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Our endeavour is to present various publications related to Vedic Studies, especially those which are authored by our three Gurus.

Some of these are in the form of independent publications. Others are scanned copies of various works of Pandit Madhusudan Ojha, Pandit Motilal Shastri and Rishi Kumar Mishra.

Most of the publications are now online. Rest will also be available for download soon.

We welcome your comments and suggestions. Please mail us at ssst.2015@gmail.com

 

 

Books authored by PANDIT MADHUSUDAN OJHA
 

  1. आधिदैविकाध्याय  (Aadhidaivikadyaaya)

    यह ग्रन्थ देवताधिकार, पितृनिरूपणाधिकार, ऋषिसामान्याधिकार, सृष्टिप्रवर्तकाधिकार, वेदर्षिरहस्याधिकार, वेदप्रवर्तकऋष्यधिकार, आयुर्दायचिन्ताधिकार, व्यक्तिबहुत्वाधिकार एवं गोत्रप्रवर्तकाधिकार नामक कुल नौ अधिकारों में विभक्त है ।  इस ग्रन्थ के माध्यम से वेदों में प्रयुक्त देवता, पितृ, ऋषि आदि शब्दों के वेदसम्मत वास्तविक रहस्य को बतलाने का प्रयत्न किया गया है जो रहस्य सहस्राब्दियों से वैदिक परिभाषा ग्रंथो के नष्ट हो जाने से लुप्तप्राय हो गया था ।

    In this work, Pandit Madhusudan Ojha has unraveled the true meaning of terms like `devata` (deity), `pitr` (paternal ancestors) and `rishi` (sage) etc, as given in the Vedas. These Vedic definitions had been lost for several generations before Pandit Ojha decided to study the Vedas.     [Download]
     
  2. आशौचपञ्जिका  (Aashauchapanchika) 

    इस ग्रन्थ में आधुनिक तर्कप्रधान जनता के लिये आशौच का स्वरुप , आशौच का कारण , आशौच का प्रभाव, आदि वस्तुओंका का विज्ञानं भी प्रमाण  व युक्ति के साथ बतलाया गया है 1 यह ग्रन्थ आशौचविषय का अपूर्व ग्रन्थ है 1  [Download]
     
  3. देवासुरख्याति (Devasurakhyati

    ओझाजी द्वारा लिखित पंचविध ग्रन्थविभागों में से पुराणसमीक्षा नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत इतिहासविषयक पाँच ख्यातिपरक ग्रन्थों का प्रणयन किया गया जिसमें यह देवासुरख्याति भी एक है । इस ग्रन्थ में वेदसृष्टि, धर्मसृष्टि, प्रजासृष्टि, त्रैलोक्यनिरूपण, लोकसृष्टि एवं चातुर्वर्ण्य विषयक विवेचन किया गया है ।    -{download}
     
  4. देवतानिवित् (Devatanivit) 

    यह ओझाजी के यज्ञविज्ञान नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत लिखा गया एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में देवता सम्बन्धी एक सौ विषयों की परिभाषाएँ पृथक्-पृथक् निर्दिष्ट हैं ।   - {download}
     
  5. इन्द्रविजय (Indravijayah)

    यह ओझाजी के ब्रह्मविज्ञान नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत आने वाला ग्रन्थरत्न है जो भारतवर्ष के प्रागैतिहासिक स्वरूप और स्थिति के अध्ययन की दृष्टि से अत्यन्त प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण है । यह संस्कृत के विद्वानों, इतिहासज्ञों एवं भूगोलवेत्ताओं के लिए अत्यन्त पठनीय ग्रन्थ है । यह ग्रन्थ भारत परिचय, आर्यदासीय, विज्ञानभवन, दस्युनिग्रह एवं इन्द्रविजयाभिनन्दन नामक पाँच परिच्छेदों में विभक्त है जिसमें प्राचीन बृहत्तर भारत की सम्पूर्ण ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्यों का सप्रमाण रेखांकन वैदिक प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है ।  {download}
     
  6. माधवख्याति (Madhavkhyaati)   

    पुराणसमीक्षा ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत निर्मित इस माधवख्याति नामक ग्रन्थ में यदुवंश का समग्र विवरण प्रस्तुत किया गया है । ग्रन्थ के अन्त में दी गयी अनुक्रमणिका में यदुवंशीय राजाओं की सूची भी दी गयी है ।--{download}
     
  7. पञ्चभूतसमीक्षा (Panchabhootasameeksha

    पृथिवी, जल, तेज, वायु एवं आकाश इन पंचमहाभूतों को भारतीय पाँच तत्त्व मानते हैं परन्तु ये मौलिक तत्त्व हैं या नहीं इसको लेकर १९३५ ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एक पञ्चमहाभूत परिषद् बुलायी गयी थी, जहाँ इसके तत्त्वविषयक पक्ष एवं विपक्ष की बात को सुनकर ओझाजी द्वारा अपना विचार प्रकट किया गया था, यह उसी पञ्चमहाभूत विषयक विचारों का संकलन है । वहाँ ओझाजी द्वारा पञ्चमहाभूतों के तत्त्वविषयक पक्ष में सुदृढ तर्क प्रस्तुत किया गया जिससे उस परिषद् में पञ्चमहाभूत सिद्धान्त को सुस्थिर मान लिया गया । --{download}
     
  8. पुराणनिर्माणाधिकरण (Puraananirmaanadhikaran

    आज जो पुराण-ग्रन्थ उपलब्ध हैं उनका विकास किस क्रम से हुआ, इनका मूल कहाँ से है, इनके प्रथम वक्ता कौन हैं, वर्तमान पुराण ग्रन्थों के कर्ता कौन हैं, आदि विषयों को लेकर ओझाजी द्वारा इस लघु ग्रन्थ का प्रणयन किया गया है । इस लघु ग्रन्थ में उक्त विषयों का बहुत स्पष्ट और विस्तृत विवेचन पुराणों के अधार पर ही किया गया है ।   --{download}
     
  9. पुराणनिर्माणाधिकरण (हिंदी)--download 
     
  10. सन्ध्योपासनरहस्य  (Sandhyapaasanaarahasyam)

    यह ग्रन्थ नित्य कर्म के रूप में प्रसिद्ध सन्ध्योपासना के रहस्य का उद्घाटक है । इस ग्रन्थ में सन्ध्योपासना क्यों करनी चाहिये? सन्ध्योपासना के उपकरणभूत आचमन, अर्घ्यप्रदान, सूर्योपस्थापन, प्राणायाम, अघमर्षण आचमन आदि क्यों किये जाते हैं तथा इनसे किन आध्यात्मिक तत्त्वों का पोषण होता है? सावित्री को गायत्री क्यों कहा जाता है? सन्ध्योपासना सन्ध्याकाल में ही क्यों किया जाता है? आदि विषयों का मार्मिक व वैज्ञानिक विश्लेषण श्रुतिमूलक उपपत्तियों के आधार पर किया गया है ।                                                                                                                                                   ---{download}
  11. स्वर्गसन्देश   (Svargasandesha )  

    स्वर्ग को आधार बनाकर ओझा जी द्वारा लिखा गया यह एक लघु परन्तु सारगर्भित ग्रन्थ है ।  इसमें भौमस्वर्ग, दिव्यस्वर्ग, पितृस्वर्ग और देवस्वर्ग नामक स्वर्ग के चार भेदों का प्रतिपादन अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के साथ किया गया है ।--{download}
     
  12. वैज्ञानिकोपाख्यान एवं वैदिकोपाख्यान  (Vaigyanikopaakhyaana  and  Vaidikopaakhyaana )
    इस ग्नन्थ में विविध उपाख्यानों का संकलन किया गया है । यह ग्रन्थ वैज्ञानिकोपाख्यान एवं वैदिकोपाख्यान नामक दो प्रमुख उपाख्यानों में विभाजित है जिनके अन्तर्गत अनेक उपाख्यान सम्मिलित हैं । वैज्ञानिकोपाख्यान के अन्तर्गत प्रजापति कश्यप की पत्नी कद्रू एवं विनता से उत्पन्न पुत्रों के उपाख्यानों यथा सौपर्णोपाख्यान, अनन्तोपाख्यान, हयग्रीवोपाख्यान आदि पौराणिक उपाख्यानों का जबकि वैदिकोपाख्यान के अन्तर्गत असुरघ्नी सपत्नघ्नी वाक्, अग्निदूतोपाख्यान, आप्त्योपाख्यान, देवयजनोपाख्यान आदि वैदिक उपाख्यानों का संकलन है ।   -- (download)
     
  13. ब्रह्मसिद्धान्त हिन्दी अनुवाद (Brahmasiddhanta with Hindi translation )
  14. ब्रह्मसिद्धान्त संस्कृत टीका (Brahmasiddhanta with Sanskrit Commentary )

    सृष्टिविषयक प्रचलित दस वादों को निरस्त कर ब्रह्मा द्वारा अग्नीषोमात्मक ब्रह्मवाद की स्थापना, ब्रह्म का व्यावहारिक रूप, माया का व्यावहारिक रूप, नित्य ब्रह्म से साथ माया बल द्वारा होने वाले विभिन्न सम्बन्ध और उन सम्बन्धों से होने वाला जगत् के पदार्थों के निर्माण विषयक विवेचन इस ग्रन्थ का विषय-वस्तु है जो अन्यत्र इतनी स्पष्टता से प्राप्त नहीं होता है । इस ग्रन्थ पर गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी द्वारा ‘सिद्धान्तप्रकाशिका’ नामक संस्कृत टीका एवं देवीदत्त चतुर्वेदी द्वारा टीका सहित सम्पूर्ण ग्रन्थ का  हिन्दी अनुवाद किया गया है ।

    (Download ब्रह्मसिद्धान्त संस्कृत टीका)
    (Download ब्रह्मसिद्धान्त हिन्दी)

     
  15. ब्रह्मविनय (Brahmavinaya)

