व्योमवाद (Vyomavada)

व्योमवाद में तीन कल्प हैं। कल्प अध्याय विभाजक शब्द है। प्रथमकल्प का नाम अमृतकल्प है जिसमें अद्वैतवाद, कार्यविभाग, अण्डविभाग और व्योमव्युत्पत्ति हैं। द्वितीय कल्प का नाम अपां कल्प है जिसमें अभ्वविभाग, लोकविभाग, भूतविभाग और गति विभाग हैं। तृतीय कल्प का नाम ज्योतिर्नामकल्प है जिसमें वेदविभाग और इन्द्रविवेक हैं। व्योम का अर्थ आकाश है। आकाश में ही सभी विशेष रूप से बसते हैं और आकाश सभी में व्याप्त है। विस्तृत होने से वह आकाश कहलाता है। आकाश से ही  इस जगत् की उत्पत्ति हुई है, उसी में वह लय को प्राप्त होता है तथा उसी में वह प्रतिष्ठित रहता है। 

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