National Seminar on Srishti Vijnana

There were ten sources of Creation, according to Pandit Madhusudan Ojha.                                                                                                            

 

Pandit Madhusudan Ojha arrived at this conclusion after a life-long study of the Vedas, puranas and several ancient texts. He wrote several volumes on the subject to illuminate the source and process of the creation of the universe. These fascinating insights into the creation of the universe formed the basis of a lively debate and discussion on srishti vijnana or the science of creation organised jointly by Shri Shankar Shikshayatan and Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit Vidyapeeth in New Delhi on February 29, 2020. 

 

 

सृष्टिविमर्श : पं. मधुसूदन ओझा के वाङ्मय के परिप्रेक्ष्य में--प्रतिवेदन

विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, समन्वयक, श्री शंकर शिक्षायतन ने कहा कि ओझा जी ने पौराणिक सृष्टिप्रक्रिया को उद्घाटित करने का प्रयास किया है। काम, तप और श्रम इन तीन पारिभाषिक शब्दों के आधार पर सृष्टि प्रक्रिया की व्याख्या की गयी है। काम का अर्थ इच्छा है इसी से संकल्प होता है। संकल्प ही सभी कार्यों का मूल है। तप का अर्थ क्रिया है। यहाँ क्रिया का अर्थ प्रक्रिया है। श्रम का अर्थ तत्त्वात्मक पदार्थ है। ओझाजी ने क्रमशः मन से इच्छा, प्राण से तप और वाक् से श्रम को परिभाषित किया है। मन-प्राण और वाक् से ही समस्त सृष्टि होती है। प्रो. शुक्ल ने सृष्टि के भेदों का वर्णन करते हुए कहा कि मानसिक और मैथुनी के भेद से सृष्टि के दो प्रकार हैं। मानसिक सृष्टि का सम्बन्ध वेद से और मैथुनी सृष्टि का संबन्ध पुराणविद्या से है।

 

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