    पं. मधुसूदन ओझाजी का ब्रह्मविषयक सिद्धान्त चतुष्पाद् ब्रह्म की सत्ता पर निर्भर है । ये चतुष्पाद हैं- परात्पर, अव्यय, अक्षर एवं क्षर । दार्शनिक दृष्टि से परात्पर के भी उपर एक पाँचवा निर्विशेष को माना गया है । ओझाजी ने इन्हीं पाँच की व्याख्या हेतु इस ग्रन्थ की रचना की है । सम्प्रति उपलब्ध संस्करण में निर्विशेषानुवाक्, परात्परानुवाक्, अव्ययानुवाक् एवं अक्षरानुवाक् नामक कुल चार प्रकरण ही प्राप्त होते हैं ।  (Download)
     
  16. ब्रह्मचतुष्पदी ( Brahmachatushpadi) 

    उपनिषदों में आख्यायिका एवं उपदेश के रूप में चतुष्पाद् ब्रह्म का निरूपण है, उसी के आधार पर ब्रह्म के चार पादों की कल्पना कर इस ब्रह्मचतुष्पदी की रचना की गयी । यहाँ निर्गुण, निर्विशेष रसतत्त्व से प्रारम्भ कर संसार की वर्तमान स्थिति तक चार प्रकार की अवस्था मानी गयी है । गूढात्मा, शिपिविष्ट, अधियज्ञ एवं विराट् यही चार अवस्थाएँ एक-एक पाद मानी गयी हैं । (Download)
     
  17. ब्रह्मसमन्वय (Brahmasamanvya)

    सृष्टिविषयक पूर्वपक्ष के रूप में जो दस वाद प्रचलित थे उनकी व्याख्या करते हुए सिद्धान्तवाद की व्याख्या अनेक ग्रन्थों में ओझाजी द्वारा की गयी है । उसी सिद्धान्तवाद का निरूपण प्रस्तुत ग्रन्थ में हुआ है । इसमें सभी सिद्धान्तों का स्पष्टतया प्रतिपादन किया गया है । इस ग्रन्थ का नाम ब्रह्मसमन्वय इसलिए है कि जो कुछ भी जगत् में दिखलायी देता है, उन सब में ब्रह्म का अन्वय है अर्थात् ब्रह्म सबमें अन्तःप्रविष्ट है, इसी विज्ञान का विशद विवेचन प्रस्तुत ग्रन्थ में हुआ है । (Download)
     
  18. छन्दोभ्यस्ता (Chhandobhyasta ) 

    यह यज्ञविज्ञान का ग्रन्थ है जिसमें यज्ञीय विषयों का सम्यक् विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थ की रचना वैदिक भाषा में की गयी है । यह ग्रन्थ हविर्यज्ञ, महायज्ञ, अतियज्ञ, शिरोयज्ञ एवं यज्ञपरिशिष्ट नामक पाँच प्रकरणों में विभक्त है । (Download)
     
  19. कादम्बिनी (Kadambini)  

    यह वृष्टिविज्ञान का एक अन्यतम ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में कुल पाँच अध्याय हैं जिनमें मेघ का निर्माण, ग्रह, नक्षत्र, तिथि एवं विविध निमित्तों के द्वारा वृष्टि या अनावृष्टि आदि के ज्ञान का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत किया गया है । (Download)

     
  20. महर्षिकुलवैभवम् (Maharshikulavaibhavam)

    इस ग्रन्थ के शीर्षक ‘महर्षिकुलवैभवम्’ से ही स्पष्ट है कि इसमें महर्षियों के कुल का वैभव वर्णित है । इस ग्रन्थ में ऋषि शब्द की असल्लक्षणा, रोचनालक्षणा, द्रष्टृलक्षणा एवं वक्तृलक्षणा रूप चार प्रकार की प्रवृत्तियाँ उल्लिखित हैं जिनमें ऋषियों के ऐतिहासिक वर्णन के साथ ही उनका वैज्ञानिक विवेचन स्पष्टतया प्रतिपादित है । (Download)
     
  21. मन्वन्तरनिर्धार (Manvantaranirdhara)

    यह भारतीय काल विवेचन का एक अद्भुत ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में मन्वन्तर निरूपण के अन्तर्गत  युग, दिव्ययुग, नित्यकल्प, सप्तकल्प एवं त्रिंशत्कल्प का निरूपण किया गया है । (Download)
     
  22. पथ्यास्वस्ति (Pathyaasvasti)

    यह ग्रन्थ ओझाजी के वेदाङ्गसमीक्षा विभागान्तर्गत वाक्पदिका नामक ग्रन्थ के प्रकरणभूत ‘वर्णसमीक्षा’ का एक अवान्तर प्रकरण है । ब्राह्मण ग्रन्थों में वाक् को पथ्यास्वस्ति के अभिधान से अभिहित किया गया है जो स्वरव्यञ्जनादि विभाग से विभक्त वर्णरूपा है । इस ग्रन्थ में उन्हीं वर्णों की विभिन्न रूप से समीक्षा की गयी है । यहाँ वर्णमाला का विवेचन विभिन्न प्रकार की मातृकाओं के रूप में किया गया है । (Download)
     
  23. पितृसमीक्षा (Pitrsamiksha) 

    सामान्यतया हम अपने पिता, पितामह या अधिक से अधिक प्रपितामह का नाम ही जानते हैं, हमारी पितृ-परम्परा में हुए सब पुरुषों का नाम हमें ज्ञात नहीं होता है । यदि हमें अपने एवं हमारे पितरों के स्वरूप को जानना है तो मूल सत्ता के स्वरूप को जानना पड़ेगा तथा ऋषि एवं मनु के स्वरूप को भी जानना पड़ेगा । इस विषय का वेद में विस्तृत प्रतिपादन किया गया है । इन तथ्यों की पूर्ण जानकारी हेतु सम्पूर्ण वैदिक साहित्य का आजीवन अनुशीलन कर ओझाजी द्वारा ‘पितृसमीक्षा’ ग्रन्थ की रचना की गयी है ।  (Download)
     
  24. रजोवाद  (Rajovaad)

    वेदप्रतिपादित सृष्टिविषयक द्वादश वादों को आधार बनाकर ओझाजी द्वारा प्रत्येक वादों पर एक-एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की गयी । उसी क्रम में रजोवाद को लेकर यह ग्रन्थ लिखा गया है । इस ग्रन्थ में सृष्टिविषयक रजोवाद सिद्धान्त के अन्तर्गत मुख्यतया विश्वसृट्सर्ग तथा भूतसर्ग के बारे में बतलाया गया है ।  (Download)
     
  25. शारीरकविमर्श ( Sharirakavimarsha) 

    यह शारीरक दर्शन पर लिखा गया ओझा जी का एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है जो स्वतन्त्र रूप से शारीरकदर्शन के विषयों पर आलोचनात्मक प्रकाश डालते हुए उनका वैज्ञानिक ढंग से सारतत्त्व प्रस्तुत करता है । सोलह प्रकरणों में विभाजित यह ‘शारीरकविमर्श’ सभी शास्त्रों का निचोड़ और वेद के रहस्य का प्रशस्त मार्गदर्शक है । इस ग्रन्थ में ब्रह्म, वेद, वेदाध्ययन, विज्ञानवेद, शब्दमयवेद, वेदप्रादुर्भाव, उपनिषद् पद का तात्पर्य, दर्शनशास्त्र, वेदान्तसूत्र, गीताशास्त्रनिरुक्ति, आत्मब्रह्ममीमांसा, ईश्वरात्मनिरुक्ति आदि विषयों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है ।  (Download)
     
  26. शारीरकविज्ञान  (Sharirakavigyana Part 1 & part 2)

    वेदान्तसूत्रों पर आचार्य शंकर के पश्चात् लिखे गये भाष्यों में शारीरकविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है । यद्यपि इस भाष्यग्रन्थ पर आचार्य शंकर के भाष्य का प्रभाव तो स्वाभाविक ही है परन्तु इस भाष्य के अनेक स्थलों के विवेचन से यह ज्ञात होता है कि इस ग्रन्थ के बिना वेदान्त सूत्रों के अनेक स्थल अस्पष्ट रह जाते या उनके विपरीत अर्थ ग्रहण कर लिये जाते । इन्हीं दृष्टिभेद बिन्दुओं को लेकर इस भाष्यग्रन्थ की रचना ओझाजी ने की है । यह भाष्य ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है । 

    Part 1--Download
    Part 2--Download

     
  27. वर्णसमीक्षा (Varnasamiksha) 

    यह ओझाजी की वर्णमाला विषयक महत्त्वपूर्ण कृति है । इसमें वर्णों का विवेचन आर्यमातृका एवं अनार्यमातृकाओं के रूप में किया गया है । आर्यमातृका के चार भेदों- ब्रह्ममातृका, अक्षमातृका, सिद्धमातृका एवं भूतमातृका का तथा अनार्यमातृका के अनेक भेदों में यवनमातृका का विवेचन करते हुए ओझाजी ने स्वर, व्यञ्जन, समानाक्षर, सन्ध्यक्षर, अयोगवाह, विवृति, स्वरभक्ति, यम, अनुस्वार, नाद, अन्तःस्थ, रङ्ग एवं उष्मा वर्णों का साङ्गोपाङ्ग विवरण प्रस्तुत किया है । (Download)
     
  28. यज्ञसरस्वती (Yajnasaraswati )

    यह यज्ञविज्ञान नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत लिखा गया याज्ञिक विषयों का प्रतिपादक ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ के सोमकाण्ड एवं अग्निचयनकाण्ड नामक दो खण्ड हैं । सोमकाण्ड के अन्तर्गत जहाँ इष्टि से लेकर राजसूययज्ञ तक के यज्ञों की पद्धति सरल रीति से बतलायी गयी है वहीं अग्निचयनकाण्ड में चयनविद्या एवं उसकी पद्धति तथा चितियों का निर्माण सादा एवं रंगीन नक्शों के साथ बहुत ही सुन्दरता से प्रतिपादित किया गया है । उक्त दो काण्डों के साथ खिलकाण्ड एवं ऊपरिकाण्ड नामक दो अन्य काण्डों की सूचना सूची में दी गयी है लेकिन उनका विवरण सम्प्रति उपलब्ध नहीं है ।  (Download)
     
