Vijnana chitravali

chitravali

This is an lllustration drawn by Pandit Motilal Shastri to explain the process of creation through the principles of Vedic vijnana.

On the right is a representation of the five elements--Brahma, Vishnu, Indra, Agni and Soma. These elements are listed as prana (breath or life), apa (water), vak (word), anna (nourishment) and annada (one who takes nourishment).

These five elements also represent svayambhu, Vishnu, parameshti, surya, prithvi and chandrama. The sixteenth element is prajapati. This is called shodashi or shodaskala.

Prajapati is mentioned here by two names—param prajapati and pratima prajapati. Pandit Motilal Shastri writes that in shodashi prajapati resides four prajapatis like parameshti.

The first brahmapur of shodashi prajapati is svayambhūmaṇḍala. Four prajapatis resides in this. In svayambhu resides parameshti, in parameshti resides surya, in surya resides prithvi and in prithvi resides moon. In this param or supreme prajapati resides four prajapatis and hence it is called pratima prajapati or the idol of prajapati.
 

Thus, the image of the entire universe has been created in this illustration.

 

 

वैदिकविज्ञान में सृष्टि प्रक्रिया को अनेक सिद्धान्तों के माध्यम से सरलता पूर्वक समझाने का प्रयास किया है। इस चित्र के दायें भाग में पाँच तत्त्वों के निरूपण है। ये हैं- ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम। ये पाँच अक्षर हैं।

ये पाँचों क्रमशः क्षर नाम से है- प्राण, आप (जल), वाक्, अन्न को खानेवाला (अत्ता/अन्नाद) और अन्न हैं। ये पाँचों क्रमशः स्वयम्भू, विष्णु, परमेष्ठी, सूर्य, पृथिवी और चन्द्रमा हैं। सोलहवां तत्त्व प्रजापति है। इसी को षोडशी अथवा षोडशकल कहा जाता है।


प्रजापति को यहाँ दो नामों से बताया गया है। परम प्रजापति और प्रतिमा प्रजापति। प्रतिमा प्रजापति के बारे में पण्डित मोतीलाल शास्त्री लिखते हैं कि षोडशी प्रजापति में परमेष्ठी आदि चार प्रजापति रहते हैं। षोडशी प्रजापति का पहला ब्रह्मपुर स्वयम्भूमण्डल है। इसमें चारों प्रजापति रहते हैं।


स्वयम्भू में महिमा विशिष्ट परमेष्ठी, परमेष्ठी में महिमा विशिष्ट सूर्य, सूर्य में महिमा विशिष्ट पृथिवी, पृथिवी में महिमा विशिष्ट चन्द्रमा रहता है। उस परम प्रजापति में संस्था बनाकर चारों प्रजापति रहते हैं। अत एव इन्हें प्रतिमा प्रजापति कहते हैं।


इस प्रकार इस चित्र के माध्यम से संपूर्ण ब्रह्माण्ड का दिग्दर्शन कराया गया है।