अहोरात्रावाद: (Ahoratravada)

 

 

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भौतिक विज्ञान (Bhautik vigyan) (Hindi translation)

 

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वैदिक कोश Vaidik Kosha

 

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Prayatna Prasthana Mimamsa

Srimad Bhagvad-Gita Vijnanabhashya

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ब्रह्मविज्ञान(Brahmavijnana)

ब्रह्मविज्ञान ओझा जी का एक मात्र ग्रन्थ है जो हिन्दी भाषा में है। यद्यपि यह ग्रन्थ ओझा जी के व्याख्यान का लिखित रूप है। ब्रह्मविज्ञान का अर्थ है ब्रह्म सम्बन्धी         विषयों का स्पष्टीकरण। इस ग्रन्थ में मंगलाचरण, प्रतिज्ञा, सदसद्वादविकल्प सप्तविकल्पसूत्र, मूलोपनिषद्, संशयोपनिषद्, असत्योपनिषद्, विशिष्ट-         त्रिसत्योपनिषद्, शुक्ल-त्रिसत्योपनिषद्, परात्पर आत्मसूत्र, सत्यत्रयसूत्र, योगरूढ़ यैगिकरूढ़, यज्ञ, व्यूहानव्यूह परिच्छेद, आत्मपरिच्छेद और आत्मगति परिच्छेद        हैं। इन शीर्षकों के अन्तर्गत अनेक उपशीर्षक भी हैं। ओझा जी के इस ग्रन्थ में प्राण को सहजतापूर्वक समझाया गया है।

Smarthakundasamikshadhyayah

Pandit Ojha in this authentic treatise has thoroughly and critically dwelt on the Kundas and other requisites of Smarta rites taking          into consideration the characteristic views of almost ,all the earlier works on the subject. He has provided appropriate diagrams a        numerous tables relating to the -measurements of the various Kundas with a view┬À to making the subject easily understandable. 

व्योमवाद (Vyomavada)

व्योमवाद में तीन कल्प हैं। कल्प अध्याय विभाजक शब्द है। प्रथमकल्प का नाम अमृतकल्प है जिसमें अद्वैतवाद, कार्यविभाग, अण्डविभाग और व्योमव्युत्पत्ति हैं। द्वितीय कल्प का नाम अपां कल्प है जिसमें अभ्वविभाग, लोकविभाग, भूतविभाग और गति विभाग हैं। तृतीय कल्प का नाम ज्योतिर्नामकल्प है जिसमें वेदविभाग और इन्द्रविवेक हैं। व्योम का अर्थ आकाश है। आकाश में ही सभी विशेष रूप से बसते हैं और आकाश सभी में व्याप्त है। विस्तृत होने से वह आकाश कहलाता है। आकाश से ही  इस जगत् की उत्पत्ति हुई है, उसी में वह लय को प्राप्त होता है तथा उसी में वह प्रतिष्ठित रहता है। 

दशवादरहस्य (Dashavadarahasyam) Author: Pandit Madhusudan Ojha

पण्डित मधुसूदन ओझा का दशवादरहस्य उनके द्वारा प्रतिपादित वाद ग्रन्थों का परिचयात्मक ग्रन्थ है। इसमें मुख्यतः सदसद्वाद, रजोवाद, व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद, संशयवाद और सिद्धान्तवाद का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। इन वादों पर ओझाजी ने पृथक्-पृथक् ग्रन्थ लिखे हैं। उन गन्थों के साररूप को दशवादरहस्य में प्रस्तुत किया है । इसमें वैदिक पारिभाषिक पद वयुन को स्पष्ट किया गया है। ‘यह वस्तु है’ इस रूप में हमे जो वस्तु का ज्ञान होता है, वह वयुन है। वयुन के दो रूप हैं-वयः और वयोनाध। वस्तु मात्र में जि भार अर्थात् वजन है वह वय है तथा उस वस्तु की जो सीमा है, वह वय

सदसद्वाद (Sadasdvada)

सदसद्वाद का अर्थ है कि यह इस संसार की उत्पत्ति सत् तत्त्व से, असत् तत्त्व से अथवा इन दोनों से तत्त्व से हुई है। ओझा जी के द्वादशवादों में इसका स्थान दूसरा है। इस ग्रन्थ का अभी अनुवाद नहीं हुआ है। इस में नित्यविज्ञानवाद, क्षणिकविज्ञानवाद, आनन्दविज्ञानवाद, कर्माद्वैतसिद्धान्त(असद्वाद), ब्रह्माद्वैतसिद्धान्त (सद्वाद), द्वैताद्वैतसिद्धान्तवाद (सदसद्वाद), रसबलैक्यसिद्धान्तवाद, असत्कार्यवादाधिकरण, सत्कार्यवादाधिकरण, मिथ्याकार्यवादाधिकरण, सदसत्पदार्थनिरूपण, प्रागभावसमुच्चितकारणवादाधिकरण और अव्यक्ताक्षरविकल्प हैं। इस प्रकार प्रधान शीर्षकों के अन्तर्गत अनेक उपशीर्षक भी हैं। ओझा जी इस ग्रन्थ के विषय

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