  29. वस्तुसमीक्षा (Vastusamiksha)

    वस्तुसमीक्षा में वस्तु का अर्थ पदार्थ एवं समीक्षा का अर्थ विचार है। इस ग्रन्थ में वैदिकविज्ञान के अनुसार पदार्थ के स्वरूप पर विचार किया गया है। इस में मुख्यरूप से चार विषयों को समाहित किया गया है-पदार्थविज्ञान, रसायनविज्ञान, दृग्विज्ञान एवं  अंशुविज्ञान । पण्डित ओझा जी ने इस ग्रन्थ में आधुनिक वैज्ञानिक तत्त्वों का  वैदिकविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने का प्रयास किया है। अग्नि के स्वरूप प्रतिपादन के क्रम में ताप, आलोक और विद्युत् का विश्लेषण किया गया है। ताप के ही विविध आयामों को यहाँ सम्पूर्ण ग्रन्थों में  स्पष्ट किया गया है। प्रतीत होता है कि पण्डित ओझा जी ने आधिनुक इनर्जी  (energy) के अर्थ में ताप के महत्त्व को उद्घाटित किया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ वर्तमान समय में इसलिए उपयोगी है क्योंकि सभी जगह विज्ञान की ही चर्चा चल रही है। संस्कृत में विज्ञान का जो स्रोत है, वह यहाँ देखने को मिलता है।  (Download)
     
  30. अपरावाद  (Aparavada)

    अपरवाद सृष्टिविषयक चतुर्थ मत है, जिसपर ओझा जी का यह स्वतन्त्र ग्रन्थ है । प्रस्तुत ग्रन्थ में पर का अर्थ आत्मा और अपर का अर्थ प्रकृति है । भौतिक जगत् प्राकृतिक है इसका उद्भव प्रकृति से होनी चाहिए । प्रकृति का ही दूसरा नाम स्वभाव भी है । इसलिए प्रकृति या स्वभाव को सृष्टि का कारण मानने के कारण सृष्टिविषयक यह मत  अपरवाद कहलाता है ।  (Download)|
     
  31. जगद्गुरुवैभवम् (Jagadguruvaibhavam)

    यह ब्रह्मविज्ञान के अन्तर्गत दिव्यविभूति नामकग्रन्थविभाग का पहला ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में ब्रह्मा विषयक विविध प्रश्नों का सयुक्तिक समाधान किया गया है, यथा-ब्रह्मा कोई ऐतिहासिक व्यक्ति थे? अथवा इनका कोई वैज्ञानिक स्वरूप भी है? ऐतिहासिक ब्रह्मा कौन थे, वे कब और कहाँ हुए? वैज्ञानिक ब्रह्मा का क्या स्वरूप है? दोनों ब्रह्माओं का विश्वकर्तृत्व और विश्वगोप्तृत्व किस प्रकार है? वैज्ञानिक व ऐतिहासिक अथवा कौन हैं? उनका स्वरूप क्या है? आदि विषयों का निरूपण प्रस्तुत ग्रन्थ में किया गया है । (Download)
  32. वेदधर्मव्याख्यानम् (Vedadharmavyakhyanam)

    इस ग्रन्थ में वैदिक धर्मविषयक उन व्याख्यानों का संकलन है जिसे ओझा जी ने लन्दन तथा अन्य स्थानों पर विद्वज्जन के समक्ष वेद, धर्म और देवभाषा के सम्बन्ध में प्रस्तुत किया था ।   (Download)

  33. छन्दःसमीक्षा (Chhandhasamiksha) 

    छन्दःशास्त्र के विश्लेषण हेतु ओझा जी ने इस ग्रन्थ की रचना की है । इस ग्रन्थ में छन्दस्तत्त्व की समीक्षा की गयी है जिसमें पद्यच्छन्दोवेदगत शिक्षा, गणित, निरुक्ति, व्याकरण व कल्पभेद से पाँच अङ्ग प्रतिपादित हैं । अर्थात् इस पद्यच्छन्दोवेद में छन्दःशिक्षा, छन्दोगणित, छन्दोनिरुक्ति, छन्दोव्याकरण एवं छन्दोकल्प इन पाँच अङ्गों का निरूपण किया गया है ।
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  34. व्याकरणविनोदा Vyakaranavinodah 

    पण्डित मधुसूदन ओझा के वेदाङ्गसमीक्षा खण्ड में वाक्पदिका नामक विभाग में ‘व्याकरणविनोद’ ग्रन्थ का स्थान है। व्याकरण भाषा में प्रयोग होने वाले शब्दों को सिद्ध करने का कार्य करता है। विनोद पद का अर्थ अनायास या सहज है। जो ग्रन्थ भाषासम्बन्धी विषय को सरलता से पाठक को समझा दे उस ग्रन्थ को व्याकरणविनोद कहते हैं। इस ग्रन्थ में छह प्रकरण हैं- १. समासपरिच्छेद २. तद्धितपरिच्छेद ३. नामधातुपरिच्छेद ४. प्रक्रियापरिच्छेद ५. कृदन्तपरिच्छेद और ६. अव्ययपरिच्छेद ।समासपरिच्छेद में समास को बताया गया है। समास दो या इससे अधिक शब्दों को जोड़ने को समास कहते हैं। समास के ये भेद हैं-द्विरुक्तसमास, द्वन्द्वसमास, अव्ययीभावसमास, तत्पुरुषसमास, बहुव्रीहि हैं।

    जो प्रत्यय शब्द से होते हैं उसे तद्धित प्रत्यय कहते हैं। जैसे- समाज शब्द से सामाजिक, सुन्दर शब्द से सुन्दरता, शिक्षा शब्द से शैक्षिक आदि अनेक शब्द बनते हैं।नाम अर्थात् संज्ञाशब्द से धातु बनाने की प्रक्रिया का नामधातु है । जैसे कारित का अर्थ प्रेरणा है। णिच् प्रत्यय से यह शब्द बनता है। जैसे राम पढ़ता है, शिक्षक के द्वारा राम पढ़ाया जाता है। राम जाता है । मोहन के द्वारा राम को भेजवाया जाता है । यहाँ पढ़ाया और भेजवाया प्रेरणा का ही उदाहरण है।धातु से होने वाले प्रत्यय को कृत् कहते हैं। वह कृत् जिसके अन्त में हो वह कृदन्त कहलाता है। जैसे- पठ् धातु से पाठक, कृ धातु से कारक बना।

    संस्कृत में जिस पद का रूप न चलता हो वह अव्यय है। राम शब्द का कर्ताकारक आदि में रूप चलता है। धातु के भी लट् लकार आदि में रूप चलते हैं । परन्तु यथा, तथा, वा आदि अव्यय का रूप नहीं चलता है।

    इस प्रकार यह व्याकरणविनोद सहजता से पाठक को व्याकरण का निचोड़ समझाने में उपयुक्त है । यह ग्रन्थ छात्र को दृष्टि में रखकर समझाने के लिये पण्डित ओझाजी ने लिखा है। (Download)

  35. धर्मपरीक्षा पञ्जिका (Dharmapariksha panjika) 

    धर्मपरीक्षा में जो धर्म है उसका अर्थ संस्कार है एवं परीक्षा का अर्थ  विचार है। इस प्रकार धर्मपरीक्षा का अर्थ है- संस्कारों का विचार। कापी  को पञ्जिका कहते हैं। सामान्यतया जिसमें हमलोग लिखते हैं उसे संस्कृत में पञ्जिका कहते हैं। इस लघुकाय ग्रन्थ में धर्म के पाँच विषयों को  स्पष्ट किया गया है।  पहला विषय धर्म का मूल  क्या है, इस पर विचार है। पुनः धर्म के फल का प्रतिपादन है। इसी क्रम में फल के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए पण्डित ओझा जी ने कहा है कि- अध्याहार, परिहार और अभ्युन्नति, ये तीन प्रकार के फल हैं। विभक्तिरहस्य और नियामक रहस्य में धर्मों की सूक्ष्माता से विचार है। इस प्रकार यह ग्रन्थ धर्म विषयक विवेचना के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है। (Download)

  36.  विज्ञानविद्युत् (Vijnanavidyut)
     

    विज्ञानविद्युत् में षष्ठी समास हुआ है- विज्ञानस्य विद्युत् विज्ञानविद्युत्। विद्युत् का अर्थ चमक होता है। जिस प्रकार आकाश में विद्युत् चमकने पर उसके प्रकाश से वस्तु का ज्ञान तुरन्त हो जाता है उसी प्रकार इस ग्रन्थ को पढ़ने से ब्रह्मविज्ञान का बोध सहजता से हो जाता है। इसीलिए इस ग्रन्थ का अध्याय विभाजक शब्द प्रकाश रखा गया है। ग्रन्थकार ने कहा है कि वेद मार्ग में विचरण करने वालों के लिए विज्ञान रूपी विद्युत् का प्रकाश अज्ञान के अन्धकार को नष्ट करता हुआ क्षण भर के लिए भी सुख प्रदान करने वाला होगा।

                                                   विज्ञानविद्युत्संचारादज्ञानतिमिरात्ययः।

                                                   क्षणिकोऽपि सुखाय स्याद् वेदमार्गे विचारिणाम्॥

    गहन ब्रहमविज्ञान शास्त्र में प्रवेश कराने के लिए उपकार पहुँचाने वाला विज्ञानरूपी विद्युत् का यह प्रकाश किस के लिए सुखकारक नहीं होगा। अर्थात् सभी के लिए सुखकारक है।

