to veda vijnana, srishti or creation has five divisions and manota is distinct in each of these divisions. In the svayambhoo-mandala (sphere), it is cit, sutra and veda, in the parameshthi-mandala it is bhrigu, angira and atri, in the surya-mandala it is jyoti, dhyau and ayu, in the chandra-mandala it is retah, sradha and yash and in the prithvi-mandala it vak, gau and dhyau. Since each sphere has three manotas, there are 15 tattvas in total. There is a reference to this phenomenon in the Atharva Veda (6.10.10):
 

तिस्रो वै देवानां मनोतास्तासु हि तेषाम् मनांस्योतानि वाग्वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांस्योतानि गौर्वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांस्योतान्यग्निर्वै देवानां मनोता तस्मिन् हि तेषाम् मनांस्योतानि


tisyo vai devanam manotastasu hi tesham manamsyotani vagvai devanam manota tasyam hi tesham manamsyotani gauvaira devanam manota tasyam hi tesham manasyotanyagnivaira devanam manota tasmin hi tesham manamsyotani.


(Pandit Motilal Shastri, Ishvarkrishna-rahasya, pages 154-156)

 

मनोता


वैदिकविज्ञान में  ‘मनोता’  यह सृष्टिसिद्धान्त का प्रतिपादक शब्द है। इस शब्द का अर्थ है कि जिनके रहने से वस्तु की सत्ता बनी रहती है। वस्तु की सत्ता को स्थिर रखने वाला तत्त्व ही मनोता है। वैदिकविज्ञान के अनुसार यह सृष्टि पाँच भागों में विभक्त है। पाँचों मण्डल के क्रम से मनोता का नाम इस प्रकार है।

स्वयम्भूमण्डल में चित्, सूत्र और वेद, परमेष्ठीमण्डल में भृगु, अङ्गिरा और अत्रि, सूर्यमण्डल में ज्योति, द्यौ और आयु, चन्द्रमण्डल में रेतः, श्रद्धा और यश एवं पृथ्वीमण्डल में वाक्, गौ  और द्यौ ये मनोता है।  इस प्रकार पाँचों मण्डल में तीन-तीन मनोता होने से कुल १५ तत्त्व हैं।

इस का सन्दर्भ अथर्ववेद में मिलता है-

तिस्रो वै देवानां मनोतास्तासु हि तेषाम् मनांस्योतानि वाग्वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांस्योतानि गौर्वै देवानां मनोता तस्यां हि तेषां मनांस्योतान्यग्निर्वै देवानां मनोता तस्मिन् हि तेषाम् मनांस्योतानि । ऐ. ब्रा. ६.१०.१०

 

(पण्डित मोतीलाल शास्त्री, ईश्वरकृष्णरहस्य पृ. १५४-१५६)