ritam

In the Vedas, the term `ritam` means `truth`. So does `satyam`. What then is the difference? `ritam cha satyam cha abhidhat`, says the Rigveda. It means both ritam and satyam are attained from consciousness. Here, ritam and satyam have been used to mean `truth`.  Famous commentator on the Rigveda, Sayanna has explained that the truth perceived by mind was ritam and the truth which was spoken was satyam. Pandit  Madhusudan Ojha has argued that satyam was born out of ritam and ritam was rooted in satyam. He said while ritam was infinite, it finds its form in satyam.


Ojhaji in his explanation has taken a reference from Taiterriya Brahmana where ritam is described as parmeshthi. In ritam is the ocean and in ocean is earth. By using this reference, Ojhaji has given a broader meaning to the term, ritam, unlike Acharya Sayann who had confined its meaning to mind and speech.


The Upanishads offer a similar illustration. Brahma has created the universe and Brahma dwells within this universe. This phenomenon can be illustrated as follows: A pot is made out of earth. The pot is filled with earth. Earth here is ritam and the pot symbolises satyam. Without earth, there can be no pot. 


Pandit Motilal Shastri has explained the term in the following way: ahridayam ashariram ritam. It means ritam has no form or centre.


Rishi Kumar Mishra has explained this lucidly in his book The Cosmic Matrix: In the Light of the Vedas. ``Ritam is that tatva, or portion of a tatva, that has no body and no centre or navel. In contrast, the satyam portion of a tatva possesses a body and therefore has a centre or navel. The Veda is comprised of the fundamental tatva permeated with ritam and satyam. Rishis have said: `ritam is parmeshthi. No one can transgress ritam. The ocean is located in ritam and the earth is established in it`. ``


In Veda vijnana, ritam finds broader, and deeper, connotations. It means rasa—the essential element; it is also amrita vak, the eternal essence from where speech is born. It is agni (fire) and apa (water).  Since universe is created from two elements--agni (fire) and soma (water), ritam is an intrinsic element of creation.

 

ऋत
 

वेद में ऋत का प्रयोग सत्य के अर्थ में हुआ है। सृष्ट विषयक ऋग्वेद का ‘ऋतं च सत्यं च अभिधात्’[1] यह मन्त्र  प्रमुख है। इस मन्त्र में ऋत और सत्य दोनों पद सत्य के लिए आया है। ऋग्वेदभाष्यकार सायण ने लिखा है कि जो मानसिक सत्य है वह ऋत कहलाता है और उसका स्वरूप यथार्थसंकल्प है। जबकि सत्य वाचिक होता है और उसका स्वरूप यथार्थभाषण है।[2] ये दोनों पद ऋत और सत्य एक साथ जुड़ा हुआ ही प्रयोग में मिलता है। यहाँ वैदिकविज्ञान के अनुसार ऋत के अर्थों को स्पष्ट किया जा रहा है।
 

ओझा जी के अनुसार ऋत की परिभाषा है- ऋत से सत्य की उत्पत्ति होती है और सत्य में ऋत प्रतिष्ठित रहता है । वह ऋत असीम है और सत्यरूप शरीर में उसका सीमाभाव होता है।[3]
 

ऋत की इस परिभाषा को इस प्रकार समझा जा सकता है- जिस प्रकार कुम्भकार मिट्टी से घड़ा को बनाता है और उसी घड़ा में मिट्टी को भरकर किसी काम के लिए वह रख लेता है। जिस प्रकार मिट्टी से घड़ा बनता है उसी प्रकार ऋत से सत्य की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार घड़ा में मिट्टी रहती है उसी प्रकार सत्य में ऋत रहता है। जिस प्रकार मिट्टी की कोई सीमा नहीं होती है उसी प्रकार ऋत की भी कोई सीमा नहीं होती है, इसीलिए ऋत को असीम (सीमा रहित) कहा है।  जैसे घड़ा में ही मिट्टी सीमित रहती है। वैसे ही सत्यरूप शरीर में ऋत सीमित रहता है। इसी बात को उपनिषद् भी कहता है ब्रह्म से जगत् की सृष्टि होती है और सृष्टि के बाद जगत् में ब्रह्म रहता है।[4]
 

