Upanishad

Upanishadavigyanabhasha Bhumika  Part I/ Part II/Part III
Prashnopanishad
Kenopanishad
Mandukyopanishad
Mundakopanishad
Kathopanishad
Isopanishad vijnanabhashya  Part II                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      

 

  उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका तीन खण्डों में विभक्त है। इस में अनेक विषयों को पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने समाहित किया है। पण्डित मधुसूदन ओझा एवं शास्त्री ने सनातन सिद्धान्तों को वेद और ब्राह्मण के आधार पर स्पष्ट किया। जबकि अन्य आचार्यों ने सम्प्रदाय के अनुरोध से एक तत्त्व पर विशेष आग्रह किया है। उसी आग्रह के कारण भारतीय मनीषी अन्य अर्थ को स्वीकार करने से हिचकते हैं। यही वैदिकविज्ञान की विशेषता है। पाठकों के रूचि के लिए यहाँ निर्विशेष, परात्पर, अव्यय, अक्षर और क्षर में परस्पर क्या विशिष्टता है, इसका प्रतिपादन यहाँ किया गया है।
 

निर्विशेष - शुद्ध रसात्मक निर्विशेष बनता हुआ ‘ऐकान्तिकसुख’ लक्षण वाला है। निर्विशेष वह है जिसमें कोई विशेषता न हो अर्थात् वह माया अथवा बल से युक्त न हो। उस स्थिति में रूप या आकार नहीं बनता है। यही निर्विशेष जनसामान्य में निर्गुण कहलाता है। निर्विशेष स्थिति का अनुभव होता है।


परात्पर-बलविशिष्ट रसात्मक परात्पर मायातीत बनता हुआ, नित्यप्रतिष्ठ रहता हुआ ‘शाश्वतधर्म’ लक्षण वाला है। निर्विशेष का जब बल के साथ सम्बन्ध होता है और माया से परे रहता है तब वह परात्पर कहलाता है। वैदिकविज्ञान में बल और माया में कुछ विशिष्टता है। यही परात्पर जनसामान्य में सगुण कहलाता है तथा इस स्थिति में रूप और आकार होता है।


अव्यय- महामाया से अवच्छिन्न रसबलात्मक अव्यय विविधभावाशून्य रहता हुआ ‘अव्यय’ लक्षण वाला है। अव्यय में तीनों तत्त्व होते हैं- शुद्ध रस, बल एवं माया। इसका व्यय नहीं होता है। अर्थात् यह नित्य तत्त्व के रूप में रहता है।


अक्षर -हृदय से अवच्छिन्न रसबलात्मक अक्षर निमित्तकारण से अपने अविपरिणामी धर्म से ‘अमृत’ लक्षण है। वैदिकविज्ञान में हृदय एक प्रमुख पारिभाषिक पद है । घटरूप कार्य में कुम्भकार निमित्त कारण है। वैसे ही इस जगत् का निमित्त कारण अक्षर ही है।


क्षर- परिधि से अवच्छिन्न रसबलात्मक आत्मक्षर उपादान कारण से अपने परिणामी रूप से विश्वोत्पादन बनता हुआ ‘ब्रह्म’ लक्षण वाला है।


उपर्युक्त विषयों को शास्त्री जी ने गीता के आधार पर प्रस्तुत किया है-

                                                                           ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।

                                                                           शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ गीता १४/२७

Upanishadavigyanabhasha Bhumika  Part I / Part II / Part III
उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका खण्ड I- -download / खण्ड II- -download / खण्ड III--download

 

Prashnopanishad
प्रश्नोपनिषद् --download


Mundakopanishad
मुण्डकोपनिषद् 

अथर्ववेद की शौनकीशाखा से संबद्ध यह मुण्डकोपनिषद् है। इस में तीन मुण्डक एवं प्रत्येक मुण्डक दो-दो खण्डों में विभक्त हैं। इस उपनिषद् के ऊपर भी पण्डित मोतीलाल शास्त्री का विज्ञानभाष्य है। शास्त्री जी ने विज्ञानभाष्य में जो विशेषता है उसका दिग्दर्शन इस मन्त्र की व्याख्या से संभव है।   `` यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति।  यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतीह विश्वम्॥`` इस मन्त्र में तीन कार्य-कारण सिद्धान्त का वर्णन है।


मकड़ी-जाल का सिद्धान्त : मकड़ी कारण और उससे उत्पन्न होने वाला जाल कार्य है। इस कार्य-कारण में शास्त्री जी मुख्यरूप से चार तथ्यों को स्पष्ट करना चाहते हैं। मकड़ी का जाल मकड़ी से उत्पन्न होकर मकड़ी के साथ रहता है, मकड़ी से भिन्न स्थानों पर रहता है, मकड़ी में ही उसका लय होता है और मकड़ी में उसका लय नहीं होता है। यह चार स्थितियाँ मकड़ीजाल के साथ है।


