Indra

The universe is made up of akshara and kshara--the immutable and the perishable. There are five aksharas--Brahma, Vishnu, Indra, Agni and Soma. Here, we are going to explore the third akshara, Indra, in detail.  

 

Pandit Madhusudan Ojha, who gave a detailed account of  Indra in his book, Brahmasamanvya, has kept akshara-tatva, or elements of the indestructible, as the focal point of his examination of  srishti,or creation, in his various works.Based on his extensive study of the Vedas, Puranas and Upanishads, Ojhaji has not only explained different forms of Indra but  also positioned Indra, besides the four other aksharas, in trailokya, the triadic world. 

 

Ojhaji’s disciple, Pandit Motilal Shastriji has given an explanation of Indra in his work, Pratishta Krishna Rahasya. Shastriji’s disciple, Rishi Kumar Mishra in three of his five volumes, The Cosmic Matrix, The Realm of Supraphysics and Before the Beginning and After the End, has given a detailed presentation of the term Indra. In his works, Mishraji has presented many facets of vedic vijnana expounded by Shastriji and Ojhaji in English for the first time. 

 

According to these gurus, five aksharas dwell in the body of every individual and regulate the related pranas or supraphysical energies. Of these, Brahma, Vishnu and Indra reside in the heart or centre. These are grouped together under the term, hridaya. Agni and Soma are referred to as prishtha or located at the back. Of the three located in the heart, Brahma is the cause of existence, Vishnu is invested with the functionality of yajna and Indra is endowed with veerya or vitality. The mutual interaction, harmonisation, clash, conflict and regeneration of Brahma, Vishnu and Indra produce waves of six stimuli in a sentient being--hunger and thirst, sorrow and stupidity, ageing and death. 

 

Indra related to the earth is called vasu, the Indra linked to interspace is called marut and that linked to dyau-loka is known as maghava indra. This all-pervasive nature of Indra is highlighted in the Rigveda. Indra is also described as amrita veda vaka, the eternal and enduring veda vaka. 

 

Indra performs 14 functions and thus it is stated in the Vedas that there are 14 Indras. Each of these has separate names--atma, satya, jyoti, ayu, mahah,vidyut, vaka,  vyoma, sva, roopa and gati. In the advaita vedanta and Upanishads, references to several more forms of Indra can be found. 

 

Indra as the solar prana is the base of atma. This supraphysical energy exits from the eyes and other organs which acts as outlets and are thus known as  `indriya` or organs. This Indra which keeps the subjects alive and glowing is called Atmendra, the first of 14 Indras. The second is the Satya Indra which resides inside every object and regulates its `nature`. Heat is the inherent attribute of Agni while light is the attribute of Indra. The prana which causes light in the sun is called Jyoti Indra. The solar prana is Indra and age is the function of the sun and hence Indra here is called Ayu. The Indra which causes vitality and exuberance is known as Indra Mahah. Lighting, caused by the sun, is called Vidyut Indra. The ninth Indra is the strength in various objects. The tenth Indra is called vaka, the supraphysical energy that causes speech. The 11th Indra is vyoma and 12th is the supraphysical energy which resides in a vacuum and is known as Sva Indra or sometimes as Shuna Indra. The Indra which causes appearances of forms is called Roopa Indra and is at the root of the mind. The 14th Indra is motion or Gati Indra.

Thus, it can be understood that Indra is a supraphysical energy of great significance in the scheme of our universe.

 

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सृष्टिकारक अक्षरतत्त्व इन्द्र

 

पण्डित मधुसूदन ओझा ने सृष्टिविमर्श में अक्षरतत्त्व को केन्द्र में रखकर वैदिक विज्ञान की व्याख्या की है। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम ये पाँचों तत्त्व अक्षर हैं। यहाँ तृतीय अक्षर तत्त्व इन्द्र के स्वरूप का विवेचन किया गया है। ओझाजी प्रणीत ब्रह्मसमन्वय नामक ग्रन्थ के चतुर्थ अध्याय अक्षरानुवाक में इन्द्र का विवेचन लगभग २०० कारिकाओं में प्राप्त होता है। वैदिक विज्ञान के अनुसार अधोलिखित १४ प्रकार के इन्द्र का स्वरूप मिलता है - सत्य, श्वा, विद्युत्, उत्साह, प्रज्ञा, प्राण, द्युति, बल, वाक् आत्मा, आयु, व्योम, रूप और गति-

