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Our endeavour is to present various publications related to Vedic Studies, especially those which are authored by our three Gurus.

Some of these are in the form of independent publications. Others are scanned copies of various works of Pandit Madhusudan Ojha, Pandit Motilal Shastri and Rishi Kumar Mishra.

Most of the publications are now online. Rest will also be available for download soon.

We welcome your comments and suggestions. Please mail us at ssst.2015@gmail.com

 

 

Books authored by Pandit Madhusudan Ojha
 

  1. आधिदैविकाध्याय  (Aadhidaivikadyaaya)new

    यह ग्रन्थ देवताधिकार, पितृनिरूपणाधिकार, ऋषिसामान्याधिकार, सृष्टिप्रवर्तकाधिकार, वेदर्षिरहस्याधिकार, वेदप्रवर्तकऋष्यधिकार, आयुर्दायचिन्ताधिकार, व्यक्तिबहुत्वाधिकार एवं गोत्रप्रवर्तकाधिकार नामक कुल नौ अधिकारों में विभक्त है ।  इस ग्रन्थ के माध्यम से वेदों में प्रयुक्त देवता, पितृ, ऋषि आदि शब्दों के वेदसम्मत वास्तविक रहस्य को बतलाने का प्रयत्न किया गया है जो रहस्य सहस्राब्दियों से वैदिक परिभाषा ग्रंथो के नष्ट हो जाने से लुप्तप्राय हो गया था ।

    In this work, Pandit Madhusudan Ojha has unraveled the true meaning of terms like `devata` (deity), `pitr` (paternal ancestors) and `rishi` (sage) etc, as given in the Vedas. These Vedic definitions had been lost for several generations before Pandit Ojha decided to study the Vedas.     [Download]
  2. आशौचपञ्जिका  (Aashauchapanchika) new

    इस ग्रन्थ में आधुनिक तर्कप्रधान जनता के लिये आशौच का स्वरुप , आशौच का कारण , आशौच का प्रभाव, आदि वस्तुओंका का विज्ञानं भी प्रमाण  व युक्ति के साथ बतलाया गया है 1 यह ग्रन्थ आशौचविषय का अपूर्व ग्रन्थ है 1  [Download]
  3. देवासुरख्याति (Devasurakhyati

    ओझाजी द्वारा लिखित पंचविध ग्रन्थविभागों में से पुराणसमीक्षा नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत इतिहासविषयक पाँच ख्यातिपरक ग्रन्थों का प्रणयन किया गया जिसमें यह देवासुरख्याति भी एक है । इस ग्रन्थ में वेदसृष्टि, धर्मसृष्टि, प्रजासृष्टि, त्रैलोक्यनिरूपण, लोकसृष्टि एवं चातुर्वर्ण्य विषयक विवेचन किया गया है ।    -{download}
     
  4. देवतानिवित् (Devatanivit) new

    यह ओझाजी के यज्ञविज्ञान नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत लिखा गया एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में देवता सम्बन्धी एक सौ विषयों की परिभाषाएँ पृथक्-पृथक् निर्दिष्ट हैं ।   - {download}
  5. इन्द्रविजय (Indravijayah)

    यह ओझाजी के ब्रह्मविज्ञान नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत आने वाला ग्रन्थरत्न है जो भारतवर्ष के प्रागैतिहासिक स्वरूप और स्थिति के अध्ययन की दृष्टि से अत्यन्त प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण है । यह संस्कृत के विद्वानों, इतिहासज्ञों एवं भूगोलवेत्ताओं के लिए अत्यन्त पठनीय ग्रन्थ है । यह ग्रन्थ भारत परिचय, आर्यदासीय, विज्ञानभवन, दस्युनिग्रह एवं इन्द्रविजयाभिनन्दन नामक पाँच परिच्छेदों में विभक्त है जिसमें प्राचीन बृहत्तर भारत की सम्पूर्ण ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्यों का सप्रमाण रेखांकन वैदिक प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है ।  {download}
     
  6. माधवख्याति (Madhavkhyaati)   

    पुराणसमीक्षा ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत निर्मित इस माधवख्याति नामक ग्रन्थ में यदुवंश का समग्र विवरण प्रस्तुत किया गया है । ग्रन्थ के अन्त में दी गयी अनुक्रमणिका में यदुवंशीय राजाओं की सूची भी दी गयी है ।--{download}
     
