ananda

Ananda

 

 The term, ananda, has a unique meaning and significance in the Indian philosophy. It has several meanings. The most widely known meaning is `bliss` which in turn is variously understood as `happiness` or a state of being where there is no joy or sorrow, only the awareness of existence.

In the upanishads, ananda is the Brahma. Rishi Kumar Mishra in The Cosmic Matrix, has explained that the Brahma which exists everywhere as pure existence is sat. The awareness of its existence is chitta and ananda is the quintessence, the tatva, that is bliss. To be in a state of bliss, through realising the essence of this existence, is the fusion of these three dimensions of sat, chitta and ananda. This is Brahma and this is the way to encounter the source of the cosmos.

In the words of Pandit Madhusudan Ojha, whose writings on the subject forms the foundation of what his disciple Pandit Motilal Shastri wrote and Pandit Shastri’s disciple Rishi Kumar Mishra later expounded in his five works,  ananda is the rasa, the basic essence of all creations. He has explained in many of his works like Brahmasidhantha and Sanshayatucchedavada that In the process of creation, rasa becomes discernible in the form of bala. But, bala only begins to flow with the support of rasa, which is an aggregation of sat, chitta and ananda .

According to many shrutis, the entire discernible and visible universe is a manifestation of atma. And atma is a composition of mana, prana, vak, vijnana and ananda. Similarly, it has been said that all the objects and individuals in the universe are products of prajapati. The Avyaya Prajapati is five dimensional, comprising of ananda, vijnana, mana, vak and prana.

Thus it can be seen that the term, ananda, denotes a state of pure existence.

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A short glossary of terms used in this note: prana--supraphysical energy, rasa--a supraphysical essence, tattva--essence; the fundamental factor from which something evolves;vak--the substance in an object; the matter within the shell; speech;mana-- one of three components of atma, the other two being prana and vak; also translated as ‘mind’ or ‘heart’; vijnana--knowledge of how the variegated universe evolves from a unified, single harmonious tattva; science; bala--the first formation in the process of creation when rasa, the vast limitless stillness, is stirred and a unifying principle begins to divide itself into separate and diverse units of supraphysical energy.

 

आनन्द

भारतीय दर्शन में आनन्द का विशेष स्थान है। उपनिषद् कहती है कि आनन्द ही ब्रह्म है।[1]

ओझाजी के अनुसार आनन्द ही रस है [2] और आनन्द दो प्रकार का है-शान्त और समृद्ध। जिस आनन्द का विषयों के साथ सम्बन्ध नहीं होता वह शान्त है और जिस आनन्द का विषयों के साथ  सम्बन्ध होता है वह समृद्ध है।[3] यहाँ सम्बन्ध से तात्पर्य है कि आनन्द अपनी ही शक्ति माया के साथ मिलकर सृष्टि करता है। सृष्टि के समय दोनों में परस्पर सम्बन्ध होता है यही सम्बन्ध विषय है। जब आनन्द को सृष्टि की इच्छा नहीं होती है तो वह शान्तभाव में रहता है। इसी प्रकार की स्थिति मनुष्य में भी है। जब मानव किसी भी चीज की इच्छा करता है तो इच्छित वस्तु ही विषय है। विषयों से ही मनुष्य समृद्ध होता है।  इस व्याख्या में शान्त और समृद्धि  रूप आनन्द का विवेचन किया गया है।

अव्यय पुरुष की कलाओं में सर्वप्रथम जो आनन्द है, वह दो प्रकार का है एक शुद्ध रसरूप केवलानन्द और दूसरा रसबल समन्वित बलानन्द। लौकिकी उन्नति बलानन्द का रूप है। शुद्ध रस रूप आनन्द शान्तिघन है, उसमें विकारमयी सारी चेष्टायें शान्त हो जाती हैं, वह बलानन्द से सर्वथा भिन्न है।[4]  इस संसार में वस्तु से, पुत्र से, पद से और धन से जो आनन्द मिलता है वह बलानन्द है जबकि केवलानन्द में  ब्रह्म का जीव के साथ समभाव  होता है।

