atri

The third manota of parameshthi mandala is atri. This prana does not let the rays of the sun disperse. Without atri blocking their way, the sun’s rays would  travel straight all the way. Atri takes in the sun’s rays. Substances in the universe which do not exhibit transparency are products of atri. Substances which are dense do not allow sun’s rays to travel through and hence are imbibed with atri. If atri were to be take out of them, these substances would allow the sun’s rays to travel through them. A glass has little atri because you can see through them. A glass is made from soil by removing atri from it. The moonlight is a reflection of the sun’s rays. The moon is filled with atri and hence is able to hold the sun’s rays and not let pass through. Thus it can be said it is atri which gives the moon its form. The moon is called the son of atri. Pandit Madhusudan Ojha has given a detailed explanation of atri in his book, Atri-khyati.

 

(Pandit Motilal Shastri, Ishvarkrishna-rahasya, pages 158-159)




 

अत्रि

 

अत्रि परमेष्ठीमण्डल का तीसरा मनोता है। यह अत्रि प्राण सूर्य की रश्मि का अवरोधक (रोकने वाला तत्त्व) है। सूर्य की किरणें सीधी आती रहती है परन्तु अत्रि प्राण से जब वे किरणें रोक दी जाती है तो फिर रश्मियाँ आगे नहीं जा सकतीं । आती हुई सूर्य-रश्मियों को यह अत्रिप्राण अपने में ग्रहण कर लेता है। अत् एव अस्तीति इस व्युत्पत्ति से इस प्राण का नाम ‘अत्रि’ है। संसार के जिस पदार्थ में पारदर्शी (आर-पार देखने का) का अभाव प्रतीत होता है वह अत्रि प्राण की ही महिमा है। जितने भी घन पदार्थ दिखलाई पड़ते हैं। जिनके आवरण से उस पार की वस्तु नहीं दिखलाई पड़ती । उन सारे पदार्थ को अत्रि प्राण समझना चाहिए। यदि उन पदार्थों से अत्रि प्राण निकाल दिया जाय तो उसी समय  सूर्य-रश्मि अर-पार निकल जायेगा। काँच (शीशे) में अत्रिप्राण अल्प मात्रा में रहता है । अत एव उस में आर-पार की वस्तु स्पष्टता से  दिखाई देती है। मिट्टी से ही काँच बनता है। इस में केवल अत्रिप्राण को हटाया जाता है। तात्पर्य यही है कि जो प्राण आती हुई सूर्य-रश्मियों को अपने में ग्रहण कर पदार्थों को पारदर्शी शक्ति से रहित बना देता है। वही अत्रि प्राण कहलाता है। यह अत्रि ‘न त्रिः’ इस व्युत्पत्ति से अत्रि नाम से व्यवहृत होता है। चन्द्रमा में जो प्रकाश दीख रहा है वह सूर्य का प्रकाश है। चन्द्रमा में अत्रि प्राण भरा हुआ है। यदि चन्द्रमा में अत्रि प्राण नहीं होता तो सूर्यरश्मियाँ  चन्द्रमा से बाहर आ जाता।  चन्द्रमा  के स्वरूप को बनाने वाला यही अत्रिप्राण है। अत एच चन्द्रमा को अत्रि का पुत्र कहा जाता है।  पण्डित मधुसूदन ओझा का अत्रिख्याति ग्रन्थ इसी विषय को स्पष्ट करता है।

 

(पण्डित मोतीलाल शास्त्री, ईश्वरकृष्णरहस्य पृ. १५८-९)