Our endeavour is to present various publications related to Vedic Studies, especially those which are authored by our three Gurus.
Some of these are in the form of independent publications. Others are scanned copies of various works of Pandit Madhusudan Ojha, Pandit Motilal Shastri and Rishi Kumar Mishra.
Most of the publications are now online. Rest will also be available for download soon.
We welcome your comments and suggestions. Please mail us at

Rishi Kumar Mishra

The Whole Being : A Journey towards harmony and happiness

This is the fifth in a series authored by R K Mishra that brings to light the practical wisdom enshrined in India's most ancient texts, the Vedas. The author also drew on the wisdom of 'modern science' for this work, notably the scientific understandings of a few visionaries which are of particular relevance to this book. This fifth and final volume was intended to be the synthesis of the works preceding it.

The Ultimate Dialogue: Fusion of Knowledge, Intelligence and Action

The Ultimate Dialogue  elucidates the fundamental concepts of Brahma and karma, which have been expounded in the Geeta. Brahma is that fundamental tattwa from which this entire universe evolves. This work, like previous works by the author, reflects the scholarship and insights of Pandit Madhusudan Ojha and his disciple, Pandit Motilal Shastri, the author’s guru. The author has also drawn upon the wisdom and scholarship of several notable scholars in his endeavour to communicate the subtle concepts and messages contained within the dialogue between Krishna and Arjuna. 

The Realm of Supraphysics: Mind, Matter, Energy

The Realm of Supraphysics  attempts to capture an extremely large conceptual territory in which a wide array of forces operate and interact, giving birth to the individuals that comprise the cosmos and to the numerous universes of which our world is a small part. This work does not cover the extensive and varied realm of supraphysics in full, because it is simply too vast to be grasped in a single volume. However, it does open a window onto an enchanting realm of unmanifest factors, forces and processes and their manifest functions and operations.


The Cosmic Matrix: In the light of the Vedas

The Cosmic Matrix introduces its readers to the corpus of texts known as the four Vedas and their auxiliary branches. It also explains veda tattwa, the phenomenon which pervades nature. The difference between the books of the Vedas and the phenomenon explained by these texts is crucial to an understanding of the formulations recorded by the seer-scientists in the texts. This work is not a commentary on these ancient texts, which have been gathered together in the four Vedas of Rik Veda, Yajur Veda, Sama Veda and Atharva Veda.

Before the Beginning and after the End: Beyond the Universe of Physics

About the book  (Download e-copy)

BEFORE THE BEGINNING AND AFTER THE END is a product of dedicated and prolonged research by the author into the ancient insights of India’s seer-scientists. It attempts to bring to light their wisdom as encapsulated in the Vedas. As the title suggests, its contents discuss forces and factors that are beyond the universe of modern physics.

Pandit Motilal Shastri

वैदिक विज्ञानोन्मेश (पंडित मोतीलाल शास्त्रीजी के व्याख्यानों - आलेखों का संग्रह (Essays and Commentaries of Pandit Motilal Shastri)

वैदिक विज्ञानोन्मेश (पंडित मोतीलाल शास्त्रीजी के व्याख्यानों - आलेखों का संग्रह (Essays and Commentaries of Pandit Motilal Shastri)

विज्ञानचित्रावली (Vijnanachitravali part two)

विज्ञानचित्रावली द्वितीयभाग में शतपथब्राह्मण, गीताविज्ञानभाष्यभूमिका, ईशोपनिषत्, छान्दोग्योपनिषद्, श्राद्धविज्ञान, संस्कृत एवं सभ्यता नामक ग्रन्थ में प्रयुक्त चित्रों का संग्रह है। इसमें अच्छे- अच्छे चित्र बने हुए हैं। जिसमें यजमानपात्री, पत्नीपात्री, इडापात्री, ब्रह्मचमसः, प्राशित्रहरणम्, अन्तर्धानकटम् अदि हैं। प्रत्येक चित्र के नीचे उसका हिन्दी में अर्थ  और उसकी उपयोगिता का वर्णन है।

सत्तानिरपेक्ष ‘संस्कृति’ शब्द एवं सत्तासापेक्ष सभ्यता शब्द का चिरन्तन इतिवृत्त तथा भारतीय सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा

पण्डित मोतीलाल शास्त्री द्वार लिखित इस ग्रन्थ में भारतीयों की दृष्टि से इसका वर्ण किया है। स्वयं शास्त्री जी ने लिखा है कि रामधारी सिंह दिनकर के ‘ संस्कृति के चार’ अध्याय को पढकर उन्हें ऐसा लगा कि यह दिनकर जी का विचार तो पश्चिम के देशों से प्रभावित है। इसका भारतीय क्या स्वरूप हो सकता है । इसका प्रयास शास्त्री जी ने एक हजार पृष्ठों में यहाँ किया है। उन्हों ने यजुर्वेद के एक मन्त्र ‘ सा संस्कृतिः प्रथमा विश्ववारा’ को आधर बना कर व्याख्या करने का प्रयास किया है। उन्हों ने तात्कालिक राजनीति को भी दृष्टि में रख कर नेहरू आदि के विचारों का उल्लेख किया है। यह ग्रन्थ अत्यन्त ही उपयोगी एवं पढने योग्य

भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता (Bharatiya Hindu Manav aur Uski Bhavukta)

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने ‘भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता’ प्रथमखण्ड में दो स्तम्भ हैं- असदाख्यानस्वरूपमीमांसा और विश्वस्वरूपमीमांसा। यह ग्रन्थ भी हजार पृष्ठों में शास्त्रीजी ने लिखा है। इसकी भूमिका विख्यात इतिहासविद् डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखी है। असदाख्यानस्वरूपमीमांसा २६ शीर्षकों को एवं विश्वस्वरूपमीमांसा में २८९ विषयों को समाहित किया गया है। अनेक गम्भीर विषयों को उन्हों ने स्पष्ट किया है। प्राय: इनके द्वारा व्याख्यायित शब्दों का वर्णन किसी अन्य आचार्यों ने नहीं किया है। पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने अपने युग के अनुरूप सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया

ऐतिहासिकोऽध्यायः (Aithihasikoadhyaya)

ऐतिहासिकोऽध्याय भी गीताविज्ञानभाष्य का ही अंश है। इस लघुग्रन्थ में मूलरूप से कुरुक्षेत्र शब्द को आधार मान कर कौरव-पाण्डव के युद्ध का वर्णन है। विशेषरूप से इस ग्रन्थ में आधिदैविक कुरुक्षेत्र, स्वर्गीय कुरुक्षेत्र और भारतवर्षीय कुरुक्षेत्र का वर्णन किया गया है।

आधिदैविक कुरुक्षेत्र- सूर्य को केन्द्र में रख कर इसके चारों ओर क्रान्तिवृत्त के आधार पर भूपिण्ड घूमता है। क्रान्तिवृत्तावच्छिन्न सौरमण्डल ही कुरुक्षेत्र है।

हिंदी गीता विज्ञानं भाष्य (Hindi Gita Vigyan Bhashya Bhumika)

हिंदी गीता विज्ञानं भाष्य भूमिका द्वितीय खंड `खा` विभाग   (Hindi Gita Vigyan Bhashya Bhumika-second part-kha--download 

हिंदी गीता विज्ञानं भाष्य भूमिका द्वितीय खंड `ग` विभाग  (Hindi Gita Vigyan Bhashya Bhumika-second part-ga)--download 

प्रतिष्ठाकृष्ण रहस्य (Prathishta-krishna rahasya)

पण्डित मधुसूदन ओझा ने ब्रह्मसिद्धान्त नामक अपने ग्रन्थ में प्रतिष्ठाधिकरण में ‘प्रतिष्ठा’ पद को एक विशिष्ट पारिभाषिक शव्द के रूप में प्रस्तुत किया है। इनके प्रधान शिष्य एवं वैदिकविज्ञान के हिन्दी विज्ञानभाष्यकार पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने गीता की व्याख्या के क्रम में प्रतिष्ठाकृष्ण रहस्य को स्पष्ट किया है। प्रतिष्ठा पद का प्रयोग बृहदारण्यक उपनिषद् एवं केनोपनिषद् में मिलता है। प्रतिष्ठा का अर्थ है कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं उसमें जो स्थिरता है, वही प्रतिष्ठा है और वह ब्रह्म है। शास्त्री जी ने ब्रह्म को प्रतिष्ठा का पर्याय मान कर विविध आयामों में इसकी व्याख्या इस पुस्तक में प्रस्तुत किय

ज्योतिकृष्णरहस्य (Jyotikrishna-rahasya-fourth part)

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने कृष्ण के अनेक स्वरूपों के आधार पर कृष्णों के विविध नाम से धारावाहिक रूप में लघुग्रन्थों का प्रणयन विषय को स्पष्टता के लिये किया है। प्रतिष्ठाकृष्णरहस्य के बाद ज्योतिकृष्णरहस्य का क्रम आता है। प्रायः लोक में जिस प्रकाश के दर्शन हम लोग करते हैं उस प्रकाश का जो कारण है। वह ज्योतिश्वरूप कृष्ण है। इस क्रम में शास्त्री जी ने मुण्डकोपनिषद् के मन्त्र को उद्धृत किया है।

                                                    न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।