ऋत की व्याख्या के क्रम में ओझा जी ने तैत्तिरीयब्राह्मण के एक मन्त्र को उद्धृत किया है-

ऋत ही परमेष्ठी है, ऋत का कोई अतिक्रम अर्थात् पार नहीं करता, ऋत में ही समुद्र रहता है तथा ऋत में ही यह भूमि प्रतिष्ठित है।[5] यह मन्त्र ऋत को व्यापक अर्थ में समझाया है। जबकि सायणाचार्य इसको मन एवं वाणी के स्तर तक ही रखा है।
 

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने इस का अर्थ इस प्रकार किया है- अहृदयं अशरीरं ऋतम्, हृदय अर्थात् केन्द्र, जिन पदार्थों का न कोई स्वतन्त्र केन्द्र होता है और न कोई अपना स्वतन्त्र पिण्ड अथवा आकार होता है वे पदार्थ ऋत कहलाते हैं।[6] यहाँ केन्द्र और शरीर को समझना आवश्यक है। केन्द्र का अर्थ है स्थान। जैसे  सूर्य,  चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा, पत्थर इत्यादि स्थान भी होता है और शरीर भी है। परन्तु प्राण, वायु, सोम और वायु का कोई अपना न तो केन्द्र होता है और न ही कोई शरीर होता है। किसी दूसरे आधार में ही इसका ज्ञान होता है। ऋत का भी यही स्थित है।
 

 ऋत जलस्वरूप है।[7] वैदिकविज्ञान में दो सामानान्तर पारिभाषिक शब्दों को लेकर व्याख्या चलती है। अग्नि और सोम इन दो पदार्थों को मिला कर संसार है। सोम का स्वरूप जल है। अत एव ऋत सोमस्वरूप है।
 

ऋत का अर्थ रस है।[8] वैदिकविज्ञान में रस को मूल तत्त्व के रूप में स्थापना की गयी है। इस से ऋत को प्रधान तत्त्व के रूप में बतलाया है।
 

ऋत का अर्थ अमृत वाक् है।[9] ऋत सीमा रहित वाक् है, उसमें प्राण अन्तर्निहित रहता है।[10]
 

प्राण और आत्मा के योग से आकाश ऋतवाक् और शब्दगुण वाला है। जिससे  क्रमशः वायु, तेज, जल, अन्न और स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं ।[11]
 

इस प्रकार ओझा जी ने ऋत को दार्शनिक तत्त्व के रूप में व्याख्या की है और इसके अनेक रूप हैं। जैसे ब्रह्म एक तत्त्व है और उसके अनेक रूप होते हैं वैसे ही यह ऋत पदार्थ है।

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[1] ऋग्वेद  १०.१२.१९०

[2] ऋतं मानसम् यथार्थसंकल्पं सत्यं वाचिकं यथार्थभाषणम्। ऋग्वेद,सायणभाष्य १०.१२.१९०

[3] ऋतादुत्पद्यते सत्यमृतं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।

अमितं तद् ऋतं सत्यशरीरे तन्मितं भवेत् ॥ ३॥ ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३३ कारिका ३

[4] तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्। तै. उप.

[5] ऋतमेव परमेष्ठि ऋतं नात्येति किञ्चन ।

ऋते समुद्र आहितं ऋते भूमिरियं श्रितौ ॥ तैत्तिरीयब्राह्मण १/५/५/१, विज्ञानविद्युत् पृ. ३८, पण्डित मोतीलाल शास्त्री, ईश्वरकृष्णरहस्य पृ.१६९, ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३३

[6] पञ्चव्याख्यान, पण्डित मोतीलाल शास्त्री, पृ. ४९-५०

[7] () ऋतमापः। ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३३ कारिका ७

(ख) ऋतमापस्तु । ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३४ कारिका १२

[8] ऋतं रसः। ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३३ कारिका २०

[9] अमृता वागृतं रूपम्। ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३४ कारिका १२

[10] ऋतं तावदसीमा वाक् तत्र प्राणोऽन्तराहितः। ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३४ कारिका १७

[11] आकाश ऋतवाक्छब्दगुणः प्राणात्मयोगतः।

वायुस्तेजो वारि वान्नं भूतं स्थूलं क्रमादभुत्॥ ब्रह्मसमन्वय अव्ययानुवाक पृ. ३४ कारिका ९