  7. पञ्चभूतसमीक्षा (Panchabhootasameekshanew

    पृथिवी, जल, तेज, वायु एवं आकाश इन पंचमहाभूतों को भारतीय पाँच तत्त्व मानते हैं परन्तु ये मौलिक तत्त्व हैं या नहीं इसको लेकर १९३५ ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एक पञ्चमहाभूत परिषद् बुलायी गयी थी, जहाँ इसके तत्त्वविषयक पक्ष एवं विपक्ष की बात को सुनकर ओझाजी द्वारा अपना विचार प्रकट किया गया था, यह उसी पञ्चमहाभूत विषयक विचारों का संकलन है । वहाँ ओझाजी द्वारा पञ्चमहाभूतों के तत्त्वविषयक पक्ष में सुदृढ तर्क प्रस्तुत किया गया जिससे उस परिषद् में पञ्चमहाभूत सिद्धान्त को सुस्थिर मान लिया गया । --{download}
     
  8. पुराणनिर्माणाधिकरण (Puraananirmaanadhikarannew

    आज जो पुराण-ग्रन्थ उपलब्ध हैं उनका विकास किस क्रम से हुआ, इनका मूल कहाँ से है, इनके प्रथम वक्ता कौन हैं, वर्तमान पुराण ग्रन्थों के कर्ता कौन हैं, आदि विषयों को लेकर ओझाजी द्वारा इस लघु ग्रन्थ का प्रणयन किया गया है । इस लघु ग्रन्थ में उक्त विषयों का बहुत स्पष्ट और विस्तृत विवेचन पुराणों के अधार पर ही किया गया है ।   --{download}

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  9. सन्ध्योपासनरहस्य  (Sandhyapaasanaarahasyam)

    यह ग्रन्थ नित्य कर्म के रूप में प्रसिद्ध सन्ध्योपासना के रहस्य का उद्घाटक है । इस ग्रन्थ में सन्ध्योपासना क्यों करनी चाहिये? सन्ध्योपासना के उपकरणभूत आचमन, अर्घ्यप्रदान, सूर्योपस्थापन, प्राणायाम, अघमर्षण आचमन आदि क्यों किये जाते हैं तथा इनसे किन आध्यात्मिक तत्त्वों का पोषण होता है? सावित्री को गायत्री क्यों कहा जाता है? सन्ध्योपासना सन्ध्याकाल में ही क्यों किया जाता है? आदि विषयों का मार्मिक व वैज्ञानिक विश्लेषण श्रुतिमूलक उपपत्तियों के आधार पर किया गया है ।                                                                                                                                                   ---{download}
     
  10. स्वर्गसन्देश   (Svargasandesha )  new

    स्वर्ग को आधार बनाकर ओझा जी द्वारा लिखा गया यह एक लघु परन्तु सारगर्भित ग्रन्थ है ।  इसमें भौमस्वर्ग, दिव्यस्वर्ग, पितृस्वर्ग और देवस्वर्ग नामक स्वर्ग के चार भेदों का प्रतिपादन अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के साथ किया गया है ।--{download}
     
  11. वैज्ञानिकोपाख्यान एवं वैदिकोपाख्यान  (Vaigyanikopaakhyaana  and  Vaidikopaakhyaana )new
    इस ग्नन्थ में विविध उपाख्यानों का संकलन किया गया है । यह ग्रन्थ वैज्ञानिकोपाख्यान एवं वैदिकोपाख्यान नामक दो प्रमुख उपाख्यानों में विभाजित है जिनके अन्तर्गत अनेक उपाख्यान सम्मिलित हैं । वैज्ञानिकोपाख्यान के अन्तर्गत प्रजापति कश्यप की पत्नी कद्रू एवं विनता से उत्पन्न पुत्रों के उपाख्यानों यथा सौपर्णोपाख्यान, अनन्तोपाख्यान, हयग्रीवोपाख्यान आदि पौराणिक उपाख्यानों का जबकि वैदिकोपाख्यान के अन्तर्गत असुरघ्नी सपत्नघ्नी वाक्, अग्निदूतोपाख्यान, आप्त्योपाख्यान, देवयजनोपाख्यान आदि वैदिक उपाख्यानों का संकलन है ।   -- (download)
  12. ब्रह्मसिद्धान्त हिन्दी अनुवाद (Brahmasiddhanta with Hindi translation )
  13. ब्रह्मसिद्धान्त संस्कृत टीका (Brahmasiddhanta with Sanskrit Commentary )new