                                                  गहने ब्रह्मविज्ञाने प्रवेशायोपकारक:।

                                                  विज्ञानविद्युदुद्योतः कस्य न स्यात् सुखावहः॥

    यह ब्रह्मविज्ञान का एक प्रकरण ग्रन्थ। इसको पढ़ने से ब्रह्मविज्ञान के सिद्धान्त का परिचय सरलता से हो जाता है। इस ग्रन्थ के प्रथम प्रकाश में चतुष्पाद ब्रह्म का निरूपण किया गया है । इसके अन्तर्गत पुर, पुरुष, परात्पर एवं निर्विशेष का वर्णन है। द्वितीय प्रकाश में क्षरपुरुष, अक्षरपुरुष और अव्ययपुरुष का वर्णन है। तृतीय प्रकाश में स्वयम्भूर्ब्रह्मा, परमेष्ठी विष्णु, सूर्य, सोम आदि विषयों का वर्णन है। चतुर्थ प्रकाश में आधिभौतिकनिरुक्ति, आध्यात्मिकनिरुक्ति, चिदात्मा, शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा, भूतात्मा, हंसात्मा, कर्मात्मा आदि विषयों का समावेश किया गया है। पञ्चम प्रकाश में पुरुषत्रय का, परात्पर और पुरुष में परस्पर भेद, पुरुष का सृष्टि में कारणता आदि विषयों को समाहित किया गया है।

    इस ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी ने किया है तथा राजस्थान पत्रिका प्रकाशन से प्रकाशित है। --download

  37. सदसद्वाद (Sadasdvada) 

    सदसद्वाद का अर्थ है कि यह इस संसार की उत्पत्ति सत् तत्त्व से, असत् तत्त्व से अथवा इन दोनों से तत्त्व से हुई है। ओझा जी के द्वादशवादों में इसका स्थान दूसरा है। इस ग्रन्थ का अभी अनुवाद नहीं हुआ है। इस में नित्यविज्ञानवाद, क्षणिकविज्ञानवाद, आनन्दविज्ञानवाद, कर्माद्वैतसिद्धान्त(असद्वाद), ब्रह्माद्वैतसिद्धान्त (सद्वाद), द्वैताद्वैतसिद्धान्तवाद (सदसद्वाद), रसबलैक्यसिद्धान्तवाद, असत्कार्यवादाधिकरण, सत्कार्यवादाधिकरण, मिथ्याकार्यवादाधिकरण, सदसत्पदार्थनिरूपण, प्रागभावसमुच्चितकारणवादाधिकरण और अव्यक्ताक्षरविकल्प हैं। इस प्रकार प्रधान शीर्षकों के अन्तर्गत अनेक उपशीर्षक भी हैं। ओझा जी इस ग्रन्थ के विषय में लिखते है कि इसमें प्रत्यय, प्रकृति, ऐकात्म्य, अभिकार्य स्वगुण, सामञ्जस्य औअर अक्षर ये साथ विषय हैं-

                                         प्रत्यय एवं प्रकृतिश्चैकात्म्यं चाभिकार्यं च।

                                         स्वगुणाः सामञ्जस्यं चाक्षर इति सप्तथा विमर्शाः स्यु: ॥

    इन सातों में क्रमशः असत्, सत् और सदसत् के भेद से यह सदसद्वाद एक्कीस विषय वाला सिद्ध होता है।

                                        प्रत्येकमेषु सन्ति त्रयो विकल्पा असच्च सत् सदसत्।

                                        तेनायमेकविंशी सदसद्वादो निरूप्यते सम्यक्॥

    ग्रन्थ के आदि में सत्, असत् तथा सदसत् से सम्बन्धित वेदवचनों को समाहित किया गया है।

    असद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                        असद्वा इदमग्र आसीत्। असतः सदजायत।

                                        असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।

                                         तदात्मानं स्वयमकुरुत। तस्मात् सुकृतमुच्यते। तै. उ. २/७

    सद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                         असन्नेव स भवति असद्ब्रह्मेति वेद चेत्।

                                        अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः॥ तै. उ. २/६

    सदसद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                        असदेवेदमग्र आसीत्। तत् सदासीत्।

                                        तत् समभवत्। तदाण्डं निरवर्तत। छान्दोग्योपनिषद्

    इस प्रकार इस ग्रन्थ के अध्ययन से दर्शन के छात्रों को नवीन दृष्टि मिलती है। --download
     

  38. दशवादरहस्य (Dashavadarahasya) 

    पण्डित मधुसूदन ओझा का दशवादरहस्य उनके द्वारा प्रतिपादित वाद ग्रन्थों का परिचयात्मक ग्रन्थ है। इसमें मुख्यतः सदसद्वाद, रजोवाद, व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद और सिद्धान्तवाद का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। इन वादों पर ओझाजी ने पृथक्-पृथक् ग्रन्थ लिखे हैं। उन गन्थों के साररूप को दशवादरहस्य में प्रस्तुत किया है । इसमें वैदिक पारिभाषिक पद वयुन को स्पष्ट किया गया है। ‘यह वस्तु है’ इस रूप में हमे जो वस्तु का ज्ञान होता है, वह वयुन है। वयुन के दो रूप हैं-वयः और वयोनाध। वस्तु मात्र में जि भार अर्थात् वजन है वह वय है तथा उस वस्तु की जो सीमा है, वह वयोनाध है। ओझाजी के अनुसार भार एवं सीमा दोनों ही वस्तु है। सत्तामात्र ही वयुन है। उन्होंने एक उदाहरण के द्वारा इस बात को स्पष्ट किया है।

    शिल्पकार मृत्पिण्ड को लेकर हाथी, अश्व, रथ, गिलास आदि अनेक प्रकार के शिल्प का निर्माण करता है। इन वस्तुओं में मृत्पिण्ड की दृष्टि से भेद नहीं है अपितु (सीमा एवं भार) की भिन्नता है। आकृति-भिन्नता के कारण गज-अश्व आदि की भिन्नता है।

    मृत्पिण्डमादाय हि कारुको गजं

    हयं रथं कंसमथान्यथा बहु ।

    शिल्पं विनिर्माति न मृद्विभिद्यते

    भिन्नाकृतिस्तेन गजाश्वभिन्नता ॥ --download

  39. व्योमवाद (Vyomavada)

    व्योमवाद में तीन कल्प हैं। कल्प अध्याय विभाजक शब्द है। प्रथमकल्प का नाम अमृतकल्प है जिसमें अद्वैतवाद, कार्यविभाग, अण्डविभाग और व्योमव्युत्पत्ति हैं। द्वितीय कल्प का नाम अपां कल्प है जिसमें अभ्वविभाग, लोकविभाग, भूतविभाग और गति विभाग हैं। तृतीय कल्प का नाम ज्योतिर्नामकल्प है जिसमें वेदविभाग और इन्द्रविवेक हैं। व्योम का अर्थ आकाश है। आकाश में ही सभी विशेष रूप से बसते हैं और आकाश सभी में व्याप्त है। विस्तृत होने से वह आकाश कहलाता है। आकाश से ही  इस जगत् की उत्पत्ति हुई है, उसी में वह लय को प्राप्त होता है तथा उसी में वह प्रतिष्ठित रहता है। --download

    40. Yagyamadhusudan--Smarthkundasamikshadhyaya (sanskrit)--download 
         
    41.  Smarthakundasamikshadhyayah (along with Hindi translation)

          Pandit Ojha in this authentic treatise has thoroughly and critically dwelt on the Kundas and other requisites of Smarta rites taking
          into consideration the characteristic views of almost ,all the earlier works on the subject. He has provided appropriate diagrams and
          numerous tables relating to the -measurements of the various Kundas with a view· to making the subject easily understandable. 
         (Download)

   42. ब्रह्मविज्ञान(Brahmavijnana)
 

         ब्रह्मविज्ञान ओझा जी का एक मात्र ग्रन्थ है जो हिन्दी भाषा में है। यद्यपि यह ग्रन्थ ओझा जी के व्याख्यान का लिखित रूप है। ब्रह्मविज्ञान का अर्थ है ब्रह्म सम्बन्धी
         विषयों का स्पष्टीकरण। इस ग्रन्थ में मंगलाचरण, प्रतिज्ञा, सदसद्वादविकल्प सप्तविकल्पसूत्र, मूलोपनिषद्, संशयोपनिषद्, असत्योपनिषद्, विशिष्ट-
         त्रिसत्योपनिषद्, शुक्ल-त्रिसत्योपनिषद्, परात्पर आत्मसूत्र, सत्यत्रयसूत्र, योगरूढ़ यैगिकरूढ़, यज्ञ, व्यूहानव्यूह परिच्छेद, आत्मपरिच्छेद और आत्मगति परिच्छेद
         हैं। इन शीर्षकों के अन्तर्गत अनेक उपशीर्षक भी हैं। ओझा जी के इस ग्रन्थ में प्राण को सहजतापूर्वक समझाया गया है।

        (१) प्राण ‘कुर्वद्रूप’ अर्थात् प्रतिक्षण क्रियाशील है। जगत् में जो कुछ जहाँ क्रिया होती है वह सब प्राण का ही रूप है। प्राण एक स्थान से दूसरे स्थान में जब सम्बन्ध
        करता है तो उस वस्तु में कम्पन होता है उसी को क्रिया कहते हैं। सभी क्रियाओं का यही उपादान है।

        (२) यद्यपि भारतीय दार्शनिकों ने प्राण को वायु माना है और वायु का स्पर्श होता है। परन्तु ओझा जी वायु और प्राण को पृथक् मानते हैं। प्राण में धारण की शक्ति          है। परन्तु उसका बोध नहीं होता।

        (३) प्राण भूतमात्रा के बिना कभी कहीं भी नहीं रहता। प्रत्युत इसी स्वभाव के कारण यह प्राण ‘वाक्’ में में रहकर अपने विधरण धर्म से प्रतिक्षण घन बनता रहता            है। ओझा जी के अनुसार प्राण चार प्रकार के हैं- (क)परोजा प्राण जिससे त्रैलोक्य सृष्टि में सभी पदार्थ विधरण के कारण अपने-अपने स्थान पर नियत रूप से                रहते  हैं।(ख) आग्नेय प्राण जो विशकलन करने का स्वभाव रखता है।(ग) सौम्य प्राण जो घन करने का स्वभाव रखता है। (घ)आप्य प्राण जो रूपान्तर में बदलने            का स्वभाव रखता है।