 

सत्यं श्वा विद्युदुत्साहः प्रज्ञा प्राणो द्युतिबलम्।

वागात्मायुर्व्योमरूपं गतिरिन्द्राश्चतुर्दश।। ब्रह्मसमन्वय, अक्षरानुवाक्-२४७

 

अद्वैतवेदान्त एवं उपनिषद में भी इन्द्र के अनेक स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। ‘इन्द्रो मायाभिः पुररूप ईयते’ यह मन्त्र ऋग्वेद का है। अद्वैतवेदान्त में इसका प्रचुर प्रयोग है। इस मन्त्र का अर्थ है - वह परमेश्वर अज्ञानों के द्वारा अनेक रूपों वाला प्रतीत होता है। ‘इन्दति परमैश्वर्यं लभते इति इन्द्रः’ (इन्द् परमैश्वर्ये धातु +  औणादिक रन् प्रत्यय=इन्द्र) मायाभिः में जो बहुवचन है वह अज्ञान के अनेकता को द्योतित करता है। अज्ञान की अनेकता के कारण ही वह परमेश्वर अनेक रूपों में भासित होता है। इन्द्र शब्द से ही इन्द्रिय शब्द बना है। वैदिक विज्ञान में इसकी व्याख्या पर विशेष ध्यान दिया गया है।

 

पण्डित मोतिलाल शास्त्री ने भी प्रतिष्ठाकृष्णरहस्य नामक ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही इन इन्द्रों का क्रमशः वर्णन किया है। जहाँ सांसारिक पदार्थों में ठहराव अथवा स्थिरता होती है, वही प्रतिष्ठा है। जिस प्रथम तत्त्व से सृष्टि  होती है वह आदि कहलाता है। अत एव श्रुति कहती है कि ब्रह्म ही सर्व की प्रतिष्ठा है और वही प्रथम है-

 

‘ब्रह्मैवास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ब्रह्म वै सर्वस्य प्रथमजम्।’ (सन्दर्भ?)

 

वह प्रतिष्ठा तत्त्व किसी वस्तु में अधिक होती है और किसी में कम होती है। जैसे विद्युत्, कर्पूर, शब्द और मेघ आदि में प्रतिष्ठा तत्त्व कम है। बिजली में प्रतिष्ठा तत्त्व की कमी होने की कारण उसकी चमक स्थायी नहीं होती है। जिसमें इन्द्र की मात्रा अधिक होती है उसमें प्रतिष्ठातत्त्व की कमी रहती है। अत एव इन्द्र विक्षेपशक्ति है। यह इन्द्र सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसमे कोई भी जगह रिक्त नहीं है। अतः श्रुति कहती है कि इन्द्र को छोड़कर इसमें किसी की भी सत्ता नहीं है-

 

                                           ‘नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन।’

                                            इन्द्र के विविध स्वरूप

 

  • सत्य इन्द्र : नियति को सत्य कहा जाता है। प्रत्येक पदार्थ में एक नियति दृष्टिगोचर होती है,  जिस नियति से संसार के सभी पदार्थ सम्बद्ध रहते हैं। यही सत्य अन्तर्यामी इन्द्र है। नियति के आधार पर ही सारा विश्व अवलम्बित है। जैसे - पानी सदैव नीचे गिरता है, अग्नि सदैव ऊपर की ओर प्रज्वलित होता है और वायु हमेशा तिरश्चीन (तिरछा) ही चलता है। ये जो सत्य नियत हैं, जिनका कभी विरोध नहीं होता, इस क्रम का नाम नियति है। नियति सत्य है, जो प्रत्येक पदार्थ के केन्द्र में रहता हुआ उसका संचालन करता रहता है, उसी का नाम इन्द्र है। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, प्राण, वायु, चक्षु, श्रोत्र पदार्थों के भीतर रहकर शासन करने वाला जो इन्द्र प्राण है, उसी का नाम सत्य इन्द्र है। इसमें श्रुति प्रमाण है-

 

               अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधामि अन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम्।

              यजूर्देवेभिस्वरैः परैश्च अन्तर्यामे मघवन् मादयस्व।।, यजुर्वेद-७.५

 

          इसी इन्द्र के लिए कौषीतकि ब्राह्मण में ‘सत्यं हि इन्द्रम्’ (कौ.-३) कहा गया है।

 