    सृष्टिविषयक प्रचलित दस वादों को निरस्त कर ब्रह्मा द्वारा अग्नीषोमात्मक ब्रह्मवाद की स्थापना, ब्रह्म का व्यावहारिक रूप, माया का व्यावहारिक रूप, नित्य ब्रह्म से साथ माया बल द्वारा होने वाले विभिन्न सम्बन्ध और उन सम्बन्धों से होने वाला जगत् के पदार्थों के निर्माण विषयक विवेचन इस ग्रन्थ का विषय-वस्तु है जो अन्यत्र इतनी स्पष्टता से प्राप्त नहीं होता है । इस ग्रन्थ पर गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी द्वारा ‘सिद्धान्तप्रकाशिका’ नामक संस्कृत टीका एवं देवीदत्त चतुर्वेदी द्वारा टीका सहित सम्पूर्ण ग्रन्थ का  हिन्दी अनुवाद किया गया है ।

    (Download ब्रह्मसिद्धान्त संस्कृत टीका)
    (Download ब्रह्मसिद्धान्त हिन्दी)
  14. ब्रह्मविनय (Brahmavinaya)new

    पं. मधुसूदन ओझाजी का ब्रह्मविषयक सिद्धान्त चतुष्पाद् ब्रह्म की सत्ता पर निर्भर है । ये चतुष्पाद हैं- परात्पर, अव्यय, अक्षर एवं क्षर । दार्शनिक दृष्टि से परात्पर के भी उपर एक पाँचवा निर्विशेष को माना गया है । ओझाजी ने इन्हीं पाँच की व्याख्या हेतु इस ग्रन्थ की रचना की है । सम्प्रति उपलब्ध संस्करण में निर्विशेषानुवाक्, परात्परानुवाक्, अव्ययानुवाक् एवं अक्षरानुवाक् नामक कुल चार प्रकरण ही प्राप्त होते हैं ।  (Download)
  15. ब्रह्मचतुष्पदी ( Brahmachatushpadi) new

    उपनिषदों में आख्यायिका एवं उपदेश के रूप में चतुष्पाद् ब्रह्म का निरूपण है, उसी के आधार पर ब्रह्म के चार पादों की कल्पना कर इस ब्रह्मचतुष्पदी की रचना की गयी । यहाँ निर्गुण, निर्विशेष रसतत्त्व से प्रारम्भ कर संसार की वर्तमान स्थिति तक चार प्रकार की अवस्था मानी गयी है । गूढात्मा, शिपिविष्ट, अधियज्ञ एवं विराट् यही चार अवस्थाएँ एक-एक पाद मानी गयी हैं ।
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  16. ब्रह्मसमन्वय (Brahmasamanvya)new

    सृष्टिविषयक पूर्वपक्ष के रूप में जो दस वाद प्रचलित थे उनकी व्याख्या करते हुए सिद्धान्तवाद की व्याख्या अनेक ग्रन्थों में ओझाजी द्वारा की गयी है । उसी सिद्धान्तवाद का निरूपण प्रस्तुत ग्रन्थ में हुआ है । इसमें सभी सिद्धान्तों का स्पष्टतया प्रतिपादन किया गया है । इस ग्रन्थ का नाम ब्रह्मसमन्वय इसलिए है कि जो कुछ भी जगत् में दिखलायी देता है, उन सब में ब्रह्म का अन्वय है अर्थात् ब्रह्म सबमें अन्तःप्रविष्ट है, इसी विज्ञान का विशद विवेचन प्रस्तुत ग्रन्थ में हुआ है । (Download)
     
  17. छन्दोभ्यस्ता (Chhandobhyasta ) new

    यह यज्ञविज्ञान का ग्रन्थ है जिसमें यज्ञीय विषयों का सम्यक् विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थ की रचना वैदिक भाषा में की गयी है । यह ग्रन्थ हविर्यज्ञ, महायज्ञ, अतियज्ञ, शिरोयज्ञ एवं यज्ञपरिशिष्ट नामक पाँच प्रकरणों में विभक्त है । (Download)
  18. कादम्बिनी (Kadambini)  new

    यह वृष्टिविज्ञान का एक अन्यतम ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में कुल पाँच अध्याय हैं जिनमें मेघ का निर्माण, ग्रह, नक्षत्र, तिथि एवं विविध निमित्तों के द्वारा वृष्टि या अनावृष्टि आदि के ज्ञान का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत किया गया है । (Download)

     
  19. महर्षिकुलवैभवम् (Maharshikulavaibhavam)