       (४) प्राण और भूत पृथक् पृथक् स्थान नहीं रखते। प्राणमय भूत या भूतमय प्राण ही देखने में आते हैं।

       (५) यद्यपि मन किसी वस्तु का संग नहीं करता किन्तु प्राण, संग करने की अधिक शक्ति रखता है। अतः वह अपनी शक्ति से मन को अपने में बाँध लेता है।

      (६) प्राण स्वयं बिना मन के कोई भी व्यापार नहीं करता।

      (७) प्राण कभी सोता नहीं है सर्वदा काम करता रहता है इसी को अप्रसुप्ति कहते हैं।

      (८) प्राण कभी नहीं थकता और न कभी विश्रांअ चाहता है।

      (९) प्राण एक वस्तु से दूसरी वस्तु में चला जाता है।

      (१०) चलते चलते रुक जाता है और फिर चलता है। चलना ठहरना मेढक जैसी चाल है।

      इस प्रकार ओझा जी ने प्राण और वायु में जो भेद किया है वह विचारणीय। प्राणविद्या का प्रयोग होता है। पञ्चप्राण या पञ्चवायु में प्राण प्रथम है अपान इत्यादि है।

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   43. Vijnanabhashya--download

   44. Srimad Bhagvad-Gita-vijnanabhasyam--moolakandam (with Hindi translation)--downloadwhats new

   45. Srimad Bhagvad-Gita-vijnanabhasyam--rahasyakandam (with Hindi translation)--downloadwhats new


Books authored by PANDIT MOTILAL SHASTRI
 

शतपथब्राह्मण प्रथमकाण्ड  (Shatapathabrahmana Part 1)

साधारणतया  लौकिक दृष्टि से ‘यजुर्वेद’ और तत्त्वदृष्टि से ‘यज्जूर्वेद’ है । इस में दो पद हैं-यत् और जूः। जिसका क्रमशः अर्थ  प्राण, वायु,गति और वाक्, आकाश स्थिति है ।

शतपथब्राह्मण में एक सौ अध्याय हैं । इस के कारण इसका नाम शतपथ है। यजुःसंहिता के व्याख्यारूप यजुर्ब्राह्मण है । जिसके शाखा भेद से एक सौ एक विभाग माने गये हैं। इनमें 15 शाखाएँ ‍‘शुक्लयजुर्वेद’ नाम से प्रसिद्ध हैं और 86 शाखाएँ ‘कृष्णयजुर्वेद’ नाम से व्यवहृत होते हैं । सामान्यतया शुक्लयजुर्वेद की ‘माध्यन्दिनशाखा’ और काण्वशाखा ही उपलब्ध होता है । पण्डित मोतीलाल शास्त्री के अनुसार संहितावेद ‘मन्त्रवेद’ और विधि, आरण्यक तथा उपनिषद् के भेद से विभक्त वेदसमष्टि ही ‘ब्राह्मणवेद’ है । शतपथब्राह्मण के 14 काण्डों में 13 काण्ड केवल ‘विधि’ का विश्लेषण करते हैं। 14 वां काण्ड आरण्यक और उपनिषद् इन दोनों का संग्रह है।

माध्यन्दिन और काण्व ये दोनों सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य हैं । इन दोनों शाखाओं का नाम वाजसनेयी है । वाजसनेय याज्ञवल्क्य का ही दूसरा नाम है, क्योंकि सम्पूर्ण शुक्लयजुर्वेद के आचार्य  याज्ञवल्क्य हैं ।

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने शतपथब्राह्मण पर हिन्दी विज्ञानभाष्य की रचना की है। 

नोट-प्रथमकाण्ड का प्रथमखण्ड  Download के लिए दिया गया है 

Shatapathabrahmana Khand 1 Part 3

Shatapathabrahmana Khand 2

केनोपनिषद् (Kenopanishad)

केनोपनिषद् उपनिषदों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है । यह उपनिषत्  सामवेद के तवलकार ब्राह्मण के अन्तर्गत है। तवलकार ब्राह्मण का यह नवम अध्याय है। इस उपनिषद् में सबसे पहले ‌‘केन’ शब्द आया है, इसी से इसका नाम   केनोपनिषद्  है । पण्डित मोतीलाला शास्त्रीजी के अनुसार इस उपनिषत् में प्रधानतया प्रज्ञानात्मा का ही निरूपण हुआ है। (Download)


कठोपनिषद्  (Katopanishad) 

कठोपनिषद् कृष्णयजुर्वेद की कठशाखा के अन्तर्गत है। इसमें दो अध्याय और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लीयाँ हैं। इसमें नचिकेता और यम के संवाद के द्वारा परमात्मा के रहस्यमय तत्त्व का विशद वर्णन है। इस उपनिषद् पर आचार्य शंकर का भाष्य समाज में अत्यधिक प्रचलित है। परन्तु यहाँ वेदवाचस्पति पण्डित मोतीलाल शास्त्री के हिन्दी-विज्ञानभाष्य की विशेषता प्रस्तुत है। (Download) 

मुण्डकोपनिषद् (Mundakopanishadvigyanbhashya)

अथर्ववेद की शौनकीशाखा से संबद्ध यह मुण्डकोपनिषद् है। इस में तीन मुण्डक एवं प्रत्येक मुण्डक दो-दो खण्डों में विभक्त हैं। इस उपनिषद् के ऊपर भी पण्डित मोतीलाल शास्त्री का विज्ञानभाष्य है। शास्त्री जी ने विज्ञानभाष्य में जो विशेषता है उसका दिग्दर्शन इस मन्त्र की व्याख्या से संभव है।

                                                     यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति।

                                                         यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतीह विश्वम्॥

इस मन्त्र में तीन कार्य-कारण सिद्धान्त का वर्णन है।

मकड़ी-जाल का सिद्धान्त : मकड़ी कारण और उससे उत्पन्न होने वाला जाल कार्य है। इस कार्य-कारण में शास्त्री जी मुख्यरूप से चार तथ्यों को स्पष्ट करना चाहते हैं। मकड़ी का जाल मकड़ी से उत्पन्न होकर मकड़ी के साथ रहता है, मकड़ी से भिन्न स्थानों पर रहता है, मकड़ी में ही उसका लय होता है और मकड़ी में उसका लय नहीं होता है। यह चार स्थितियाँ मकड़ीजाल के साथ है।

पृथ्वी-औषधि का सिद्धान्त : पृथ्वी कारण और औषधि कार्य है। इस कार्य-कारण में औषधि पृथ्वी से उत्पन्न होकर पृथ्वी पर रहती है, पृथ्वी से भिन्न स्थानों पर भी रहती है और पृथ्वी में ही विलीन होती है।

पुरुष- केश का सिद्धान्त : पुरुष कारण और केश कार्य है। केश पुरुष में (उत्पत्ति स्थान में) रहता है और नहीं भी(उत्पत्ति स्थान में) रहता है। केश का अपने कारण पुरुष में विलय नहीं होता है। केश अपनी उत्पत्ति स्थान से भिन्न भी रहता है। जब हम केश को काटते हैं तब केश कटते ही पुरुष ( कारण) से अलग हो जाता है।

इस प्रकार अक्षर रूप कारण से विश्वरूप जगत् का प्रादुर्भाव होता है। मुडकोपनिषद् में भी विस्तार से शास्त्री जी ने अनेक विषयों को समाहित किया है। जिसके अध्ययन से नवीन विषयों का ज्ञान होता है।  (Download)

माण्डूक्योपनिषद् (Mandukyopanishad)

माण्डूक्योपनिषद् का अथर्ववेद से सम्बन्ध है। इस में मात्र बारह मन्त्र हैं। पण्डित मधुसूदन ओझा के कतिपय सिद्धान्तों का मूलस्रोत यह उपनिषद है। ओझाजी ने चतुष्पाद ब्रह्म को स्वीकार किया है जिसका आधार यही उपनिषद् है। ओझाजी ने चतुष्पाद की व्याख्या के लिए एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही लिखा है जिसका नाम ब्रह्मचतुष्पदी है।

                                                  ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्। मन्त्र २

ओझा जी का दूसरा सब से प्रमुख वैदिक पारिभाषिक पद है अक्षर जिसका भी मूलस्रोत यही उपनिषद् है।

                                                 ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्। मन्त्र१

इस उपनिषद् पर पण्डित मोतीलाल शास्त्री का हिन्दीविज्ञान भाष्य है। उन्होंने किस प्रकार चतुष्पाद की व्याख्या प्रस्तुत की है। ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ के अनुसार ब्रह्म विश्व की रचना कर के उस में प्रविष्ट होता है। अत एव विश्व का ही दूसरा नाम प्रविष्टात्मा है, विश्व यह तीन पाद है और शुद्ध आत्म एक पाद है। इन दोनों को मिला कर चहुष्पाद हो गया।

इस की एक दूसरी व्याख्या करते हुए शास्त्री जी लिखते हैं कि प्रविष्टात्मा अर्थात् विश्व में चार पाद हैं- प्रथमपाद अव्यय, द्वितीयपाद अक्षर, तृतीय पाद आत्मक्षर है। आत्मक्षर के दो भेद हैं- ब्रह्म और सुब्रह्म। इनके अनुसार ब्रह्म से स्थिर सृष्टि होती है और सुब्रह्म से अस्थिर सृष्टि होती है। स्थिर सृष्टि के अन्तर्गत नदी, समुद्र, पर्वत आदि आता है तथा अस्थिर सृष्टि में जीव का स्थान आता है। इस ग्रन्थ को पढ़ने से भारतीय दर्शन के पाठक को एक नवीन दृष्टि मिलती है।  --download

प्रश्नोपनिषद् (Prashnopanishat Hindi Vigyan Bhashya) 

