National Webinar on Prashnopanishad-Vijnana-Bhashya

National Webinar on Prashnopanishad vijnana bhashya, a commentary on Prashnopanishad.                             

 

 

Shri Shankar Shikshayatan organised a national webinar on Prashnopanishad Vijnana Bhashya of Pandit Motilal Shastri on May 29, 2020.

Prashnopanishad is one of the important upanishads. Pandit Motilal Shastri called it Pranopanishad and Pippaladoshapanishad.  In his comprehensive commentary on the text  in Hindi, Shastriji has explained six principle questions involving parameshti mahan, saur vigyanatma, chandra-pragyanatma, parthiv pranatma, svayambhu-avyaktatma and purushatma. This commentary is considered to be one of the finest works of Shastriji.The meeting , which discussed many aspects of Shastri's commentary on Prashnopanishad, was attended by well-known vedic scholars from different universities and academic institutions. The meeting was chaired by Prof. Santosh Kumar Shukla,  Convener, Shri Shankar Shikshayatan, Dean, Sanskrit and Ancient Studies Department, Jawaharlal Nehru University, Delhi. Read Full Report

 

 

प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य विमर्श

(पं. मोतीलाल शास्त्री के आलोक में)

 

प्रतिवेदन

 

श्री शंकर शिक्षायतन द्वारा दिनांक २९ मई २०२० को एक राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस वेबिनार का विषय प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य विमर्श था। यह आयोजन सायंकाल ४.३० से प्रारम्भ होकर रात्रि ८.३० बजे सम्पन्न हुआ। मङ्गलाचरण के अनन्तर उद्धाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रख्यात वैदिक विद्वान् प्रो. ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रथम प्रश्न में सृष्टिविषयक जिस प्रजापति का वर्णन किया गया है उसे पं. मोतीलाल शास्त्री ने स्वयम्भू प्रजापति के रूप में व्याख्यायित किया है, जो तप करके रयि और प्राण के मिथुन से सृष्टि का आरम्भ करता है। इस प्रकार उन्होंने प्रथम प्रश्न में उपस्थापित सृष्टिविषयक अवधारणा का पं. मोतीलाल शास्त्री के आलोक में विस्तृत विवेचन किया। उद्घाटन सत्र के विशिष्ट अतिथि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के आचार्य प्रो. ललित कुमार गौड ने संवत्सर को सृष्टि का मूल कारण बतलाते हुए विज्ञानभाष्य की  दृष्टि से उत्तरायण और दक्षिणायन के माध्यम से इसको स्पष्ट किया।

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