Pandit Motilal Shastri Smriti Vykhyanmala-2017

 

Pandit Motilal Shastri Smriti Vykhyanmala-2017

Jodhpur

 

Vedic Vijnana is as relevant today as in the past, said  Prof. Ganeshilal Suthar, well-known Vedic scholar and former director of Pandit Madhusudan Ojha Shodh Prakosht, Sanskrit Department, Jai Narain Vyas University, Jodhpur. He was speaking at the Pandit Motilal Shastri Smriti Vyakhyanmala-2017 (Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture Series 2017) jointly organised by Shri Shankar Shikshayatan and Pandit Madhusudan Ojha Shodh Prakosht at Jodhpur on December 21, 2017.

In his address, Prof. Suthar highlighted the importance of Pandit Madhusudan OjhaÔÇÖs works on the different aspects of Vedic vijnana. He specifically mentioned the book authored by Pandit Ojha titled Sharirika-vimarsha.

Prof Satyaprakash Dubey,Acharya, Sanskrit department, Jai Narain Vyas University, referred to the works of Pandit Ojha to drive home the point that it was not enough to learn the correct way of offering vedic mantras but it was equally important to study their meanings. He dwelt on the meaning of dharma and stressed on the importance of Vedas in contemporary times.

Vedic Vijnana is as relevant today as in the past, said  Prof. Ganeshilal Suthar, well-known Vedic scholar and former director of Pandit Madhusudan Ojha Shodh Prakosht, Sanskrit Department, Jai Narain Vyas University, Jodhpur. He was speaking at the Pandit Motilal Shastri Smriti Vyakhyanmala-2017 (Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture Series 2017) jointly organised by Shri Shankar Shikshayatan and Pandit Madhusudan Ojha Shodh Prakosht at Jodhpur on December 21, 2017.

 

पंडित मधुसूदन ओझा प्रकोष्ठ, संस्कृत विभाग, जेएनवीयू एवं श्री शंकर शिक्षायतन, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान मे गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र में पंडित मोतीलाल शास्त्री स्मृति व्याख्यान माला का आयोजन हुआ। कार्यक्रम के अंतर्गत प.मधुसूदन ओझा प्रकोष्ठ के पूर्व निदेशक एवं राष्ट्रपति सम्मानित प्रो. गणेशीलाल सुथार ने प. मधुसूदन ओझा रचित शारीरक विमर्श ग्रंथ के वैशिष्टय को उद्घाटित किया।

प्रो. सुथार ने कहा कि ब्रह्मसूत्र के शारीरकावेज्ञानभाष्य की रचना के पश्चात् शारीरक विमर्श करने की आवश्यकता प. मधुसूदन ने अनुभव की एवं आत्मतत्त्व का सम्यक् निरूपण पृथक ग्रंथ में किया। द्वितीय व्याख्यानमाला के अंतर्गत प्रो. सत्यप्रकाश दुबे ने प. ओझा के ग्रंथ वेदधर्म की तात्त्विक दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि वेद के मंत्रों का उच्चारण पर्याप्त नहीं, उसके अर्थ के अनुसंधान की भी आवश्यकता है।

धर्म शब्द की चर्चा करते हुए कहा कि जो प्रकृति, समाज और व्यक्ति तीनों स्तरों पर बाधित न हो, वह धर्म है। उन्होंने कहा की वर्तमान में भी वेद और वैदिक शिक्षा प्रासंगिक है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सत्यानंद जी वेदवागीश ने मैक्समूलर को उदृत्त करते हुए कहा कि त्रृग्वेद विश्व का प्राचीनतम साहित्य है। उन्होंने कहा कि वैदिक साहित्य पर व्याख्यान पर्याप्त नहीं अपितु जनजीवन भी उससे जुड़े तथा स्वयं के स्तर पर भी वेदों के ज्ञान का प्रसार आवश्यक है।

शोध प्रकोष्ठ की निदेशक एवं अध्यक्ष प्रो. प्रभावती चौधरी ने शोध प्रकोष्ठ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए पं. ओझा के व्यक्तित्व कृतित्व से अवगत करवाया। इस अवसर पर गत 20 वर्षों से प्रकोष्ठ की निस्वार्थ सेवा में संलग्न डाॅ. छैलसिंह राठौड़ का अभिनंदन किया। संचालन डाॅ. दीपमाला गहलोत ने किया एवं पं. नीतेश व्यास ने वैदिक मंगलाचरण किया। संस्कृत विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. मंगलाराम विश्नोई ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

आचार्य जी ने वेदों एवं संस्कृत के सार को प्रकट किया।  व्याख्यानमाला कार्यक्रम के प्रारम्भ में शोध प्रकोष्ठ की निदेशक एवं अध्यक्ष प्रो. प्रभावती चौधरी ने शोध प्रकोष्ठ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए पंडित ओझा के व्यक्तित्व व कृतित्व से अवगत करवाया।

 

 

Newsreports

http://www.dainiknavajyoti.net/jodhpur/Vedas-and-Vedic-education-are-still-relevant.html

Dainik Navajyoti, December 22, 2017

 

https://www.bhaskar.com/rajasthan/jodhpur/news/RAJ-JOD-HMU-MAT-latest-jodhpur-news-052602-742777-NOR.html

Dainik Bhaskar, December 22, 2017