पृथ्वी-औषधि का सिद्धान्त : पृथ्वी कारण और औषधि कार्य है। इस कार्य-कारण में औषधि पृथ्वी से उत्पन्न होकर पृथ्वी पर रहती है, पृथ्वी से भिन्न स्थानों पर भी रहती है और पृथ्वी में ही विलीन होती है।


पुरुष- केश का सिद्धान्त : पुरुष कारण और केश कार्य है। केश पुरुष में (उत्पत्ति स्थान में) रहता है और नहीं भी(उत्पत्ति स्थान में) रहता है। केश का अपने कारण पुरुष में विलय नहीं होता है। केश अपनी उत्पत्ति स्थान से भिन्न भी रहता है। जब हम केश को काटते हैं तब केश कटते ही पुरुष ( कारण) से अलग हो जाता है।

इस प्रकार अक्षर रूप कारण से विश्वरूप जगत् का प्रादुर्भाव होता है। मुडकोपनिषद् में भी विस्तार से शास्त्री जी ने अनेक विषयों को समाहित किया है। जिसके अध्ययन से नवीन विषयों का ज्ञान होता है।--download


Kenopanishad
केनोपनिषद्


केनोपनिषद् उपनिषदों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है । यह उपनिषत्  सामवेद के तवलकार ब्राह्मण के अन्तर्गत है। तवलकार ब्राह्मण का यह नवम अध्याय है। इस उपनिषद् में सबसे पहले ‌‘केन’ शब्द आया है, इसी से इसका नाम   केनोपनिषद्  है । पण्डित मोतीलाला शास्त्रीजी के अनुसार इस उपनिषत् में प्रधानतया प्रज्ञानात्मा का ही निरूपण हुआ है। --download

Mandukyopanishad
माण्डूक्योपनिषद्

माण्डूक्योपनिषद् का अथर्ववेद से सम्बन्ध है। इस में मात्र बारह मन्त्र हैं। पण्डित मधुसूदन ओझा के कतिपय सिद्धान्तों का मूलस्रोत यह उपनिषद है। ओझाजी ने चतुष्पाद ब्रह्म को स्वीकार किया है जिसका आधार यही उपनिषद् है। ओझाजी ने चतुष्पाद की व्याख्या के लिए एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही लिखा है जिसका नाम ब्रह्मचतुष्पदी है। ओझा जी का दूसरा सब से प्रमुख वैदिक पारिभाषिक पद है अक्षर जिसका भी मूलस्रोत यही उपनिषद् है।

                                               
इस उपनिषद् पर पण्डित मोतीलाल शास्त्री का हिन्दीविज्ञान भाष्य है। उन्होंने किस प्रकार चतुष्पाद की व्याख्या प्रस्तुत की है। ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ के अनुसार ब्रह्म विश्व की रचना कर के उस में प्रविष्ट होता है। अत एव विश्व का ही दूसरा नाम प्रविष्टात्मा है, विश्व यह तीन पाद है और शुद्ध आत्म एक पाद है। इन दोनों को मिला कर चहुष्पाद हो गया।


इस की एक दूसरी व्याख्या करते हुए शास्त्री जी लिखते हैं कि प्रविष्टात्मा अर्थात् विश्व में चार पाद हैं- प्रथमपाद अव्यय, द्वितीयपाद अक्षर, तृतीय पाद आत्मक्षर है। आत्मक्षर के दो भेद हैं- ब्रह्म और सुब्रह्म। इनके अनुसार ब्रह्म से स्थिर सृष्टि होती है और सुब्रह्म से अस्थिर सृष्टि होती है। स्थिर सृष्टि के अन्तर्गत नदी, समुद्र, पर्वत आदि आता है तथा अस्थिर सृष्टि में जीव का स्थान आता है। इस ग्रन्थ को पढ़ने से भारतीय दर्शन के पाठक को एक नवीन दृष्टि मिलती है।  --download


Kathopanishad
कठोपनिषद् 

यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद की कठशाखा से संबद्ध होने से ही ‘कठोपनिषद्’ कहलाता है। इस में दो अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लियाँ हैं। यम और नचिकेता के संवाद में आत्मविद्या के रहस्य को बताया गया है।

पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने इस कठोपनिषद् पर हिन्दी में विज्ञानभाष्य लिखा है। इस उपनिषद् के प्रथम अध्याय के प्रथम वल्ली के पहले मन्त्र में  ‘सर्ववेदसम्’  यह पद आया है। इसका अर्थ आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में ‘सर्वस्वं धनम्’  किया है जिसका अर्थ है सब कुछ दान कर देना। दूसरी बात आचार्य शंकर ने कहा कि वाजश्रवा ने विश्वजित् यज्ञ  किया था।[i] परन्तु  पण्डित शास्त्री जी ‘सर्ववेदसम्’ की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जिस यज्ञ में कौपीन, पानी पीने के लिए मृण्मयपात्र, स्त्री एवं सन्तान को छोड़ कर सर्वस्व दान कर दिया जाता है उसी का नाम  ‘सर्ववेदसम्’ यज्ञ है। जो फल क्षत्रिय राजा को ‘विश्वजित्’ यज्ञ से मिलता है। वही फल ब्राह्मण को इस ‘सर्ववेदसम्’ यज्ञ से मिल जाता है। इस व्याख्यान से स्पष्ट है कि शास्त्री जी ‘सर्ववेदसम्’  को यज्ञ मानते हैं।[ii] यही वेदविज्ञान की दृष्टि है।

प्रथम अध्याय तृतीय वल्ली के प्रथम मन्त्र में ‘ऋतम्’  पद आया है। आचार्य शंकर ने इसका अर्थ सत्य किया है।[iii] परन्तु शास्त्री जी ने वेदविज्ञान की दृष्टि से ऋत शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ‘सर्वबलविशिष्ट रस का नाम परात्पर है। यह परात्पर विश्वातीत है। अत एव अखण्ड है। असीम है। भूमारूप है। अभयस्वरूप ह।, यही सबका अन्तिम आलम्बन है। यह व्यापक तत्त्व है। जो वस्तु व्यापक होती है उसमें केन्द्र नहीं होता । परात्पर व्यापक है। अत एव उसका कोई परिच्छिन्न शरीर नहीं है। जो अहृदय और अशरीरी होता है उसे ही ऋततत्त्व कहते हैं।’[iv]

इसी मन्त्र में ‘पञ्चाग्नि’ पद आया है। इस को स्पष्ट करते हुए आचार्य शंकर ने कहा कि गृहस्थ पञ्चाग्नि की उपासना करता है।[v] परन्तु शास्त्री जी विषय को सरल करने के लिए पाँचों अग्नियों के नाम बताते हैं। गार्हपत्याग्नि, दाक्षिणाग्नि, आहवनीयाग्नि, सभ्याग्नि और आवसथ्याग्नि ये पाँच अग्नि के नाम हैं।[vi]

शास्त्री जी ने उपनिषद् व्याख्यान करने की प्रविधि बतलायी है। ज्ञानकाण्ड का प्रतिपादन करने वाला ‘उपनिषद्’ है। कर्मकाण्ड का प्रतिपादन करने वाले ‘ब्राह्मण’ हैं। दोनों का समान रूप से प्रतिपादन करने वाला ‘आरण्यक’ है। इन तीनों के मूल ब्रह्मतत्त्व का निरूपण करने वाली ‘संहिता’ है। ब्रह्म और ब्राह्मण दो ही विभाग हैं। मूलभाग का नाम ब्रह्म है और व्याख्यानभाग का नाम ब्राह्मण है। मूलभाग में विज्ञान, स्तुति और इतिहास हैं तथा व्याख्यन भाग में कर्म, उपासना और ज्ञान हैं। ब्रह्म के आधार पर ही ब्राह्मण चलता है। जब तक संहिता, ब्राह्मण और आरण्यक इन तीनों को न समझ लिया जाय तब तक इनसे अविनाभूत (परस्पर संबद्ध) रहने वाले उपनिषद् का अर्थ समझ लेना कठिन ही नही अपितु असंभव है। जब तक उपनिषद् भाग को नहीं जाना जाता है तब तक ब्राह्मण एवं आरण्यक को भी समझना कठिन है।[vii] इसीलिए जहाँ छान्दोग्योपनिषद् में कर्मभाग के साथ  ज्ञानभाग का अविनाभाव की आवश्यकता बतलाते हुए कहा गया है-

                    यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति।[viii]

 जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योग से युक्त होकर किया जाता है वही बलवान् होता है।

          इस प्रकार विज्ञान भाष्य में ब्राह्मण ग्रन्थों के आधार पर  आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं  आधिदैविक व्याख्या की गयी है। यह विज्ञानभाष्य ५०० पृष्ठों मे निबद्ध है एवं अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों की वेदविज्ञानपरक व्याख्या की गयी है।

सन्दर्भ :

[1] कठोपनिषच्छाङ्करभाष्य1.1.1

[1] कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य पृ. 51

[1] कठोपनिषच्छाङ्करभाष्य 1.3.1

[1] कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य पृ. 208

[1] कठोपनिषच्छाङ्करभाष्य 1.3.1

[1] कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य पृ. 212

[1] कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य पृ.9-10

[1] छान्दोग्योपनिषद् 1.1.10

 

ग्रन्थसूची :                                                    

कठोपनिषच्छाङ्करभाष्य

कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य

छान्दोग्योपनिषद्

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Isopanishad vijnanabhashya Part II
ईशोपनिषद् विज्ञानभाष्य 
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