प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेद के पिप्पलाद शाखा के ब्राह्मण के अन्तर्गत है। इस उपनिषद् में पिप्पलाद ऋषि ने सुकेशा आदि छह ऋषियों के छह प्रश्नों का क्रम से उत्तर दिया है; इसलिए इसका नाम प्रश्नोपनिषद् है। पण्डित मधुसूदन ओझा ने अपने व्याख्या के केन्द्र में प्रजापति को एवं रयि और प्राण को मुख्य स्थान दिया है। जिसका स्रोत यही उपनिषद् है। सामान्य जन को ‘रयि’ शब्द प्रायः नवीन लगता है परन्तु इसकी वैज्ञानिकता को ओझाजी ने ही उद्घाटित किया है।

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं च चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति। प्रश्न १/४

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने इस उपनिषद् पर हिन्दी में बहुत बड़ा विज्ञानभाष्य लिखा है। आदित्य प्राण है और चन्द्रमा रयि है। संसार में जो मूर्त और अमूर्त हैं, वे सब रयि हैं। अतः मूर्ति ही रयि है। रयि और प्राण के युग्म से यह संसार बना है। ‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्’ ऋग्वेद के इस मन्त्र में ऋत और सत्य को सृष्टि का मूल कारण बताया गया है। उसी तत्त्व को उपनिषद् में रयि और प्राण के रूप में वर्णन किया गया है। -- download

Upanishadavigyanabhasha bhumika --part two--download

उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका- तृतीय खण्ड (Upanishadavigyanabhasha bhumika --part three)
 

उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका तीन खण्डों में विभक्त है। इस में अनेक विषयों को पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने समाहित किया है। पण्डित मधुसूदन ओझा एवं शास्त्री ने सनातन सिद्धान्तों को वेद और ब्राह्मण के आधार पर स्पष्ट किया। जबकि अन्य आचार्यों ने सम्प्रदाय के अनुरोध से एक तत्त्व पर विशेष आग्रह किया है। उसी आग्रह के कारण भारतीय मनीषी अन्य अर्थ को स्वीकार करने से हिचकते हैं। यही वैदिकविज्ञान की विशेषता है। पाठकों के रूचि के लिए यहाँ निर्विशेष, परात्पर, अव्यय, अक्षर और क्षर में परस्पर क्या विशिष्टता है, इसका प्रतिपादन यहाँ किया गया है।

निर्विशेष - शुद्ध रसात्मक निर्विशेष बनता हुआ ‘ऐकान्तिकसुख’ लक्षण वाला है। निर्विशेष वह है जिसमें कोई विशेषता न हो अर्थात् वह माया अथवा बल से युक्त न हो। उस स्थिति में रूप या आकार नहीं बनता है। यही निर्विशेष जनसामान्य में निर्गुण कहलाता है। निर्विशेष स्थिति का अनुभव होता है।

परात्पर-बलविशिष्ट रसात्मक परात्पर मायातीत बनता हुआ, नित्यप्रतिष्ठ रहता हुआ ‘शाश्वतधर्म’ लक्षण वाला है। निर्विशेष का जब बल के साथ सम्बन्ध होता है और माया से परे रहता है तब वह परात्पर कहलाता है। वैदिकविज्ञान में बल और माया में कुछ विशिष्टता है। यही परात्पर जनसामान्य में सगुण कहलाता है तथा इस स्थिति में रूप और आकार होता है।

अव्यय- महामाया से अवच्छिन्न रसबलात्मक अव्यय विविधभावाशून्य रहता हुआ ‘अव्यय’ लक्षण वाला है। अव्यय में तीनों तत्त्व होते हैं- शुद्ध रस, बल एवं माया। इसका व्यय नहीं होता है। अर्थात् यह नित्य तत्त्व के रूप में रहता है।

अक्षर -हृदय से अवच्छिन्न रसबलात्मक अक्षर निमित्तकारण से अपने अविपरिणामी धर्म से ‘अमृत’ लक्षण है। वैदिकविज्ञान में हृदय एक प्रमुख पारिभाषिक पद है । घटरूप कार्य में कुम्भकार निमित्त कारण है। वैसे ही इस जगत् का निमित्त कारण अक्षर ही है।

क्षर- परिधि से अवच्छिन्न रसबलात्मक आत्मक्षर उपादान कारण से अपने परिणामी रूप से विश्वोत्पादन बनता हुआ ‘ब्रह्म’ लक्षण वाला है।

उपर्युक्त विषयों को शास्त्री जी ने गीता के आधार पर प्रस्तुत किया है-

                                                                           ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।

                                                                           शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ गीता १४/२७

                                                                                                                                                        --download

Bhaktiyogapariksha-Purvakhanda--download

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Buddhiyoga pariksha -purvakhanda--download

Jnanayogapariksha--download


Rajashrividyayam-prathamopanishad-download

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Rajashrividyayam-tritiyopanishad--download 

Vedasyasarvavidyanidhanavatam (Download)

संशयतदुच्छेदवाद खंड --१ , २  और  ३ (Samshayataduchedavad  Part One, Two and Three) 

विद्यावाचस्पति पंडित मदुसुदन ओझा जी द्वारा विरचित संशयतदुच्छेदवाद नामक ग्रन्थ का उनके ही प्रधान शिष्य वेदवाचस्पति पंडित मोतीलाल शास्त्री जी द्वारा किये गए हिंदी विज्ञानंभाष्य प्रथम और तृतीय खंड यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं

यह ग्रन्थ तीन काण्डों में विभाजित है,जो विज्ञानोपक्रमाधिकार, संशयाधिकार एवं संशयोच्छेदाधिकार के नाम से अभिहित किया गया है । यह ब्रह्मविज्ञान के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले संशयों का उच्छेद करने वाला ग्रन्थ है । सृष्टिविषयक प्रचलित द्वादशवादों में संशयवाद को आधार बनाकर ओझाजी द्वारा इस ग्रन्थ की रचना की गयी । इस ग्रन्थ में सृष्टि के विषय में जितने मतभेद हैं, उन मतभेदों का निरूपण कर उनका निराकरण किया गया है । परमेश्वर, ईश्वर, जीव, आत्मा, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, उपासना, मोक्ष आदि अनेक दुरूह विषयों के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले प्रश्नों का निरूपण करते हुए उनका वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तर प्रस्तुत किया गया है ।

प्रथम खंड –Part One

द्वितीय खंड--Part Two

तृतीय खंड- Part Three

 

वैहायसकृष्ण रहस्य (Vaihayaskrishna rahasya) --ashtam khanda

वैहायसकृष्ण रहस्य नामक ग्रन्थ में वैहायस का अर्थ अन्तरिक्ष है। पण्डित मोतीलाल शास्त्री के अनुसार अवतार का क्रम यह है कि स्वयम्भू क्रमश: परमेष्ठीमण्डल में, सूर्यमण्डल में, चन्द्रमण्डल में और पृथ्वी में उतरता है। पृथ्वी पर उतर कर ही सृष्टि का कार्य करता है। चन्द्रमण्डल आकाश में है और आकाश का अन्तरिक्ष स्वरूप है। अतएव वैहायस के वर्णन में चन्द्रमा मुख्य आधार है। चन्द्रमा को आधार बनाकर ग्रन्थ का विश्लेष किया गया है। चन्द्रमण्डल का जो तेज है वह कृष्ण का ही तेज है। गीता में भगवान् कहते हैं-

                                                    यदादित्यगतं तेजो जगद्भाषयतेऽखिलम्।

                                                    यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥ गीता. १५.१२

चन्द्रमा का रूप कृष्ण (काला ) है अतएव कृष्ण का भी रूप काला है। यजुर्वेद के एक मन्त्र में चन्द्रमा को समुद्र में स्थान बताया है। इसी आधार पर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका में सम्द्र के बीच में रहे।

                                                   चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि।

                                                   रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृःअं हरिरेति कनिक्रदत्॥ यजुर्वेद ३३.९०
 प्रकृति यज्ञ में अध्वर्यु वायु, उद्गाता आदित्य, होता पार्थिवाग्नि और चन्द्रमा ब्रह्मा। यह प्राकृतिक यज्ञ है।

                                                   तस्याग्निर्होताऽऽसीत्। वायुरध्वर्युः। सूर्य उद्गाता। चन्द्रमा ब्रह्मा। गोपथब्राह्मण १.१३

इस प्रकार इस ग्रन्थ में कृष्ण का चन्द्र के साथ साम्य बतला कर विविध विषयओं के माध्यम से विषय को स्पष्ट किया गया है। शास्त्री जी ने कृष्ण को पूर्णावतार स्वीकार कर इनके विविध रूपों का वर्णन किया है। --download 

ईश्वरकृष्ण रहस्य (Ishvarkrishna rahasya)--pancham khanda

ईश्वरकृष्ण रहस्य नामक ग्रन्थ में ईश्वर का अर्थ प्रजापति है, ऐसा पण्डित मोतीलाल शास्त्री का विचार है। शतपथब्राह्मण में ‘संवत्सरः प्रजापति’ ऐसा वर्णन मिलता है। इसी के आधार पर प्रजापति की व्याख्या उन्होंने की है। संवत्सर की वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त, शिशिर ये छह ऋतुएँ हैं। अत एव प्रजापति भी छह संस्था वाले हैं- आत्मा, गुण, शरीर, द्रविण, उपग्रह, कार्त्स्न्य।

आत्मप्रजापति- अव्यय, अक्षर, और क्षर इन तीनों की समष्टि का नाम आत्मा है।

गुण प्रजापति- प्रतिष्ठा, ज्योति और यज्ञ ये तीन आत्मा के गुण हैं ।

                             यः सर्वज्ञ: सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः।

                             तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥ मुण्डकोपनिषद् १.१.९

इस मन्त्र में जो ब्रह्म है वही प्रतिष्ठा है। नाम और रूप ज्योति है तथा अन्न ही यज्ञ है।

