Vadagrantha

                                                                                                                                                                                                         

वादग्रन्थ

 

दशवादरहस्य

पण्डित मधुसूदन ओझा का दशवादरहस्य उनके द्वारा प्रतिपादित वाद ग्रन्थों का परिचयात्मक ग्रन्थ है। इसमें मुख्यतः सदसद्वाद, रजोवाद, व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद और सिद्धान्तवाद का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। इन वादों पर ओझाजी ने पृथक्-पृथक् ग्रन्थ लिखे हैं। उन गन्थों के साररूप को दशवादरहस्य में प्रस्तुत किया है । इसमें वैदिक पारिभाषिक पद वयुन को स्पष्ट किया गया है। ‘यह वस्तु है’ इस रूप में हमे जो वस्तु का ज्ञान होता है, वह वयुन है। वयुन के दो रूप हैं-वयः और वयोनाध। वस्तु मात्र में जि भार अर्थात् वजन है वह वय है तथा उस वस्तु की जो सीमा है, वह वयोनाध है। ओझाजी के अनुसार भार एवं सीमा दोनों ही वस्तु है। सत्तामात्र ही वयुन है। उन्होंने एक उदाहरण के द्वारा इस बात को स्पष्ट किया है।

शिल्पकार मृत्पिण्ड को लेकर हाथी, अश्व, रथ, गिलास आदि अनेक प्रकार के शिल्प का निर्माण करता है। इन वस्तुओं में मृत्पिण्ड की दृष्टि से भेद नहीं है अपितु (सीमा एवं भार) की भिन्नता है। आकृति-भिन्नता के कारण गज-अश्व आदि की भिन्नता है।

मृत्पिण्डमादाय हि कारुको गजं

हयं रथं कंसमथान्यथा बहु ।

शिल्पं विनिर्माति न मृद्विभिद्यते

भिन्नाकृतिस्तेन गजाश्वभिन्नता ॥ 

 

Aparavad
अपरवाद

अपरवाद सृष्टिविषयक चतुर्थ मत है, जिसपर ओझा जी का यह स्वतन्त्र ग्रन्थ है । प्रस्तुत ग्रन्थ में पर का अर्थ आत्मा और अपर का अर्थ प्रकृति है । भौतिक जगत् प्राकृतिक है इसका उद्भव प्रकृति से होनी चाहिए । प्रकृति का ही दूसरा नाम स्वभाव भी है । इसलिए प्रकृति या स्वभाव को सृष्टि का कारण मानने के कारण सृष्टिविषयक यह मत  अपरवाद कहलाता है । 

 

Rajovad
रजोवाद

 

वेदप्रतिपादित सृष्टिविषयक द्वादश वादों को आधार बनाकर ओझाजी द्वारा प्रत्येक वादों पर एक-एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की गयी । उसी क्रम में रजोवाद को लेकर यह ग्रन्थ लिखा गया है । इस ग्रन्थ में सृष्टिविषयक रजोवाद सिद्धान्त के अन्तर्गत मुख्यतया विश्वसृट्सर्ग तथा भूतसर्ग के बारे में बतलाया गया है । 


Vyomavad
व्योमवाद

व्योमवाद में तीन कल्प हैं। कल्प अध्याय विभाजक शब्द है। प्रथमकल्प का नाम अमृतकल्प है जिसमें अद्वैतवाद, कार्यविभाग, अण्डविभाग और व्योमव्युत्पत्ति हैं। द्वितीय कल्प का नाम अपां कल्प है जिसमें अभ्वविभाग, लोकविभाग, भूतविभाग और गति विभाग हैं। तृतीय कल्प का नाम ज्योतिर्नामकल्प है जिसमें वेदविभाग और इन्द्रविवेक हैं। व्योम का अर्थ आकाश है। आकाश में ही सभी विशेष रूप से बसते हैं और आकाश सभी में व्याप्त है। विस्तृत होने से वह आकाश कहलाता है। आकाश से ही  इस जगत् की उत्पत्ति हुई है, उसी में वह लय को प्राप्त होता है तथा उसी में वह प्रतिष्ठित रहता है। 

 