    इस ग्रन्थ के शीर्षक ‘महर्षिकुलवैभवम्’ से ही स्पष्ट है कि इसमें महर्षियों के कुल का वैभव वर्णित है । इस ग्रन्थ में ऋषि शब्द की असल्लक्षणा, रोचनालक्षणा, द्रष्टृलक्षणा एवं वक्तृलक्षणा रूप चार प्रकार की प्रवृत्तियाँ उल्लिखित हैं जिनमें ऋषियों के ऐतिहासिक वर्णन के साथ ही उनका वैज्ञानिक विवेचन स्पष्टतया प्रतिपादित है । (Download)
     
  20. मन्वन्तरनिर्धार (Manvantaranirdhara)

    यह भारतीय काल विवेचन का एक अद्भुत ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में मन्वन्तर निरूपण के अन्तर्गत  युग, दिव्ययुग, नित्यकल्प, सप्तकल्प एवं त्रिंशत्कल्प का निरूपण किया गया है । (Download)
     
  21. पथ्यास्वस्ति (Pathyaasvasti)

    यह ग्रन्थ ओझाजी के वेदाङ्गसमीक्षा विभागान्तर्गत वाक्पदिका नामक ग्रन्थ के प्रकरणभूत ‘वर्णसमीक्षा’ का एक अवान्तर प्रकरण है । ब्राह्मण ग्रन्थों में वाक् को पथ्यास्वस्ति के अभिधान से अभिहित किया गया है जो स्वरव्यञ्जनादि विभाग से विभक्त वर्णरूपा है । इस ग्रन्थ में उन्हीं वर्णों की विभिन्न रूप से समीक्षा की गयी है । यहाँ वर्णमाला का विवेचन विभिन्न प्रकार की मातृकाओं के रूप में किया गया है । (Download)
     
  22. पितृसमीक्षा (Pitrsamiksha) new

    सामान्यतया हम अपने पिता, पितामह या अधिक से अधिक प्रपितामह का नाम ही जानते हैं, हमारी पितृ-परम्परा में हुए सब पुरुषों का नाम हमें ज्ञात नहीं होता है । यदि हमें अपने एवं हमारे पितरों के स्वरूप को जानना है तो मूल सत्ता के स्वरूप को जानना पड़ेगा तथा ऋषि एवं मनु के स्वरूप को भी जानना पड़ेगा । इस विषय का वेद में विस्तृत प्रतिपादन किया गया है । इन तथ्यों की पूर्ण जानकारी हेतु सम्पूर्ण वैदिक साहित्य का आजीवन अनुशीलन कर ओझाजी द्वारा ‘पितृसमीक्षा’ ग्रन्थ की रचना की गयी है ।  (Download)
  23. रजोवाद  (Rajovaad)

    वेदप्रतिपादित सृष्टिविषयक द्वादश वादों को आधार बनाकर ओझाजी द्वारा प्रत्येक वादों पर एक-एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की गयी । उसी क्रम में रजोवाद को लेकर यह ग्रन्थ लिखा गया है । इस ग्रन्थ में सृष्टिविषयक रजोवाद सिद्धान्त के अन्तर्गत मुख्यतया विश्वसृट्सर्ग तथा भूतसर्ग के बारे में बतलाया गया है ।  (Download)
     
  24. संशयतदुच्छेदवाद, काण्ड१-३ (Samshayataduchchhedavad  Part 1, 2, 3)new

    यह ब्रह्मविज्ञान के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले संशयों का उच्छेद करने वाला ग्रन्थ है । सृष्टिविषयक प्रचलित द्वादशवादों में संशयवाद को आधार बनाकर ओझाजी द्वारा इस ग्रन्थ की रचना की गयी । इस ग्रन्थ में सृष्टि के विषय में जितने मतभेद हैं, उन मतभेदों का निरूपण कर उनका निराकरण किया गया है । परमेश्वर, ईश्वर, जीव, आत्मा, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, उपासना, मोक्ष आदि अनेक दुरूह विषयों के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले प्रश्नों का निरूपण करते हुए उनका वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तर प्रस्तुत किया गया है । यह ग्रन्थ तीन काण्डों में विभाजित है,जो विज्ञानोपक्रमाधिकार, संशयाधिकार एवं संशयोच्छेदाधिकार के नाम से अभिहित किया गया है ।   (Download)
  25. शारीरकविमर्श ( Sharirakavimarsha) new