शरीर प्रजापति- बीज, दैवत और भूत इन तीनों की समष्टि ही आत्मप्रजापति हैं।

द्रविणप्रजापति- द्रविण का अर्थ वित्त अथवा सम्पत्ति है। यह तीन प्रकार की है- ब्रह्म, क्षत्र और विट्। ब्रह्म का अग्नि से सम्बन्ध है। अग्नि का छन्द गायत्री है अतएव ‍‘गायत्र्या ब्राह्मणे निरवर्तयत्’ यह कहा जाता है। क्षत्र का इन्द्र से सम्बन्ध है। इन्द्र के छन्द का नाम ‘त्रिष्टुप्’ है। अतएव ‘त्रिष्टुभो वै राजन्यः’ विट् विश्वेदेवों से सम्बन्ध रखता है। वह द्युलोकस्थ है। द्युलोक के छन्द जगती है। अतएव ‘जगती-छन्दा वै राजन्य:’ कहा जाता है। ब्रह्म, क्षत्र और विट् ये तीन अन्तरङ्ग वीर्य कहलाता है।

उपग्रहप्रजापति- वेद, लोक और वाक् ये तीन उपग्रह हैं। इस उपग्रह में वेद साहस्री, लोक साहस्री और वाक् साहस्री ये तीन साहस्री हैं।

कार्त्स्न्य प्रजापति- जाया, प्रजा और वित्त ये तीन ही कार्त्स्न्य (समग्र)हैं। जब तक ये तीनों नहीं होती हैं तब तक जीवात्मा अपने आपको अधूरा समझता है।

इस प्रकार इस ग्रन्थ में अनेक विषयों को स्पष्ट किया गया है। वर्णन के क्रम में शास्त्री जी ने अनेक भेदों उपभेदों का वर्ण किया है। इस के अध्ययन से भारतीय दर्शन के पाठकों को एक नई दिशा मिलेगी। --download

ब्रह्मकर्मरहस्य (Brahmakarma rahasya) dvitiya khanda-

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने ब्रह्म-कर्म नामक लघुग्रन्थ में इन दो तत्त्वों को विवेचित किया है। यह ग्रन्थ भी गीताविज्ञान भाष्य का ही भाग है। शास्त्री जी के अनुसार आत्मा में हमेशा दो भावों की सत्ता होती हैं। वे हैं-ज्ञान और कर्म। आत्मा जानता है और करता है। सारा संसार जानना और करना इन दो धर्मों से युक्त है। न आत्मा शुद्ध ज्ञानमय है, न आत्मा शुद्ध कर् मय है अपितु उभयात्मक है। जो ज्ञान भाग है- वह ब्रह्म कहलाता है। वही गीता में अमृत शब्द से व्यवहृत किया गया है। एवं कर्म मृत्यु शब्द से कहा गया है। इस प्रकार आत्मप्रजापति का आधाभाग अमृत है और आधा भाग मर्त्य है। दोनों की समष्टि आत्मा है। आत्मा ब्रह्मकर्ममय है । इसका प्रतिपादन शतपथब्राह्मण में मिलता है-

                                             अर्द्धं ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम्। शत. ब्रा. १०.१.३.२

ब्रह्मभाग के रूप में अव्यय, अक्षर, क्षर का वर्णन तथा कर्म के विविध आयामों का वर्णन इस ग्रन्थ में किया गया है। -download 

ज्योतिकृष्णरहस्य (Jyotikrishna rahasya)-

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने कृष्ण के अनेक स्वरूपों के आधार पर कृष्णों के विविध नाम से धारावाहिक रूप में लघुग्रन्थों का प्रणयन विषय को स्पष्टता के लिये किया है। प्रतिष्ठाकृष्णरहस्य के बाद ज्योतिकृष्णरहस्य का क्रम आता है। प्रायः लोक में जिस प्रकाश के दर्शन हम लोग करते हैं उस प्रकाश का जो कारण है। वह ज्योतिश्वरूप कृष्ण है। इस क्रम में शास्त्री जी ने मुण्डकोपनिषद् के मन्त्र को उद्धृत किया है।

                                                    न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।

                                                    तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।

वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारागण ही, न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर इस अग्नि के लिए तो कहना ही क्या। उसी के प्रकाश से सभी प्रकाशित होते हैं । उस प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। यह मन्त्र कठोपनिषद् एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी मिलता है। ज्योति का अर्थ प्रकाश है। जिससे यह लोक प्रकाशित होता है। उस को जहाँ से प्रकाश मिलता है वही तत्व कृष्ण हैं। इसी मन्त्र के आधार पर ज्योति दो प्रकार के हैं, ऐसा शास्त्री जी कहते हैं। पहला ज्ञानज्योति और दूसरा भूतज्योति। भूतज्योति में सूर्य, चन्द्रमा, तारक, विद्युत् एवं अग्नि है। इस में अनेक विषयों को समाहित किया गया है। -download

प्रतिष्ठाकृष्ण रहस्य  (Prathishta-krishna rahasya)     

पण्डित मधुसूदन ओझा ने ब्रह्मसिद्धान्त नामक अपने ग्रन्थ में प्रतिष्ठाधिकरण में ‘प्रतिष्ठा’ पद को एक विशिष्ट पारिभाषिक शव्द के रूप में प्रस्तुत किया है। इनके प्रधान शिष्य एवं वैदिकविज्ञान के हिन्दी विज्ञानभाष्यकार पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने गीता की व्याख्या के क्रम में प्रतिष्ठाकृष्ण रहस्य को स्पष्ट किया है। प्रतिष्ठा पद का प्रयोग बृहदारण्यक उपनिषद् एवं केनोपनिषद् में मिलता है। प्रतिष्ठा का अर्थ है कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं उसमें जो स्थिरता है, वही प्रतिष्ठा है और वह ब्रह्म है। शास्त्री जी ने ब्रह्म को प्रतिष्ठा का पर्याय मान कर विविध आयामों में इसकी व्याख्या इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है।

                                अहोरात्राणि प्रतिष्ठा । बृहदारण्यक उपनिषद् १.१.१

                                 तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः। केनोपनिषद् ४.८  --download

 

 ऐतिहासिकोऽध्यायः (Aithihasika adhyaya)

ऐतिहासिकोऽध्याय भी गीताविज्ञानभाष्य का ही अंश है। इस लघुग्रन्थ में मूलरूप से कुरुक्षेत्र शब्द को आधार मान कर कौरव-पाण्डव के युद्ध का वर्णन है। विशेषरूप से इस ग्रन्थ में आधिदैविक कुरुक्षेत्र, स्वर्गीय कुरुक्षेत्र और भारतवर्षीय कुरुक्षेत्र का वर्णन किया गया है।

आधिदैविक कुरुक्षेत्र- सूर्य को केन्द्र में रख कर इसके चारों ओर क्रान्तिवृत्त के आधार पर भूपिण्ड घूमता है। क्रान्तिवृत्तावच्छिन्न सौरमण्डल ही कुरुक्षेत्र है।

स्वर्गीय कुरुक्षेत्र- जिस प्रकार प्रकृति में ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णु के विष्टप हैं उसी प्रकार यहाँ भी तीनों विष्टपों की कल्पना की गयी थी। प्राङ्मेरू (पामीर) से उत्तर का भूभाग उस युग का द्युलोक था। आज जो प्रान्त रूस नाम से प्रसिद्ध है, वह उस युग में स्वर्ग था। यहाँ यज्ञविद्या के प्रथम प्रवर्तक भौमदेवता निवास करते थे। इन देवताओं ने उसी प्रदेश में तीनों विष्टपों के मध्य में यज्ञभूमि बनायी थी। इस यज्ञ भूमि में देवता यज्ञ किया करते थे। अतएव यह प्रदेश कुरुक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भारतवर्षीय कुरुक्षेत्र- हस्तिनापुर से पश्चिम का सारा प्रदेश सुप्रसिद्ध कुरुक्षेत्र है। यहाँ सरस्वती नामक नदी है जो आगे जाकार टीले में लुप्त होकर फिर निकली है, अतएव इसे लुप्ता सरस्वती भी कहा जाता है। भरतवर्ष की जिस पवित्र भूमि में ब्रह्मादि देवताओं ने यज्ञ किया, वही भूमि रजर्षि कुरु के हल चलाने से कुरुक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुई।  --download 

आत्मविज्ञानोपनिषद् (Atmavigyanopanishadh)

वेदवाचस्पति पं. मोतीलाल शास्त्री विरचित श्राद्धविज्ञान नामक ग्रन्थ कर्मकाण्ड विषयक एक प्रौढ रचना है । विषय प्रतिपादन की दृष्टि से यह ग्रन्थ चार खण्डों में विभाजित है । चारों खण्डों के नाम क्रमशः आत्मविज्ञानोपनिषद्, पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषद्, सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषद् एवं आत्मगतिविज्ञानोपनिषद् है । प्रत्येक खण्ड पुनः अनेक अवान्तर प्रकरणों में विभक्त हैं जिनमें अनेक परिच्छेद हैं । उन परिच्छेदों में कर्मकाण्डीय वैज्ञानिक तत्त्वों का सारगर्भित विश्लेषण हुआ है ।

आत्मविज्ञानोपनिषद् नामक प्रथम खण्ड में आत्मा के स्वरूप का वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण हुआ है । चूँकि शरीर- भिन्न-आत्मसत्तावाद ही श्राद्धकर्म की मूल प्रतिष्ठा है, अतः यह प्रथम खण्ड आत्मविषयक विवेचन से ही प्रारम्भ हुआ है । आत्मविषयक अनेक प्रश्न यथा- शरीर ही आत्मा है? या आत्मतत्त्व शरीर से पृथक् है? यदि आत्मा व्यापक है, तो उसकी परलोक गति कैसे सम्भव है? यदि आत्मा पूर्व शरीर के साथ ही अन्य शरीर धारण कर लेता है, तो पिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म किस उद्देश्य से किया जाता है? पार्वणादि श्राद्ध किस आत्मा के लिए विहित है? गयाश्राद्ध किस आत्ममुक्ति का कारण बनता है? इत्यादि आत्मस्वरूपविषयिणी जिज्ञासाओं के वैज्ञानिक समाधान यह आत्मविज्ञानोपनिषद् नामक प्रथम खण्ड करता है । यह खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषद्, अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषद्, यज्ञात्मविज्ञानोपनिषद्, विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषद्, महानात्मविज्ञानोपनिषद् एवं प्राणात्मविज्ञानोपनिषद् नामक कुल पाँच प्रकरणों में विभक्त है । इन पाँचों प्रकरणों के अन्तर्गत अनेक परिच्छेदों द्वारा आत्मा के विविध पक्षों पर साङ्गोपाङ्ग विमर्श किया गया है । --download 


Vyakhyanapanchakam (The five lectures)

This is the collection of five lectures given by Pandit Motilal Shastri at Rashtrapati Bhavan, New Delhi, in 1956.  Shastriji was invited by the first President of independent India, Dr Rajendra Prasad, to present his profound views on the Vedas and other sacred texts.