Sadasadvad
सदसद्वाद

सदसद्वाद का अर्थ है कि यह इस संसार की उत्पत्ति सत् तत्त्व से, असत् तत्त्व से अथवा इन दोनों से तत्त्व से हुई है। ओझा जी के द्वादशवादों में इसका स्थान दूसरा है। इस ग्रन्थ का अभी अनुवाद नहीं हुआ है। इस में नित्यविज्ञानवाद, क्षणिकविज्ञानवाद, आनन्दविज्ञानवाद, कर्माद्वैतसिद्धान्त(असद्वाद), ब्रह्माद्वैतसिद्धान्त (सद्वाद), द्वैताद्वैतसिद्धान्तवाद (सदसद्वाद), रसबलैक्यसिद्धान्तवाद, असत्कार्यवादाधिकरण, सत्कार्यवादाधिकरण, मिथ्याकार्यवादाधिकरण, सदसत्पदार्थनिरूपण, प्रागभावसमुच्चितकारणवादाधिकरण और अव्यक्ताक्षरविकल्प हैं। इस प्रकार प्रधान शीर्षकों के अन्तर्गत अनेक उपशीर्षक भी हैं। ओझा जी इस ग्रन्थ के विषय में लिखते है कि इसमें प्रत्यय, प्रकृति, ऐकात्म्य, अभिकार्य स्वगुण, सामञ्जस्य औअर अक्षर ये साथ विषय हैं-

                                     प्रत्यय एवं प्रकृतिश्चैकात्म्यं चाभिकार्यं च।

                                     स्वगुणाः सामञ्जस्यं चाक्षर इति सप्तथा विमर्शाः स्यु: ॥

इन सातों में क्रमशः असत्, सत् और सदसत् के भेद से यह सदसद्वाद एक्कीस विषय वाला सिद्ध होता है।

                                    प्रत्येकमेषु सन्ति त्रयो विकल्पा असच्च सत् सदसत्।

                                    तेनायमेकविंशी सदसद्वादो निरूप्यते सम्यक्॥

ग्रन्थ के आदि में सत्, असत् तथा सदसत् से सम्बन्धित वेदवचनों को समाहित किया गया है।

असद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                    असद्वा इदमग्र आसीत्। असतः सदजायत।

                                    असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।

                                     तदात्मानं स्वयमकुरुत। तस्मात् सुकृतमुच्यते। तै. उ. २/७

सद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                     असन्नेव स भवति असद्ब्रह्मेति वेद चेत्।

                                    अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः॥ तै. उ. २/६

सदसद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                    असदेवेदमग्र आसीत्। तत् सदासीत्।

                                    तत् समभवत्। तदाण्डं निरवर्तत। छान्दोग्योपनिषद्

इस प्रकार इस ग्रन्थ के अध्ययन से दर्शन के छात्रों को नवीन दृष्टि मिलती है। 

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Samshayataduchedavad 
संशयतदुच्छेदवाद--download

Pandit Motilal Shastri had translated his guru, Pandit Madhusudan Ojha's Sanshayataduchedavada in three volumes. This is a comprehensive work on the theory of methodic doubt. Shastri has presented the scientific aspect of the theory, concept of doubt and its resolution in these volumes. Based on these theories and concepts, Shastriji has explained the complex concepts of existence like life and death, joy and sorrow, penance and freedom from death.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

 

विद्यावाचस्पति पंडित मदुसुदन ओझा जी द्वारा विरचित संशयतदुच्छेदवाद नामक ग्रन्थ का उनके ही प्रधान शिष्य वेदवाचस्पति पंडित मोतीलाल शास्त्री जी द्वारा किये गए हिंदी विज्ञानंभाष्य प्रथम और तृतीय खंड यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं

यह ग्रन्थ तीन काण्डों में विभाजित है,जो विज्ञानोपक्रमाधिकार, संशयाधिकार एवं संशयोच्छेदाधिकार के नाम से अभिहित किया गया है । यह ब्रह्मविज्ञान के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले संशयों का उच्छेद करने वाला ग्रन्थ है । सृष्टिविषयक प्रचलित द्वादशवादों में संशयवाद को आधार बनाकर ओझाजी द्वारा इस ग्रन्थ की रचना की गयी । इस ग्रन्थ में सृष्टि के विषय में जितने मतभेद हैं, उन मतभेदों का निरूपण कर उनका निराकरण किया गया है । परमेश्वर, ईश्वर, जीव, आत्मा, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, उपासना, मोक्ष आदि अनेक दुरूह विषयों के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले प्रश्नों का निरूपण करते हुए उनका वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तर प्रस्तुत किया गया है ।

प्रथम खंड –Part One--download

द्वितीय खंड--Part Two--download

तृतीय खंड- Part Three--download