सृष्टि का कारक आनन्द है। ओझाजी ने इस प्रसंग को मैथुनी सृष्टि से जोड़कर व्याख्या की है। इस विषय को ओझाजी ने ब्रह्मसिद्धान्त की आनन्दकारणता अधिकरण में एवं संशयतदुच्छेदवाद की आनन्दस्योत्पत्ति नामक शीर्षक में किया है।

यदि आनन्द नहीं रहता तो प्रजोत्पत्ति नहीं हो सकती। इसमें प्रधान कारण आनन्द है।[5] जिसके जीवन में प्रसन्नतारूप हर्ष का उदय नहीं हो पाता वह दुःख में डूबता हुआ इस संसार में चिरकाल तक जीवित नहीं रह पाता। प्रत्येक प्राणी हर्षमात्रा से ही जीवन लाभ करता है। वह सब ओर से सब प्रकार से अन्नों के द्वारा तृप्ति पाकर यहाँ जीता है।[6]

इस प्रकार शुद्ध आनन्द, समृद्ध आनन्द, केवलानन्द और बलानन्द के माध्यम से आनन्द को परिभाषित किया है। बृहदारण्यक उपनिषद् की स्पष्ट घोषणा है कि आनन्द की मात्रा के आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं।[7] इस उपनिषद् वाक्य से स्पष्ट होता है कि आनन्द ही जगत् का कारण तत्त्व है।

 

[1] आनन्दो ब्रह्म व्यजानात्।

                                -तैत्तिरीयोपनिषद् ३.६.१

आनन्दं ब्रह्म।

                 -बृहदारण्यक उपनिषद्, ३.९.२८

 

[2] आनन्दो रस इष्यते।

                       -ब्रह्मसमन्वय, पृ.५०, श्लोक- १८८

 

[3] () आनन्दो द्विविधः शान्तः समृद्ध इति भेदतः।

अस्पृष्टो विषयैः शान्तः समृद्धो विषयाश्रिताः।

                                                  - ब्रह्मसमन्वय, पृ. ६१, श्लोक- ३२१

()आनन्द एष द्विविधोऽस्ति तावत् छान्तः समृद्ध्यश्च रसो एकः।

शान्त यो भिन्नरसो विभिन्नैरर्थैं कृतात्मा मितःसमृद्धः॥

                                                   -संशयतदुच्छेदवाद, प्रथमभाग, पृ. ११७, श्लोक- ६९

 

[4] य एष आनन्द इहोदितः स द्विधा रसोऽन्योऽस्ति बलं तथान्यत्।

भूमासमृद्ध्यास्ति बलात्मकोऽसौ रसात्मकः शान्तिघनः सभिन्नः॥

-ब्रह्मसिद्धान्त, पृ. १७०, श्लोक-२८५

 

[5] स्त्रीपुंसयोर्यत्र न हर्षसंभवस्तदा न गर्भस्थितिरिष्यते क्वचित्।

गर्भच्युतिः स्याच्च विषादसंस्रवादानन्दतः सर्वमिदं प्रजायते॥

-ब्रह्मसिद्धान्त, पृ.२३५, श्लोक- १६५

- संशयतदुच्छेदवाद, पृ. १३०, श्लोक -८९

 

[6] न जीवने यस्य तु हर्षसंभवश्चिरं न जीवेत् स इहार्ति संप्लुतः।

प्रतिक्षणं जीवति हर्षमात्रया स सर्वतोऽन्नादिह तृप्तिमश्नुते॥

-ब्रह्मसिद्धान्त, पृ.२३५, श्लोक- १६६

-संशयतदुच्छेदवाद, पृ. १३१, श्लोक- ९०

 

[7] एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति।

-बृहदारण्यक उपनिषद् ,४.३.३२