    यह शारीरक दर्शन पर लिखा गया ओझा जी का एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है जो स्वतन्त्र रूप से शारीरकदर्शन के विषयों पर आलोचनात्मक प्रकाश डालते हुए उनका वैज्ञानिक ढंग से सारतत्त्व प्रस्तुत करता है । सोलह प्रकरणों में विभाजित यह ‘शारीरकविमर्श’ सभी शास्त्रों का निचोड़ और वेद के रहस्य का प्रशस्त मार्गदर्शक है । इस ग्रन्थ में ब्रह्म, वेद, वेदाध्ययन, विज्ञानवेद, शब्दमयवेद, वेदप्रादुर्भाव, उपनिषद् पद का तात्पर्य, दर्शनशास्त्र, वेदान्तसूत्र, गीताशास्त्रनिरुक्ति, आत्मब्रह्ममीमांसा, ईश्वरात्मनिरुक्ति आदि विषयों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है ।  (Download)
  26. शारीरकविज्ञान भाग-1 एवं भाग 2 (Sharirakavigyana Part 1 & part 2)

    वेदान्तसूत्रों पर आचार्य शंकर के पश्चात् लिखे गये भाष्यों में शारीरकविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है । यद्यपि इस भाष्यग्रन्थ पर आचार्य शंकर के भाष्य का प्रभाव तो स्वाभाविक ही है परन्तु इस भाष्य के अनेक स्थलों के विवेचन से यह ज्ञात होता है कि इस ग्रन्थ के बिना वेदान्त सूत्रों के अनेक स्थल अस्पष्ट रह जाते या उनके विपरीत अर्थ ग्रहण कर लिये जाते । इन्हीं दृष्टिभेद बिन्दुओं को लेकर इस भाष्यग्रन्थ की रचना ओझाजी ने की है । यह भाष्य ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है । 

    Part 1--Download
    Part 2--Download

     
  27. वर्णसमीक्षा (Varnasamiksha) new

    यह ओझाजी की वर्णमाला विषयक महत्त्वपूर्ण कृति है । इसमें वर्णों का विवेचन आर्यमातृका एवं अनार्यमातृकाओं के रूप में किया गया है । आर्यमातृका के चार भेदों- ब्रह्ममातृका, अक्षमातृका, सिद्धमातृका एवं भूतमातृका का तथा अनार्यमातृका के अनेक भेदों में यवनमातृका का विवेचन करते हुए ओझाजी ने स्वर, व्यञ्जन, समानाक्षर, सन्ध्यक्षर, अयोगवाह, विवृति, स्वरभक्ति, यम, अनुस्वार, नाद, अन्तःस्थ, रङ्ग एवं उष्मा वर्णों का साङ्गोपाङ्ग विवरण प्रस्तुत किया है । (Download)
  28. यज्ञसरस्वती (Yajnasaraswati )

    यह यज्ञविज्ञान नामक ग्रन्थविभाग के अन्तर्गत लिखा गया याज्ञिक विषयों का प्रतिपादक ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ के सोमकाण्ड एवं अग्निचयनकाण्ड नामक दो खण्ड हैं । सोमकाण्ड के अन्तर्गत जहाँ इष्टि से लेकर राजसूययज्ञ तक के यज्ञों की पद्धति सरल रीति से बतलायी गयी है वहीं अग्निचयनकाण्ड में चयनविद्या एवं उसकी पद्धति तथा चितियों का निर्माण सादा एवं रंगीन नक्शों के साथ बहुत ही सुन्दरता से प्रतिपादित किया गया है । उक्त दो काण्डों के साथ खिलकाण्ड एवं ऊपरिकाण्ड नामक दो अन्य काण्डों की सूचना सूची में दी गयी है लेकिन उनका विवरण सम्प्रति उपलब्ध नहीं है ।  (Download)
     
  29. वस्तुसमीक्षा (Vastusamiksha)new

    वस्तुसमीक्षा में वस्तु का अर्थ पदार्थ एवं समीक्षा का अर्थ विचार है। इस ग्रन्थ में वैदिकविज्ञान के अनुसार पदार्थ के स्वरूप पर विचार किया गया है। इस में मुख्यरूप से चार विषयों को समाहित किया गया है-पदार्थविज्ञान, रसायनविज्ञान, दृग्विज्ञान एवं  अंशुविज्ञान । पण्डित ओझा जी ने इस ग्रन्थ में आधुनिक वैज्ञानिक तत्त्वों का  वैदिकविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने का प्रयास किया है। अग्नि के स्वरूप प्रतिपादन के क्रम में ताप, आलोक और विद्युत् का विश्लेषण किया गया है। ताप के ही विविध आयामों को यहाँ सम्पूर्ण ग्रन्थों में  स्पष्ट किया गया है। प्रतीत होता है कि पण्डित ओझा जी ने आधिनुक इनर्जी  (energy) के अर्थ में ताप के महत्त्व को उद्घाटित किया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ वर्तमान समय में इसलिए उपयोगी है क्योंकि सभी जगह विज्ञान की ही चर्चा चल रही है। संस्कृत में विज्ञान का जो स्रोत है, वह यहाँ देखने को मिलता है।  (Download)
  30. अपरावाद  (Aparavada)new

