ashnaya


Rasa and bala are important elements of creation in vedic vijnana. Although balas are numerous, for the sake of comprehension, 16 are relevant. Ashnaya is one of the 16 balas. Ashnaya-bala is also known as bubhuksha-bala or hunger. When you feel the hunger for food, it is ashnaya-bala acting.  Ashnaya-bala has three forms--uktha, arka and ashithi. The bala which resides in the centre converts itself into ashnaya-bala to come out. But the entire bala does not go out, leaving a large part of it in the centre. This bala in the centre is called ukhta. The bala which comes out in the form of rays is called arka and the one which is consumed along with anna is called ashithi.


 

References:

Pandit Motilal Shastri, Sanshayatuchedavada-first part, page 224.






 

अशनाया

 

वैदिकविज्ञान में सृष्टि के प्रतिपादक सिद्धान्तों में रस और बल का अत्यधिक महत्त्व है। यद्यपि बल असंख्य हैं। तथापि विषय को समझने के लिए बलों की संख्या १६ हैं। उसी बल में अशनाया नामक एक बल है। अशनायाबल को ही बुभुक्षाबल (खाने की इच्छा) कहते हैं। जब मनुष्य का पेट सर्वथा खाली हो जाता है तो उस समय जो खाने की स्वाभाविक इच्छा होती है उसी को अशनायाबल कहते हैं। बाहर से ‘अश’ को अर्थात् अन्न को यह अशनायाबल आत्मा पर ला कर जमा करती है। अत एव ‘अशं नयति’ इस व्युत्पत्ति से बुभुक्षाबल को अशनायाबल कहा जाता है।

 

इस अशनायाबल के तीन रूप हैं- उक्थ, अर्क और अशिति। केन्द्र में रहने वाला जो बल है वही अशनायाबल के रूप में परिणत हो कर बाहर निकलता है। परन्तु यह संपूर्ण  बल बाहर नहीं निकलता है अपितु अधिक अंश से केन्द्र में ही स्थिर रहता है एवं कम मात्रा से  बाहर निकलता है। जो बल बाहर निकलता है वह इसी केन्द्रस्थ बल से  उठता है। अत एव ‘यस्मात् उत्तिष्ठति’ इस व्युत्पत्ति से इस केन्द्रीय बल को ‘उक्थ’ कहा जाता है। जो बल किरण रूप से बाहर जाता है उसी का नाम अर्क है एवं जो बल अन्न के साथ रह कर आत्मा में आहुत होता है वही ‘अशिति’ नाम से जाना जाता है।

 

इस प्रकार एक ही अशनाया उक्थ, अर्क और अशिति के भेव्द से तीन रूपों में परिणत हो जाता है।

 

(पण्डित मोतीलाल शास्त्री, संशयतदुच्छेदवाद, प्रथमकाण्ड, पृ. २२४)