  • श्वा इन्द्र : आकाश शून्य स्थान है। इसमें रहने बाला जो इन्द्र है उसी का नाम श्वा इन्द्र है। ‘शुना शीर्ययाय’ का प्रयोग इसी शुन इन्द्र के लिए किया गया है। जो स्थान शुन के लिए हितकर होता है, उसे शून्य कहते हैं- ‘शूने हितं शून्यम्’ । जिसमें शुन नाम का इन्द्र प्राण भरा रहता है उसका नाम शून्य है। इसी शुन इन्द्र को श्वा इन्द्र भी कहते हैं। इसमें श्रुति प्रमाण है -

 

                                           शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन् भरेनृत्तमं वजसानौ।

         

आधुनिक समय में इसी श्वा इन्द्र को ईथर भी कहा जाता है।

 

  • विद्युत् इन्द्र :   बिजली सूर्य से उत्पन्न होती है। सूर्य प्राण का नाम ही इन्द्र है। इसमें श्रुति प्रमाण है - ‘यद्विद्युदाव्यद्युतदा’ कहा गया है। यही विद्युत इन्द्र जल के गर्भ में रहकर मेघ कहलता है। यह तलवकार उपनिषद् में वर्णित है।

 

  • उत्साह इन्द्र - इन्द्र का एक नाम उत्साह है। हमारे शरीर में जो एक प्रकार की स्फूर्ति देखी जाती है वह भी इसी इन्द्र की महिमा है। दिन के अधिष्ठाता सूर्य हैं एवं सूर्य प्राण का नाम इन्द्र है। इसीलिए ‘ऐन्द्रमहः’ यह कहा जाता है। प्रातःकाल में  सूर्य प्राणरूप इन्द्र के शरीर में प्रविष्ट होने से शरीर मेम् नया उत्साह उत्पन्न होता है। शतपथब्राह्मण एवं मैत्रयानी श्रुति में इसका सन्दर्भ प्राप्त होता है।

 

  • प्रज्ञा इन्द्र : हमारे शरीर में जो विज्ञानात्मा अर्थात् बृद्धि है जो चैतन्य से प्राप्त सौर प्राण है, यह भी इन्द्र प्राण की महिमा है। विज्ञान (बुद्धि) ही नहीं अपितु प्रज्ञानात्मा का स्वरूप भी इसी इन्द्र से निर्मित होता है। प्रज्ञान की स्थिति इन्द्र प्राण से ही है। श्रुति कहती है -

 

                                                           ‘स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मा संपरिष्वक्तः।’

 

           इन्द्र ही आत्मा का अधिष्ठाता है।-

 

           स होवाच मामेव विजानीहि। एतदेवाहं  मनुष्याय हिततमं मन्ये यन्मां विजानीयात् प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।।, कौषितकि ब्राह्मण-३.१)

 

  • प्राण इन्द्र :  इन्द्र प्राण स्वरूप है। इसीलिए ‘प्राणोऽस्मि’ कहा जाता है। जो प्रकाश दृष्टिगोचर हो रहा है वह भी इसी इन्द्र का है। ऐतरेय आरण्यक में विश्वामित्र ने इन्द्र के प्रसंग मैं प्राण हूँ, तुम प्राण हो और सभी भूतों का प्राण मैं ही हूँ, इस प्रकार इन्द्र सम्बन्धी कथन का विवेचन किया है। (ऐ.आ.२.२.३)

 

  • द्युति इन्द्र : यहाँ द्युति का अर्थ सूर्य है। अमरकोश में द्युति को छवि एवं दीप्ति का पर्याय बतलाया गया है-‘छवि-द्युति-दीप्तयः’(अमरकोश-१.३.३४)। पं. मोतीलाल शास्त्री के प्रतिष्ठाकृष्णरहस्य (पृ.०६) नामक ग्रन्थ के अनुसार अग्नि का धर्म ताप होता है और इन्द्र का धर्म प्रकाश है। सूर्य से प्रकाश होता है। सूर्य के प्रकाशी (प्रकाश करने वाला) प्राण का नाम इन्द्र है। ओझाजी के ब्रह्मसमन्वय ग्रन्थ में भी ‘ज्योतिरिन्द्रः’ नामक एक शीर्षक उद्धृत है। जहाँ ज्योतिरूप इन्द्र के स्वरूप बतलाने के लिए शीर्षक दिया गया है परन्तु उस शीर्षक के अन्तर्गत कोई कारिका उपलब्ध नहीं है।

