akshara

Akshara is an important term in the Indian philosophy. Its references are found in sacred texts like Shrimad Bhagvad Gita and Upanishads. The universe is created from akshara. From akshara, animate and inanimate materials are born. It is stated in Mundakopanishad that akshara is Brahma. In Geeta too, there is a reference that Brahma was born from akshara. Shvetashvatara Upanishad states that creation emerged from the fusion of akshara and kshara. Based on these evidences, Pandit Madhusudan Ojha has given an elaborate scientific (Vedic vijnana) explanation of this term in his works.


One that is indestructible is akshara. It has five forms—Brahma, Vishnu, Indra, Agni and Soma. These forms are further divided into two sections—hrudya and prushtya. Hrudya means interior and prushtya denotes exterior. While Brahma, Vishnu and Indra are hrudya, Agni and Soma are prushtya. Brahma’s form is pratishta-maya, Vishnu’s yajna-maya, Indra’s virya-maya, Soma’s sankoch-maya and Agni’s form is vikas-maya. Brahma, Vishnu, Indra, Agni and Soma are also known as shabda. These devatas are responsible for the creation, establishment, growth and destruction of this universe.

In five akasharas, Brahma is Veda-maya, Vishnu yajna-maya, Indra praja-maya, Agni loka-maya and Soma dharma-maya. They represent Veda, yajna, praja, loka and dharma.

In darshan-shastras (Indian philosophical treatises), three reasons  for existence are examined. A pitcher, for instance, is made of mud, so mud is samavayi karana or basic or fundamental reason . The one without which the work cannot be undertaken is samavayi karana. A pitcher is made by combining or mixing several portions of mud and this process is known as asmavayi karana or secondary cause.. Pandit Ojha has used the term sahakari karana or subsidiary cause. The akshara in the form of Brahma is vak and sahakari karana. The akshara in the form of Indra is pranamaya and secondary. The akshara in the form of Vishnu is manomaya and nimitta karana.

Akshara is known as bhutabrith (the one that assumes the form of living beings) Pandit Ojha has elucidated aspect quite clearly by citing the example of vayu or air present in the clear sky. He says the same sky envelops the air also. Similarly, the entire universe operates in the static akshara. The same akshara envelops the universe. This relationship makes the akshara bhuthabrith. This akshara is active and is all-powerful; it is the basis of the universe and is always active.

Pandit Madhusudan Ojha has explained about akshara in his works like Brahmasidhantha, Brahmasamanvaya, Brahmachatushpadi and Brahmavinaya.

 

अक्षर

भारतीय दार्शनिक शाखाओं में अक्षर एक प्रमुख पारिभाषिक पद है। इसका सन्दर्भ उपनिषद्, गीता आदि ग्रन्थों मिलता है। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि वही यह अक्षर ब्रह्म है।[1]  अक्षर से ही यह विश्व उत्पन्न होता है। [2] अक्षर से अनेक प्रकार के मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं।[3] श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णित है कि अक्षर और क्षर के मिलन से सृष्टि हुई है।[4] गीता में भी कहा गया है कि अक्षर से ब्रह्म उत्पन्न हुआ है।[5] इन सभी प्रमाणों के आधार पर पण्डित मधुसूदन ओझा ने  वैदिकविज्ञान के अनुरूप अपने ग्रन्थों में अक्षर के विविध आयामों को स्पष्ट किया है।

 

 

जिस का कभी नाश नहीं होता है वह अक्षर है। इस अक्षर के पाँच कला हैं- ब्रह्मा,  विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम।[6]  इन पाँचों को पुनः दो भागों में बाँटा गया है। हृद्य और पृष्ट्य।[7] हृद्य का शाब्दिक अर्थ भीतरी होता है और पृष्ट्य का अर्थ है बाहर है। - ब्रह्मा,  विष्णु, इन्द्र हृद्य हैं और अग्नि और सोम पृष्ट्य हैं। उनमें  ब्रह्मा का स्वरूप प्रतिष्ठामय, विष्णु का स्वरूप यज्ञमय, इन्द्र का स्वरूप वीर्यमय, सोम का स्वरूप संकोचमय और अग्नि का स्वरूप विकासमय है।[8]

 

[1] तदेतदक्षरं ब्रह्म। मुण्डकोपनिषद् २/२/२

[2] तथाक्षरात्सम्भवतीहविश्वम्। मुण्डकोपनिषद् १/१/७

[3] तथाऽक्षराद्विविधाः सौम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति। मुण्डकोपनिषद् १/१/१

[4] संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च। श्वेताश्वतरोपनिषद् १/८

[5] ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। गीता ३/१५

[6] (क) इत्थं मायावरुद्धानां बलानां भेदतऽक्षराः।

ब्रह्मेन्द्रविष्णोग्निसोमा अमी पञ्च निरूपिताः॥ ब्रह्मसमन्वय पृ.१३४, श्लोक ६१; पृ.१४७, श्लोक ६१; पृ.१४१, श्लोक ४४

(ख) पञ्चाक्षरा अव्ययसन्निविष्टा ब्रह्मेन्द्रविष्णू अपि चाग्निसोमौ। ब्रह्मचतुष्पदी पृ. १२; पृ.८६; पृ.१२

(ग)ब्रह्मेन्द्रविष्णू अथ चाग्निसोमौ तमेनमग्निम् । ब्रह्मसिद्धान्त, पृ.१७२, श्लोक २९०; पृ.१०७ गद्यभाग

(घ) अथैतेषां क्षरपुरुषविकाराणां नियन्ता तेष्वेवानुस्यूतोऽक्षरपुरुषो भवति। सोऽपि पञ्चलक्षणो द्रष्टव्यः- ब्रह्मा इन्द्र अग्नि सोम इति भेदात् । विज्ञानविद्युत् पृ.१०

[7] आद्यास्त्रयोऽक्षरा हृद्याः। अन्त्यौ द्वौ पृष्ट्यौ।  विज्ञानविद्युत् पृ.१०

[8] तत्र हृद्याक्षरत्रये प्रतिष्ठामयो ब्रह्मा, यज्ञमयो विष्णुः, वीर्यमय इन्द्रः सङ्कोचमयः सोमः विकासमयोऽग्निः। विज्ञानविद्युत् पृ.१०