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भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता (Bharatiya Hindu Manav aur Uski Bhavukta)-first part--download  

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने ‘भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता’ प्रथमखण्ड में दो स्तम्भ हैं- असदाख्यानस्वरूपमीमांसा और विश्वस्वरूपमीमांसा। यह ग्रन्थ भी हजार पृष्ठों में शास्त्रीजी ने लिखा है। इसकी भूमिका विख्यात इतिहासविद् डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखी है। असदाख्यानस्वरूपमीमांसा २६ शीर्षकों को एवं विश्वस्वरूपमीमांसा में २८९ विषयों को समाहित किया गया है। अनेक गम्भीर विषयों को उन्हों ने स्पष्ट किया है। प्राय: इनके द्वारा व्याख्यायित शब्दों का वर्णन किसी अन्य आचार्यों ने नहीं किया है। पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने अपने युग के अनुरूप सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा-पण्डित मोतीलाल शास्त्री  ने ‘भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता’  नामक शीर्षक से अनेक विषयों को आधार बनाकर ग्रन्थ शृंखला का प्रारम्भ किया था। इस शीर्षक का चतुर्थ खण्ड का नाम ‘दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा’ है। शास्त्री जी ने दिक् अर्थात् दिशा, देश अर्थात् स्थान और काल अर्थात् समय इन तीनों विषयों पर विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। इस की विशालता का अनुभव पृष्ठों के आधार पर किया जा सकता है, क्योंकि इस में ११२+८३+७०४=९०० पृष्ठ हैं।  इसकी प्रस्तावना में २०६ उपशिर्षकों को समाहित किया गया है। पारिभाषिक प्रकरण में १८५ बिन्दूओं पर चर्चा की गयी है। ग्रन्थ में  दिग्देशकाल का विस्तृत स्वरूप विवेचित है। वेद पुराणों को आधार बनाकर विषयों को लोकोपकारी एवं सर्वजन्यग्राह्य बनाने का सफल प्रयास किया गया है।  यह तीनों विषय वर्तमान समय में भी विद्वानों के द्वारा गहन चिन्तन किया जा रहा है। इस ग्रन्थ को  एक बार पढने मात्र से  विषय का सहज  बोध संभव है।

भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता--इस शृंखला में शास्त्री जी का एक और ग्रन्थ है । जिसका प्रकाशन अभी नहीं हुआ है। उस भाग को श्री शंकर शिक्षायतन धारावाहिक के रूप में अपने वेवसाईट पर पोस्ट करने का संकल्प लिया है। एक-दो अंश का पोस्ट हो चुका है, शेष भाग की आशा है कि शीघ्र ही पाठक के  प्रस्तुत किया जायेगा।

सत्तानिरपेक्ष ‘संस्कृति’ शब्द एवं सत्तासापेक्ष सभ्यता शब्द का चिरन्तन इतिवृत्त तथा भारतीय सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा--download

पण्डित मोतीलाल शास्त्री द्वार लिखित इस ग्रन्थ में भारतीयों की दृष्टि से इसका वर्ण किया है। स्वयं शास्त्री जी ने लिखा है कि रामधारी सिंह दिनकर के ‘ संस्कृति के चार’ अध्याय को पढकर उन्हें ऐसा लगा कि यह दिनकर जी का विचार तो पश्चिम के देशों से प्रभावित है। इसका भारतीय क्या स्वरूप हो सकता है । इसका प्रयास शास्त्री जी ने एक हजार पृष्ठों में यहाँ किया है। उन्हों ने यजुर्वेद के एक मन्त्र ‘ सा संस्कृतिः प्रथमा विश्ववारा’ को आधर बना कर व्याख्या करने का प्रयास किया है। उन्हों ने तात्कालिक राजनीति को भी दृष्टि में रख कर नेहरू आदि के विचारों का उल्लेख किया है। यह ग्रन्थ अत्यन्त ही उपयोगी एवं पढने योग्य है।


विज्ञानचित्रावली (Vijnanachitravali part two)

विज्ञानचित्रावली द्वितीयभाग में शतपथब्राह्मण, गीताविज्ञानभाष्यभूमिका, ईशोपनिषत्, छान्दोग्योपनिषद्, श्राद्धविज्ञान, संस्कृत एवं सभ्यता नामक ग्रन्थ में प्रयुक्त चित्रों का संग्रह है। इसमें अच्छे- अच्छे चित्र बने हुए हैं। जिसमें यजमानपात्री, पत्नीपात्री, इडापात्री, ब्रह्मचमसः, प्राशित्रहरणम्, अन्तर्धानकटम् अदि हैं। प्रत्येक चित्र के नीचे उसका हिन्दी में अर्थ  और उसकी उपयोगिता का वर्णन है।

प्राशित्रहरणम्- खदिरकाष्ठ से निर्मित गाय के कान के आकार का चार अङ्गुल माप के दण्डवाला होता है। इससे प्राशित्र-यज्ञ के ब्रह्मा को दिए जाने वाले हवन करने से बचे हवि का भाग का हरण होता है। अतः इस व्युत्पत्ति के कारण इसे प्राशित्रहरणम् कहा गया है।

 ब्रह्मचमसः- यह नयग्रोध वृक्ष से प्राप्त काष्ठ से अरत्नि माप का बनता था उपर्युक्त आकार‘ चतुरस्त्त्रोऽल्पदण्डो ब्रह्मचमसः चौकोर छोटे पकड़(दण्ड) वाले चमस का है।  होतृचमस, प्रशास्तृचमस, ब्राह्मणाच्छंसिचमस, अच्छावाकचमस, आग्नीध्रीयचमस  आदि होते थे और अपने- अपने आकार भेद से पहचाने जाते थे।

 यह चित्रावली आज के सन्दर्भ में विशेष महात्त्व का है क्योंकि यज्ञ के प्राचीन अपरिचित यज्ञीयपात्रों का चित्र इस में उपलब्ध है। -download 




Books authored by RISHI KUMAR MISHRA

 

  1. Before the Beginning and After the End: Rediscovering Ancient Insights

    Before the Beginning and after the End is a product of dedicated and prolonged research by the author into the ancient insights of India’s seer-scientists. It attempts to bring to light their wisdom as encapsulated in the Vedas. As the title suggests, its contents discuss forces and factors that are beyond the universe of modern physics. Collectively known as the Veda Shastra, this treasure-house of knowledge consists of four principal and six auxiliary texts. These comprise an effective tool for exploring the fundamental mysteries of our universe. Using rigorous methods of examination and evaluation, the Vedas provide us with answers to such questions as: how did the cosmos originate and what is its future? Of what is it made? Who is the ‘I’, the individual self, and what is its place in the universe?
     
  2. The Cosmic Matrix: In the light of the Vedas

    The Cosmic Matrix introduces its readers to the corpus of texts known as the four Vedas and their auxiliary branches. It also explains veda tattwa, the phenomenon which pervades nature. The difference between the books of the Vedas and the phenomenon explained by these texts is crucial to an understanding of the formulations recorded by the seer-scientists in the texts. This work is not a commentary on these ancient texts, which have been gathered together in the four Vedas of Rik Veda, Yajur Veda, Sama Veda and Atharva Veda. Rather, it is an effort to understand and explain - for the first time in English, the dominant language of modern times - the forgotten insights of this ancient wealth of knowledge.
     
  3. The Realm of Supraphysics: Mind, Matter, Energy

    The Realm of Supraphysics  attempts to capture an extremely large conceptual territory in which a wide array of forces operate and interact, giving birth to the individuals that comprise the cosmos and to the numerous universes of which our world is a small part. This work does not cover the extensive and varied realm of supraphysics in full, because it is simply too vast to be grasped in a single volume. However, it does open a window onto an enchanting realm of unmanifest factors, forces and processes and their manifest functions and operations.
     
  4. The Ultimate Dialogue: Fusion of Knowledge, Intelligence and Action

    The Ultimate Dialogue  elucidates the fundamental concepts of Brahma and karma, which have been expounded in the Geeta. Brahma is that fundamental tattwa from which this entire universe evolves. This work, like previous works by the author, reflects the scholarship and insights of Pandit Madhusudan Ojha and his disciple, Pandit Motilal Shastri, the author’s guru. The author has also drawn upon the wisdom and scholarship of several notable scholars in his endeavour to communicate the subtle concepts and messages contained within the dialogue between Krishna and Arjuna. 
     
  5. The Whole Being : A Journey towards harmony and happiness

    This is the fifth in a series authored by R K Mishra that brings to light the practical wisdom enshrined in India's most ancient texts, the Vedas. The author also drew on the wisdom of 'modern science' for this work, notably the scientific understandings of a few visionaries which are of particular relevance to this book. This fifth and final volume was intended to be the synthesis of the works preceding it. Its eminently practical purpose was to draw on the various facets explored in the previous volumes in order to demonstrate how Vedic understandings can assist today's troubled world.