    अपरवाद सृष्टिविषयक चतुर्थ मत है, जिसपर ओझा जी का यह स्वतन्त्र ग्रन्थ है । प्रस्तुत ग्रन्थ में पर का अर्थ आत्मा और अपर का अर्थ प्रकृति है । भौतिक जगत् प्राकृतिक है इसका उद्भव प्रकृति से होनी चाहिए । प्रकृति का ही दूसरा नाम स्वभाव भी है । इसलिए प्रकृति या स्वभाव को सृष्टि का कारण मानने के कारण सृष्टिविषयक यह मत  अपरवाद कहलाता है ।  (Download)
  31. जगद्गुरुवैभवम् (Jagadguruvaibhavam)new

    यह ब्रह्मविज्ञान के अन्तर्गत दिव्यविभूति नामकग्रन्थविभाग का पहला ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ में ब्रह्मा विषयक विविध प्रश्नों का सयुक्तिक समाधान किया गया है, यथा-ब्रह्मा कोई ऐतिहासिक व्यक्ति थे? अथवा इनका कोई वैज्ञानिक स्वरूप भी है? ऐतिहासिक ब्रह्मा कौन थे, वे कब और कहाँ हुए? वैज्ञानिक ब्रह्मा का क्या स्वरूप है? दोनों ब्रह्माओं का विश्वकर्तृत्व और विश्वगोप्तृत्व किस प्रकार है? वैज्ञानिक व ऐतिहासिक अथवा कौन हैं? उनका स्वरूप क्या है? आदि विषयों का निरूपण प्रस्तुत ग्रन्थ में किया गया है । (Download)
  32. वेदधर्मव्याख्यानम् (Vedadharmavyakhyanam)new

    इस ग्रन्थ में वैदिक धर्मविषयक उन व्याख्यानों का संकलन है जिसे ओझा जी ने लन्दन तथा अन्य स्थानों पर विद्वज्जन के समक्ष वेद, धर्म और देवभाषा के सम्बन्ध में प्रस्तुत किया था ।   (Download)

  33. छन्दःसमीक्षा (Chhandhasamiksha) new

    छन्दःशास्त्र के विश्लेषण हेतु ओझा जी ने इस ग्रन्थ की रचना की है । इस ग्रन्थ में छन्दस्तत्त्व की समीक्षा की गयी है जिसमें पद्यच्छन्दोवेदगत शिक्षा, गणित, निरुक्ति, व्याकरण व कल्पभेद से पाँच अङ्ग प्रतिपादित हैं । अर्थात् इस पद्यच्छन्दोवेद में छन्दःशिक्षा, छन्दोगणित, छन्दोनिरुक्ति, छन्दोव्याकरण एवं छन्दोकल्प इन पाँच अङ्गों का निरूपण किया गया है ।
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  34. व्याकरणविनोदा Vyakaranavinodah whats new

    पण्डित मधुसूदन ओझा के वेदाङ्गसमीक्षा खण्ड में वाक्पदिका नामक विभाग में ‘व्याकरणविनोद’ ग्रन्थ का स्थान है। व्याकरण भाषा में प्रयोग होने वाले शब्दों को सिद्ध करने का कार्य करता है। विनोद पद का अर्थ अनायास या सहज है। जो ग्रन्थ भाषासम्बन्धी विषय को सरलता से पाठक को समझा दे उस ग्रन्थ को व्याकरणविनोद कहते हैं। इस ग्रन्थ में छह प्रकरण हैं- १. समासपरिच्छेद २. तद्धितपरिच्छेद ३. नामधातुपरिच्छेद ४. प्रक्रियापरिच्छेद ५. कृदन्तपरिच्छेद और ६. अव्ययपरिच्छेद ।समासपरिच्छेद में समास को बताया गया है। समास दो या इससे अधिक शब्दों को जोड़ने को समास कहते हैं। समास के ये भेद हैं-द्विरुक्तसमास, द्वन्द्वसमास, अव्ययीभावसमास, तत्पुरुषसमास, बहुव्रीहि हैं।