 

  • बल इन्द्र  :  संसार में जो बल का स्रोत है उसका अधिष्ठाता इन्द्र है। यास्क ने निरुक्त में बल को इन्द्र कहा है तथा बल से ही कर्म होता है-

 

                                       ‘या च का च बलकृतिरिन्द्रः कर्म एव तत्’।

 

         ऋग्वेद में भी बल स्वरूप इन्द्र का सन्दर्भ प्राप्त होता है-

 

                                      त्वमिन्द्रबलादधि सहसो जात ओजसः।

                                      त्वं स्म वृषन् वृषे दसि।,  ऋग्वेद-८.८.११.२

 

  • वाक् इन्द्र :  ब्रह्म से सबन्धित सत्या वाक्, विष्णु से सम्बन्धित आम्भृणी वाक्, इन्द्र से सम्बन्धित बृहती वाक् और अग्नि से सम्बन्धित अनुष्टुप् वाक् है। अ, आ, इ, ई स्वर वाक् है, उसी को बृहती वाक् कहते है। इसके अधिष्ठाता बृहती छ्न्द पर स्थिर रूप से तपने  बाले सौर प्राण ही इन्द्र है। बृहती वाक् सदा इन्द्र से युक्त रहती है। अत एव इसे इन्द्रपत्नी कहा जाता है।-

 

                                  वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं  गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः।

                                  वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सानो हवं जुषतामिन्द्र पत्नी।।

 

          श्रुति में बारम्बार ‘वाक् इन्द्रः’ का सन्दर्भ मिलता है।  

 

  • आत्मा इन्द्र : इस के लिए ऋग्वेद का मन्त्र ‘इन्द्रो मायाभिः पुररूप इयते’ है। यहाँ इस मन्त्र में इन्द्र का अर्थ आत्मा है।

 

  • आयु इन्द्र :  आयु के अधिष्ठाता भी यही इन्द्र है । जब तक सौर प्राण शरीर में आता रहता है तभी तक आयु की स्थिति रहती है। सौर प्राण का नाम इन्द्र है। अत एव इन्द्र यो आयु कहा जाता ह-

 

                           ‘तं माम् आयुः अमृतम् इति उपास्व।’, (कौ.ब्रा-३.१)

 

  • व्योम इन्द्र :  आकाश को वाक् कहते है। अमृत और मर्त्य भेद से यह वाक् दो प्रकार की है। अमृतमयी वाक् अमृताकाश और मर्त्या वाक् मर्त्याकाश है। अमृताकाश से देवता उत्पन्न होते हैं और मर्त्याकाश से भूत उत्पन्न होते हैं। जो अमृताकाश है उसे ही इन्द्र कहते हैं। पं. मधूसूदन ओझाजी ने इसे क्रमशः भूताकाश, दहराकाश और भावाकाश के रूप में वर्णन किया है।

 

  • रूप इन्द्र : संसार में जो रूप दिखलायी पड़ता है उनका अधिष्ठाता इन्द्र है। मन का ही नाम इन्द्र है। मन ही रूपाकार में परिणत होता है। मन के परिणाम विशेष का नाम रूप है। मन जिस वस्तु पर एक बार दौड़ जाता है बार-बार उसी पर दौड़ता रहता है। यह मन बार-बार उसी स्थान पर जाता है। इसे ओकःसारी कहा जाता है-

 

                                           ‘ओकः सारी वा इन्द्रः यत्र वा इन्द्रः पूर्वं गच्छति एवेतत्रापरं गच्छति। ऐ.ब्रा.६.१७.२२

                                            इन्द्रो रूपाणि कटीकृदचरत्। रूपं रूपं मघवा बोभविति।

 

  • गति इन्द्र :  प्रतिष्ठा का विरोधी तत्त्व गति है। स्पीरीट, तारपीन, क्लोरोफॉर्म आदि पदार्थ उसी समय हवा में उड़ जाते हैं।

 

       इस प्रकार इन्द्र सृष्टि का कारण है। ओझा जी ने अनेक रूपों में इन्द्र तत्त्व का वर्णन किया है। पं. मधूसूदन ओझाजी के ‘इन्द्रविजय’ नामक ग्रन्थ में  इन्द्र के
      स्वरूप पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हुए उसका विश्लेषण किया गया है।

 

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