राष्ट्रीय संगोष्ठी–इन्द्रविजय : भारतवर्ष आख्यान

प्रतिवेदन

विद्यावाचस्पति पण्डित मधुसूदन ओझा ने वैदिक विज्ञान को उद्घाटित करने के लिए अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। उनके द्वारा प्रणीत ग्रन्थों में ‘इन्द्रविजय’ नामक ग्रन्थ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रन्थ में पं. ओझाजी ने विविध वैदिक एवं पौराणिक उद्धरणों को प्रस्तुत करते हुए भारतवर्ष के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक स्वरूप का प्रामाणिक विवेचन प्रस्तुत किया है। यह ग्रन्थ कुल चार प्रक्रमों में विभक्त है जिनमें त्रिविध त्रिलोकी, भारतवर्ष के नामकरण के हेतु, हिन्दुस्तान शब्द का भारत के एक भाग के लिए प्रयोग, सिन्धु नद को विभाजक मानकर बृहत्तर भारत के पूर्वी और पश्चिमी दो भेदों की स्थापना द्वारा सीमानिर्धारण, संहितामन्त्रों के निर्माणकाल में लिपि होने की स्थापना, धर्म-स्वरूप, विद्याओं के प्रभेद, आर्यों की मौलिक भारतीयता की स्थापना और वैदेशिकता का खण्डन, भारतीय राष्ट्र पर वैदेशिक अनार्य दासों के आक्रमण, देवेन्द्र द्वारा दस्युओं का निग्रहण आदि अनेक विषयों का प्रबलतम प्रमाणों और तर्कों के द्वारा उनका विवेचन कर अनेक रहस्योद्घाटक तथ्य ओझाजी के द्वारा प्रस्तुत किये गये हैं।

इस ग्रन्थ में पं. ओझाजी ने विविध वैदिक एवं पौराणिक उद्धरणों को प्रस्तुत करते हुए भारतवर्ष के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक स्वरूप का प्रामाणिक विवेचन प्रस्तुत किया है। यह ग्रन्थ कुल पाँच प्रक्रमों में विभक्त है जिनमें त्रिविध त्रिलोकी, भारतवर्ष के नामकरण के हेतु, हिन्दुस्तान शब्द का भारत के एक भाग के लिए प्रयोग, सिन्धु नद को विभाजक मानकर बृहत्तर भारत के पूर्वी और पश्चिमी दो भेदों की स्थापना द्वारा सीमानिर्धारण, संहितामन्त्रों के निर्माणकाल में लिपि होने की स्थापना, धर्म-स्वरूप, विद्याओं के प्रभेद, आर्यों की मौलिक भारतीयता की स्थापना और वैदेशिकता का खण्डन, भारतीय राष्ट्र पर वैदेशिक अनार्य दासों के आक्रमण, देवेन्द्र द्वारा दस्युओं का निग्रहण आदि अनेक विषयों का प्रबलतम प्रमाणों और तर्कों के द्वारा उनका विवेचन कर अनेक रहस्योद्घाटक तथ्य ओझाजी के द्वारा प्रस्तुत किये गये हैं।

प्रस्तुत संगोष्ठी इस विमर्शशृंखला के अन्तर्गत समायोजित होने वाली प्रथम संगोष्ठी है जो इन्द्रविजय के भारतपरिचय नामक प्रथम प्रक्रम के कुछ बिन्दुओं को आधार बनाकर समायोजित की जा रही है। भारतपरिचय नामक प्रक्रम कुल ११ शीर्षकों में विभक्त है। ये शीर्षक हैं- त्रैलोक्यप्रसङ्ग, नामधेयप्रसङ्ग, सीमाप्रसङ्ग, उपद्वीपप्रसङ्ग, लङ्काप्रसङ्ग, भारतीयभाषाप्रसङ्ग, वर्णमातृकाप्रसङ्ग, लिपिप्रसङ्ग, सभ्यताप्रसङ्ग, धर्मप्रसङ्ग एवं विद्याप्रसङ्ग।यह संगोष्ठी इन्द्रविजय ग्रन्थ के प्रथम प्रक्रम के अन्तर्गत वर्णित त्रैलोक्य एवं नामधेय प्रसङ्ग को आधार बनाकर समायोजित की गयी। ध्यातव्य है कि प्रथम प्रक्रम का नाम भारतपरिचय है।

मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान करते हुए प्रो. सरोज कौशल, कलासंकायाध्यक्ष, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर ने कहा कि इन्द्रविजय के भारतपरिचय नामक प्रथम प्रक्रम का पहला प्रसङ्ग त्रैलोक्यप्रसंग है। इस में तीन प्रकार की त्रिलोकी का वर्णन है। दिव्यत्रैलोक्य,  शारीरत्रैलोक्य और भौमत्रैलोक्य। दिव्यत्रैलोक्य में देवताओं का निवास स्थान है।  शारीरत्रैलोक्य में मानव शरीर के अन्तर्गत त्रिलोक की परिकल्पना की गयी है। भौमत्रैलोक्य में इस भूमण्डल पर त्रिलोकी की अवधारणा वर्णित है।