    जो प्रत्यय शब्द से होते हैं उसे तद्धित प्रत्यय कहते हैं। जैसे- समाज शब्द से सामाजिक, सुन्दर शब्द से सुन्दरता, शिक्षा शब्द से शैक्षिक आदि अनेक शब्द बनते हैं।नाम अर्थात् संज्ञाशब्द से धातु बनाने की प्रक्रिया का नामधातु है । जैसे कारित का अर्थ प्रेरणा है। णिच् प्रत्यय से यह शब्द बनता है। जैसे राम पढ़ता है, शिक्षक के द्वारा राम पढ़ाया जाता है। राम जाता है । मोहन के द्वारा राम को भेजवाया जाता है । यहाँ पढ़ाया और भेजवाया प्रेरणा का ही उदाहरण है।धातु से होने वाले प्रत्यय को कृत् कहते हैं। वह कृत् जिसके अन्त में हो वह कृदन्त कहलाता है। जैसे- पठ् धातु से पाठक, कृ धातु से कारक बना।

    संस्कृत में जिस पद का रूप न चलता हो वह अव्यय है। राम शब्द का कर्ताकारक आदि में रूप चलता है। धातु के भी लट् लकार आदि में रूप चलते हैं । परन्तु यथा, तथा, वा आदि अव्यय का रूप नहीं चलता है।

    इस प्रकार यह व्याकरणविनोद सहजता से पाठक को व्याकरण का निचोड़ समझाने में उपयुक्त है । यह ग्रन्थ छात्र को दृष्टि में रखकर समझाने के लिये पण्डित ओझाजी ने लिखा है। (Download)

  35. धर्मपरीक्षा पञ्जिका (Dharmapariksha panjika) 

    धर्मपरीक्षा में जो धर्म है उसका अर्थ संस्कार है एवं परीक्षा का अर्थ  विचार है। इस प्रकार धर्मपरीक्षा का अर्थ है- संस्कारों का विचार। कापी  को पञ्जिका कहते हैं। सामान्यतया जिसमें हमलोग लिखते हैं उसे संस्कृत में पञ्जिका कहते हैं। इस लघुकाय ग्रन्थ में धर्म के पाँच विषयों को  स्पष्ट किया गया है।  पहला विषय धर्म का मूल  क्या है, इस पर विचार है। पुनः धर्म के फल का प्रतिपादन है। इसी क्रम में फल के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए पण्डित ओझा जी ने कहा है कि- अध्याहार, परिहार और अभ्युन्नति, ये तीन प्रकार के फल हैं। विभक्तिरहस्य और नियामक रहस्य में धर्मों की सूक्ष्माता से विचार है। इस प्रकार यह ग्रन्थ धर्म विषयक विवेचना के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है। (Download)

  36. Vijnanavidyutwhats new

 Books authored by Pandit Motilal Shastri
 

शतपथब्राह्मण प्रथमकाण्ड  (Shatapathabrahmana Part 1)

साधारणतया  लौकिक दृष्टि से ‘यजुर्वेद’ और तत्त्वदृष्टि से ‘यज्जूर्वेद’ है । इस में दो पद हैं-यत् और जूः। जिसका क्रमशः अर्थ  प्राण, वायु,गति और वाक्, आकाश स्थिति है ।

शतपथब्राह्मण में एक सौ अध्याय हैं । इस के कारण इसका नाम शतपथ है। यजुःसंहिता के व्याख्यारूप यजुर्ब्राह्मण है । जिसके शाखा भेद से एक सौ एक विभाग माने गये हैं। इनमें 15 शाखाएँ ‍‘शुक्लयजुर्वेद’ नाम से प्रसिद्ध हैं और 86 शाखाएँ ‘कृष्णयजुर्वेद’ नाम से व्यवहृत होते हैं । सामान्यतया शुक्लयजुर्वेद की ‘माध्यन्दिनशाखा’ और काण्वशाखा ही उपलब्ध होता है । पण्डित मोतीलाल शास्त्री के अनुसार संहितावेद ‘मन्त्रवेद’ और विधि, आरण्यक तथा उपनिषद् के भेद से विभक्त वेदसमष्टि ही ‘ब्राह्मणवेद’ है । शतपथब्राह्मण के 14 काण्डों में 13 काण्ड केवल ‘विधि’ का विश्लेषण करते हैं। 14 वां काण्ड आरण्यक और उपनिषद् इन दोनों का संग्रह है।

माध्यन्दिन और काण्व ये दोनों सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य हैं । इन दोनों शाखाओं का नाम वाजसनेयी है । वाजसनेय याज्ञवल्क्य का ही दूसरा नाम है, क्योंकि सम्पूर्ण शुक्लयजुर्वेद के आचार्य  याज्ञवल्क्य हैं ।

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने शतपथब्राह्मण पर हिन्दी विज्ञानभाष्य की रचना की है। 

नोट-प्रथमकाण्ड का प्रथमखण्ड  Download के लिए दिया गया है 

Shatapathabrahmana Khand 1 Part 3
 

2. केनोपनिषद् (Kenopanishad)

केनोपनिषद् उपनिषदों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है । यह उपनिषत्  सामवेद के तवलकार ब्राह्मण के अन्तर्गत है। तवलकार ब्राह्मण का यह नवम अध्याय है। इस उपनिषद् में सबसे पहले ‌‘केन’ शब्द आया है, इसी से इसका नाम   केनोपनिषद्  है । पण्डित मोतीलाला शास्त्रीजी के अनुसार इस उपनिषत् में प्रधानतया प्रज्ञानात्मा का ही निरूपण हुआ है। (Download)
 

Books authored by Pandit Rishi Kumar Mishra

 

  1. Before the Beginning and After the End: Rediscovering Ancient Insights

    Before the Beginning and after the End is a product of dedicated and prolonged research by the author into the ancient insights of India’s seer-scientists. It attempts to bring to light their wisdom as encapsulated in the Vedas. As the title suggests, its contents discuss forces and factors that are beyond the universe of modern physics. Collectively known as the Veda Shastra, this treasure-house of knowledge consists of four principal and six auxiliary texts. These comprise an effective tool for exploring the fundamental mysteries of our universe. Using rigorous methods of examination and evaluation, the Vedas provide us with answers to such questions as: how did the cosmos originate and what is its future? Of what is it made? Who is the ‘I’, the individual self, and what is its place in the universe?
     
  2. The Cosmic Matrix: In the light of the Vedas

    The Cosmic Matrix introduces its readers to the corpus of texts known as the four Vedas and their auxiliary branches. It also explains veda tattwa, the phenomenon which pervades nature. The difference between the books of the Vedas and the phenomenon explained by these texts is crucial to an understanding of the formulations recorded by the seer-scientists in the texts. This work is not a commentary on these ancient texts, which have been gathered together in the four Vedas of Rik Veda, Yajur Veda, Sama Veda and Atharva Veda. Rather, it is an effort to understand and explain - for the first time in English, the dominant language of modern times - the forgotten insights of this ancient wealth of knowledge.
     
  3. The Realm of Supraphysics: Mind, Matter, Energy

    The Realm of Supraphysics  attempts to capture an extremely large conceptual territory in which a wide array of forces operate and interact, giving birth to the individuals that comprise the cosmos and to the numerous universes of which our world is a small part. This work does not cover the extensive and varied realm of supraphysics in full, because it is simply too vast to be grasped in a single volume. However, it does open a window onto an enchanting realm of unmanifest factors, forces and processes and their manifest functions and operations.
     
  4. The Ultimate Dialogue: Fusion of Knowledge, Intelligence and Action

    The Ultimate Dialogue  elucidates the fundamental concepts of Brahma and karma, which have been expounded in the Geeta. Brahma is that fundamental tattwa from which this entire universe evolves. This work, like previous works by the author, reflects the scholarship and insights of Pandit Madhusudan Ojha and his disciple, Pandit Motilal Shastri, the author’s guru. The author has also drawn upon the wisdom and scholarship of several notable scholars in his endeavour to communicate the subtle concepts and messages contained within the dialogue between Krishna and Arjuna. 
     
  5. The Whole Being : A Journey towards harmony and happiness

    This is the fifth in a series authored by R K Mishra that brings to light the practical wisdom enshrined in India's most ancient texts, the Vedas. The author also drew on the wisdom of 'modern science' for this work, notably the scientific understandings of a few visionaries which are of particular relevance to this book. This fifth and final volume was intended to be the synthesis of the works preceding it. Its eminently practical purpose was to draw on the various facets explored in the previous volumes in order to demonstrate how Vedic understandings can assist today's troubled world.