Triloki

The term `triloki` is an important terminology in Vedic science. It defines three triple worlds that comprise Brahmand, the whole of creation. An understanding of the meaning and scope of this term helps in getting a sense of brahmand (entire cosmos). This `triloki` straddles bhuloka (earth) to svargaloka (heavens).

This triple worlds are made up of rodasi, krandasi and samyati. Of the three triple worlds, the one which contains the earth, the sun and the interspace between them is called rodasi. The sun takes place of earth in the second triple world; parameshthi is dyauloka and the interspace is antariksha—this middle triple world is known as krandasi. In the third triple world, parameshthi takes the place of earth, svayambhu is the dyauloka and the space between the two is antariksha. This world is called samyati. In other words, there are three prithvis (earths), three dyaulokas (heavens) and three interspaces (antariskhas) in the three triple worlds.

From these three triple worlds, seven lokas are formed. These seven lokas are: 1. bhuloka, 2. bhuva loka, 3. swar loka, 4. maha loka, 5 jnana loka, 6. tapa loka and 7. satya loka. Pandit Madhusudan Ojha has explained the concept of triple worlds in detail in many of his books, including Indravijayah. The english translation of Indravijayah was recently published as Bharatavarsha--The India Narrative.

 

 

त्रिलोकी वैदिकविज्ञान का मुख्य पारिभाषिक शब्द है। इसको समझने से ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता है। यह त्रिलोकी पृथ्वीलोक से स्वयम्भूलोक तक फैला हुआ है। रोदसी, क्रन्दसी और संयती ये तीनों मिलकर त्रिलोकी है। ये तीनों शब्द स्त्रीलिंग में एवं द्विवचन में हैं, क्योंकि पृथ्वी और द्युलोक को बतलाती हैं।

 

रोदसी- रोदसी त्रिलोकी का पहला हिस्सा है। यह जो भूमि है, जिस पर हम रहते हैं, वह पृथ्वीलोक है। सूर्य द्युलोक है। इन दोनों लोकों के बीच में अन्तरिक्ष है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक को क्रमशः भूः, भुवः और स्वः कहते हैं।[1]

 

क्रन्दसी-  त्रिलोकी का दूसरा हिस्सा क्रन्दसी है। सूर्य पृथ्वी स्थानीय है, परमेष्ठी द्युलोक है। इन दोनों के बीच में अन्तरिक्ष है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक को क्रमशः स्वः, महः और जनः कहते हैं। ये तीनों मिलकर क्रन्दसी है।[2]

 

संयती-त्रिलोकी का तीसरा हिस्सा संयती है। यहाँ परमेष्ठी पृथ्वी स्थानीय और स्वयम्भू द्युलोक है। इनके बीच में अन्तरिक्ष है । पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक को क्रमशः जनः, तपः और सत्यम् कहते हैं। ये तीनों मिलकर संयती है।[3]


भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ही सप्त महाव्याहृतियाँ हैं। स्वः एवं जनः को दो बार रखा जाता है। सात एवं दो मिल कर नौ हो गये। तीन-तीन का एक त्रिलोकी बनता है। संस्कृत वाङ्मय में रोदसी आदि पदों का अत्यधिक प्रयोग मिलता है तथा इसकी वैज्ञानिकी व्याख्या ओझाजी ने अपने ग्रन्थों में किया है।

सन्दर्भ :

१. वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति, गिरिधरशर्मा चतुर्वेदी, पृ. १००

 

२. ऋग्वेद में

                    चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि ।

                    न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी

                                                                                -ऋग्वेद-१.१०५.१

 

यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेताम् मनसा रेजमाने।

यत्राधि सूर उदितो विभाति कस्मै देवा हविषा विधेम ।।

                                                            -ऋग्वेद-१०.१२१.६

 

पुष्यात्क्षेमे अभि योगे भवात्युभे वृतौ संयती सं जयाति ।

प्रियः सूर्ये प्रियो अग्ना भवाति य इन्द्राय सुतसोमो ददाशत् ॥

                                                        -ऋग्वेद-५.३७.५

 

३. साहित्य-शास्त्र में महाकवि कालिदास का प्रयोग :-

वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाक्षरः ।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते
सः स्थाणुः स्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायाऽस्तु वः ।।

- विक्रमोर्वशीय-१.१

 

[1] अपि च प्रतिलोकं पुनस्त्रैविध्यात् त्रेधा त्रैलोक्यं सम्पद्यते। येयं तावद् भूमिर्यामधिष्ठामः सा पृथिवी। सूर्यो द्यौः। उभयोः सैषा द्यावा-पृथिवी मध्यमेनान्तरिक्षेण प्रथमा त्रिलोकी सम्पद्यते स रोदसी नाम।

-विज्ञानविद्युत् पृ.४६

[2]  एवमसौ सूर्यः पृथिवी । परमेष्ठी द्यौः चैषा द्यावापृथिवी मध्यमेनान्तरिक्षेण द्वितीया त्रिलोकी सम्पद्यते सा क्रन्दसी नाम।

                                             - वही, पृ.४६

[3] अथैवमसौ परमेष्ठी पृथिवी। स्वयम्भूर्द्यौः। उभयी चासौ द्यावापृथिवी मध्यमेनान्तरिक्षेण तृतीया त्रिलोकी सम्पद्यते सा संयती नाम।

            -वही पृ.४६