Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture Series at Jodhpur 2019

 

Shri Shankar Shikshayatan, New Delhi, and Pandit Madhusudan Ojha Shodh Prakosht, Jai Narain Vyas University, Jodhpur, jointly organized the Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture Series at Gandhi Peace Foundation, Jodhpur on February 23, 2019. The theme of the lecture was Veda-shastraBharatvarsha ki maulik nidhi (India’s original legacy).

 

The university chancellor, Prof. Gulab Singh Chauhan, said discussions on vVeda-vijnana was essential to educate the new generation about the wisdom contained in the Vedas. He said the Pandit Madhusudan Ojha research centre was engaged in publishing works of Ojhaji to promote his teachings among a wider audience.

 

The main speaker, Prof. Arknath Chaudhary, former Vice Chancellor, Somnath Sanskrit Vishvavidyalaya, Gujarat, said Pandit Shastri in his works had explained the process of Creation through the medium of agni and soma. He has shown how agni or fire is vayu or air and aditya (sun). Agni, vayu, aditya and varun are Rik, Yaju, Som and Atharva.These four elements thus constitute the four Vedas.

 

Chairing the session, Prof. Ganeshi Lal Suthar, former Director, Pandit Madhusudan Ojha Shodh Prakosht, Jai Narain Vyas University, Jodhpur. Said Pandit Motilal Shastri had explained the veda-tatva in different forms. In his explanation, both the tatva (essence) and the text could be found. He argued that since there was a text, there was bound to be an author of the text and hence the Vedic text was paureshaya (created by man). But veda-tatva is the breath of parameshvar and hence it is also apaureshaya (not created by man).

 

Prof. Kaushal Nath Upadhyaya, who spoke as a special guest, said Veda always inspire us to do karma (act) and it was a priceless legal of our Indian culture.

 

Prof. Saroj Kaushal, Department of Sanskrit, Jai Narain Vyas University, in her introductory speech said Shastriji had presented the essence of Veda-vijnana in 80,000 pages. Only a few of these pages have been published. He specifically mentioned Shastri ji’s Kathopanishad Vijnan Bhashya for its brilliance. In this volume, Shastriji had given a classic explanation of atma.

 

Dr Lakshmi Kant Vimal, senior research associate, Shri Shankar Shikshyatan, said several works of Ojhaji and Shastriji have been posted on the Shikshayatan website, www.vediceye.com. This has made works of Ojhaji and Shastriji, not available in public domain till recently, accessibly to all scholars and seekers.

 

 

 

पण्डित मोतीलाल शास्त्री-स्मृति-व्याख्यानमाला

 

श्री शंकर शिक्षायतन, नई दिल्ली एवं पण्डित मधुसूदन ओझा शोधप्रकोष्ठ, जयनारायण व्यास  विश्वविद्यालय, जोधपुर के संयुक्त तत्त्वावधान में “ वेदशास्त्र : भारतवर्ष की मौलिकनिधि” विषय पर दिनांक २३ फरवरी २०१९ को गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान केन्द्र में  व्याख्यानमाला आयोजित की गयी।

 

 विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गुलाब सिंह चौहान ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कहा कि पण्डित मधुसूदन ओझा शोधप्रकोष्ठ निरन्तर पं. ओझा की ग्रन्थशृंखाला का प्रकाशन करता आ रहा है। वैदिकविज्ञान के विषयों पर समायोजित इस व्याख्यानमाला से वेद के गूढ विषयों पर चर्चा होगी। जिससे आज की  नयी पीढ़ी को जानने का अवसर मिला है।

 

मुख्य वक्ता  प्रो. अर्कनाथ चौधरी, पूर्वकुलपति, सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात ने कहा कि पं. शास्त्री जी ने अग्नि और सोम के माध्यम से सृष्टि को स्पष्ट किया है। अग्नि ही वायु व आदित्य है। आपोमण्डल में प्रविष्ट  अग्नि  वरुण या सोम है। अग्नि, वायु, आदित्य तथा वरुण की प्रतिष्ठा ऋक्, यजुः, साम  एवं अथर्व से है। अत एव ये ही चारों तत्त्व क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं।

 

कार्यक्रम की अध्यता करते हुए प्रो. गणेशीलाल सुथार ने कहा कि पं. शास्त्री जी ने वेदतत्त्व को अनेक रूपों में प्रस्तुत किया है। जिसमें वेद तत्त्व भी है, ग्रन्थ भी है। जब ग्रन्थ होगा तो उसका लेखक कोई न कोई जरूर होगा इस अर्थ में वेद पौरुषेय है तथा हम जैसे साँस  बिना प्रयास के लेते हैं वैसे ही परम पिता परमेश्वर से यह वेद निःश्वास के रूप में निकला है। अत एव वेद अपौरुषेय है।


विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रो. कौशल नाथ उपाध्याय ने कहा कि वेद हमे निरन्तर कर्म करने की प्रेरणा देता है। वेद भारतीय सभ्यता का अमूल्य निद्घि है।

 

 प्रो. सरोज कौशल अपने स्वागत भाषण में कहा कि पं. शास्त्री ने ८० हजार पृष्ठों में वैदिकविज्ञान के विषयों को हम सब के लिए प्रस्तुत किया है। जिसमें से थोड़ा ही ग्रन्थ प्रकाशित हो सका है। इनके कठोपनिषद् विज्ञानभाष्य अद्भुत है। इस ग्रन्थ में आत्मा के अनेक रूपों की चर्चा की गयी है।


प्रो. सत्यप्रकाश दुबे ने कहा कि पं. मधुसूदन ओझा शोधप्रकोष्ठ ने  ओझा जी के ग्रन्थों को प्रकाशित करने में निरन्तर लगा है। वेद हमारी निधि है। यदि इसमें हम गोता लगाते हैं तो ज्ञान रूपी मोती को प्राप्त करते हैं। आज आवश्यकता है पं. ओझा के ग्रन्थों को  समझने की ।


श्रीलक्ष्मी कान्त विमल, वरिष्ठ अध्येता, श्री शंकर शिक्षायतन, दिल्ली ने कहा कि शिक्षायतन ने अपने बेबसाईट पर पं. मधुसूदन ओझा और पं. शास्त्री जी की प्रकाशित सभी किताब को रखा है। जिससे वेदविज्ञान के पाठकों को एक साथ सभी ग्रन्थों को पढ़ने और समझने में सहायक होगा।


प्रो. मंगला राम ने कार्यक्रम का सफल संचलान किया।