vishvasrit

 

In vedic vijnana, specific terms are employed to describe the principles of creation.  Vishvasrit is related to kshara tattva, one of the tattvas of creation. Kshara has three forms--atmakshara, vikarakshara and yajnakshara.Brahma, Vishnu, Indra, agni and soma are known as atmakshara. When atmakshara becomes prana, apa, vak, annada and anna, it is known as vikarakshara. The atmakshara and vikarakshara are different and when they merge into each other, svayambhu, parameshthi, sun, moon and earth are created and they come to be called yajnakshara. Thus the entire creation is born from yajnakshara which is called vishvasrit.

 

 

References:

 

Pandit Motilal Shastri, Sanshayatuchedavada First Part, page 100; Pratishthakrishna-rahasya, pages 27-28.

 

Pandit Madhusudan Ojha, Brahmasamanvaya, shlokas 2 and 235 .



 


 

विश्वसृट्

 

वैदिकविज्ञान में सृष्टिसिद्धान्त को बतलाने के लिए अनेक वैदिक पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट किया गया है। विश्व को बनाने वाला तत्त्व का नाम विश्वसृट् है । क्षर एक तत्त्व है। इसके तीन स्वरूप हैं- आत्मक्षर, विकारक्षर और यज्ञक्षर। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र,  अग्नि और सोम ये पाँचों आत्मक्षर नाम से जाने जाते हैं। इसी आत्मक्षर से क्रमशः प्राण, आप्, वाक्, अन्नाद और अन्न उत्पन्न होते हैं एव इसी का नाम विकारक्षर है।  अभी यह आत्मक्षर और विकारक्षर अलग-अलग है जिसको शास्त्र में अपञ्चीकृत कहा जाता है। जब यह आत्मक्षर और विकारक्षर आपस में मिल जाता है  अर्थात् पञ्चीकृत हो जाता है तो क्रमशः स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्र और पृथिवी ये पाँच यज्ञक्षर उत्पन्न होते हैं। संपूर्ण सृष्टि इन्ही यज्ञक्षर से होता है। अत एव इसी पाँचों तत्त्व को विश्वसृट् नाम से जाना जाता है।

 

 

 

(पण्डित मोतीलाल शास्त्री, संशयतदुच्छेदवाद, प्रथमकाण्ड, पृ. १०० एवं  प्रतिष्ठाकृष्णरहस्य पृ. २७-२८)

 

 

 

 

 

आनन्द-विज्ञान-मनोघन आत्मैष विश्वसृट् । ब्रह्मसमन्वय, निर्विशेषानुवाक, श्लोक-२

 

त्रिधा बद्धो ब्रह्मपुरमाविवेशैष विश्वसृट् । ब्रह्मसमन्वय, अक्षरानुवाक, श्लोक-२३५