सदसद्वाद (Sadasdvada)

सदसद्वाद का अर्थ है कि यह इस संसार की उत्पत्ति सत् तत्त्व से, असत् तत्त्व से अथवा इन दोनों से तत्त्व से हुई है। ओझा जी के द्वादशवादों में इसका स्थान दूसरा है। इस ग्रन्थ का अभी अनुवाद नहीं हुआ है। इस में नित्यविज्ञानवाद, क्षणिकविज्ञानवाद, आनन्दविज्ञानवाद, कर्माद्वैतसिद्धान्त(असद्वाद), ब्रह्माद्वैतसिद्धान्त (सद्वाद), द्वैताद्वैतसिद्धान्तवाद (सदसद्वाद), रसबलैक्यसिद्धान्तवाद, असत्कार्यवादाधिकरण, सत्कार्यवादाधिकरण, मिथ्याकार्यवादाधिकरण, सदसत्पदार्थनिरूपण, प्रागभावसमुच्चितकारणवादाधिकरण और अव्यक्ताक्षरविकल्प हैं। इस प्रकार प्रधान शीर्षकों के अन्तर्गत अनेक उपशीर्षक भी हैं। ओझा जी इस ग्रन्थ के विषय में लिखते है कि इसमें प्रत्यय, प्रकृति, ऐकात्म्य, अभिकार्य स्वगुण, सामञ्जस्य औअर अक्षर ये साथ विषय हैं-

                                     प्रत्यय एवं प्रकृतिश्चैकात्म्यं चाभिकार्यं च।

                                     स्वगुणाः सामञ्जस्यं चाक्षर इति सप्तथा विमर्शाः स्यु: ॥

इन सातों में क्रमशः असत्, सत् और सदसत् के भेद से यह सदसद्वाद एक्कीस विषय वाला सिद्ध होता है।

                                    प्रत्येकमेषु सन्ति त्रयो विकल्पा असच्च सत् सदसत्।

                                    तेनायमेकविंशी सदसद्वादो निरूप्यते सम्यक्॥

ग्रन्थ के आदि में सत्, असत् तथा सदसत् से सम्बन्धित वेदवचनों को समाहित किया गया है।

असद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                    असद्वा इदमग्र आसीत्। असतः सदजायत।

                                    असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।

                                     तदात्मानं स्वयमकुरुत। तस्मात् सुकृतमुच्यते। तै. उ. २/७

सद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                     असन्नेव स भवति असद्ब्रह्मेति वेद चेत्।

                                    अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः॥ तै. उ. २/६

सदसद्वाद से सम्बन्धित मन्त्र

                                    असदेवेदमग्र आसीत्। तत् सदासीत्।

                                    तत् समभवत्। तदाण्डं निरवर्तत। छान्दोग्योपनिषद्

इस प्रकार इस ग्रन्थ के अध्ययन से दर्शन के छात्रों को नवीन दृष्टि मिलती है। 

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