‘तद्दिव्यं शारीरं भौमं चेति क्रमादुक्तम् ।
अग्निर्वायुश्चेन्द्रश्चेति त्रैलोक्यमिष्यते दिव्यम् ॥’, इन्द्रविजय, पृ. २

दिव्यत्रैलोक्य में पहला पृथ्वीलोक है, जहाँ अग्नि तत्त्व की प्रधानता रहती है। दूसरा द्युलोक है, जहाँ सूर्य स्वरूप इन्द्र तत्त्व की प्रधानता रहती है। इन दोनों पृथ्वी और द्युलोक के बीच में अन्तरिक्ष है, जहाँ वायु की प्रधानता रहती है-

‘पृथ्वीयमग्निलोकः सूर्यो द्यौरिन्द्रलोकः सः ।
                     अनयोर्मध्ये वायोर्लोकः स्यादन्तरिक्षमिदम् ॥’, वही

शारीरत्रैलोक्य के  माध्यम से शरीर में त्रिलोकी की अवधारणा इस प्रकार है। गुदा स्थान से नाभि स्थान तक भाग पृथ्वीलोक कहलाता है। हृदय स्थान से लेकर कण्ठ तक का स्थान द्युलोक कहलाता है। बीच वाला उदर भाग अन्तरिक्ष कहलाता है-

                               गुदनाभ्यन्तः पृथ्वीर्द्यौर्हृत्कण्ठान्तरन्तरे व्योम ।
    उदरमुरश्च शिरश्चेत्यथवा देहे त्रिलोकी स्यात् ॥ वही, पृ. ३

भौम त्रैलोक्य के प्रसंग में कहा गया है कि मनुष्य जिस स्थान पर निवास करता है, वह पृथ्वी लोक है। देवता लोग जहाँ निवास करते हैं, वह द्युलोक कहलाता है। बीच का भाग अन्तरिक्ष है, जहाँ तिर्यग्योनि वाले पक्षी आदि विचरण करते हैं-

                               मानुषलोकः पृथ्वी तैर्यग्योनोऽन्तरिक्षं स्यात् ।
     दैवो लोको द्यौरिति भौमं त्रैलोक्यमाख्यातम् ॥ वही पृ. ३

प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी, आचार्य, संस्कृतविभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने मुख्य अतिथि के रूप में  विषय उद्घाटित करते हुए कहा कि प्रथम प्रक्रम में ग्यारह प्रसंग है। इन प्रसंगों को एक नवीन  आयाम में समझा जा सकता है। त्रैलोक्यप्रसंग, नामधेयप्रसंग और लङ्काप्रसंग के माध्यम से भारत के भूगोल को समझा जा सकता है। इस में भारतवर्ष के प्राचीन भूगोल का ज्ञान प्राप्त होता है। भाषाप्रसंग, वर्णमातृकाप्रसंग और लिपिप्रसंग  ये तीनों प्रसंग भारतीय ज्ञानपरम्परा का निदर्शन कराते हैं।  धर्म और सभ्यता का प्रसंग भारतीय परम्परा के व्यवहार और उसके प्रयोग का दर्शन कराते हैं। विद्याप्रसंग में शस्त्र आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है। जिस में युद्धकौशल का निरूपण प्रमाणपूर्वक किया गया है।

          प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, समन्वयक, श्रीशंकर शिक्षायतन एवं आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि नामधेय नामक प्रसंग में भारतवर्ष नामकरण में ग्रन्थकार ने चार प्रकार के प्रमाणों का उल्लेख किया है। दो प्रकार के पौराणिक विचार, वैदिकविचार और लोकविचार। उन्होंने कहा कि शतपथब्राह्मण में अग्नि तत्त्व को भारत कहा गया है। विष्णुपुराण में कहा गया है जो  व्यक्ति प्रजा का भरण और पोषण करता है, वह भरत है। यह भरत मनु हैं। इस प्रकार अनेक व्युत्पत्ति से भारतवर्ष को व्याख्यायित किया गया है। भारतवर्ष, नाभिवर्ष, आर्षभवर्ष और हैवतवर्ष ये भारत के चार पौराणिक नाम हैं।  

 इस कार्यक्रम का शुभारम्भ डॉ. अनयमणि त्रिपाठी, सहायक आचार्य, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जम्मू परिसर के वैदिकमंगलाचरण से हुआ। श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने कार्यक्रम का संचालन किया एवं डा. लक्ष्मी कान्त विमल ने धन्यवाद ज्ञापन किया । इस कार्यक्रम में देश के विविध प्रदेशों के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शोधसंस्थानों के आचार्यों, शोधच्छात्रों एवं संस्कृतानुरागी विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग लेते हुए इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को सफल बनाने में अपना अप्रतिम योगदान दिया। वैदिक शान्तिपाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ।