angira

 

 

Angira, a supraphysical energy, is one of the three manotas in parameshthi-mandala. The dense or solid form of angira is agni or fire. In its liquid form, it is vayu or air. And in sparse or gaseous form, it is aditya or rays of the sun. Angira transforms the solid form. It emanates from solid mass all the time. The padartha which is solid mass or pinda is known as angi or avayavi and flows out in liquid form. In the Gopatha Brahmana, it is said:
 

आपो भृग्वङ्गिरोरूपम् आपो भृग्वङ्गिरोमयम् ।

अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः॥

 

Apo bhrigvangirorupam apo bhrigvangiromayam

Antaraite traiyo veda bhrigunangirasonugaha.


 

(Pandit Motilal Shastri, Ishvarkrishna-rahasya; pages 156)

 

 

अङ्गिरा

 

परमेष्ठीमण्डल के तीन मनोताओं में दूसरा अङ्गिरा है। अङ्गिरा  की घनावस्था का नाम अग्नि है। तरलावस्था का नाम वायु है। विरलावस्था का नाम आदित्य है। सारे विश्व का संचालन इन्हीं छहों से होता है। घनाभाव को विशकलित अर्थात् परिवर्तित कर देना, यह अङ्गिरा का काम है। यह अङ्गिरा प्राण पिण्डवस्तु से हर वक्त निकला करता है। उस पदार्थ को विशकलित अर्थात् परिवर्तित करने की चेष्टा किया करता है। जो पदार्थ पिण्ड स्वरूप है वे अङ्गी अथवा अवयवी कहलाते हैं। इस पिण्ड के द्रवभाव से अर्थात् विशकलित भाव से यह प्राण पिण्ड से बाहर निकलता है। अत एव ‘अङ्गिनो रसति’ इस व्युत्पत्ति से इसे अङ्गिरा कहा जाता है।

 

गोपथब्राह्मण में इसका प्रमाण मिलता है- 

 

आपो भृग्वङ्गिरोरूपम् आपो भृग्वङ्गिरोमयम् ।

अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः॥

 

(पण्डित मोतीलाल शास्त्री, ईश्वरकृष्णरहस्य पृ. १५६)