राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श

प्रतिवेदन

श्रीशंकर शंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० नवम्बर २०२३ को शारीरकविमर्श नामक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया। पं. मधुसूिन ओझा प्रणीत शारीरकशवमशशके १५वें प्रकरण को आधार बना कर यह संगोष्ठी समायोशजत हुई थी । इस प्रकरण में २७ शीर्षकों के माध्यम से ईश्वर का विस्तार से निरूपण किया गया है। ओझाजी ने इस प्रकरण में ईश्वर विषयक विविध वैदिक सन्दर्भों को उद्धृत करते हुए विविध आयामों से ईश्वर के विषय में विमर्श किया है।

संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में व्याख्यान करते हुए डॉ. सोमवीर सिंघल, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने सगुण और निर्गुण के माध्यम से ईश्वर के स्वरूप का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि उपासना के लिए सगुण स्वरूप होना आवश्यक होता है। ज्ञान के लिए निर्गुण स्वरूप होना आवश्यक है। इस प्रकरण में रस और बल को निर्विशेष कहा गया है। निर्विशेष का ही अर्थ निर्गुण होता है। जब रस और बल पृथक् पृथक् रहते हैं तब वे दोनों निर्विशेष कहलाते हैं। जब सृष्टि की इच्छा से दोनों तत्त्व मिलते हैं तब सगुण का स्वरूप निर्धारित होता है। जिसे सविशेष कहा जाता है। उन्होंने कहा कि वेदों में ईश्वर के लिए ईशान, पुरुष आदि शब्द का उल्लेख प्राप्त होता है।

द्वितीय वक्ता के रूप में व्याख्यान देते हुए डॉ. रञ्जनलता, सहायक आचार्या, संस्कृत एवं प्राकृत विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने कहा कि ईश्वरात्मनिरुक्ति के दूसरे शीर्षक में परात्पर का स्वरूप प्रतिपादित किया गया है। ग्रन्थकार ने परात्पर के वर्णन के क्रम में परात्पर के लिए निर्विशेष, निरञ्जन, उपसृष्ट और उपसर्ग ये पारिभाषिक शब्द प्रयुक्त किये हैं। जिस में कोई छोटा-बड़ा आकार और लाल-पीला वर्ण नहीं होता है, वह तत्त्व निर्विशेष कहलाता है। जिस पर कोई लेप नहीं लग सकता है और किसी प्रकार का कोई आवरण भी नहीं आ सकता है, वह तत्त्व निरञ्जन कहलाता है। स्फटिक मणि के समीप लालफूल रहने पर फूल का लाल रंग स्फटिक में दीखने लगता है। यही उपाधि है, इसी को उपसृष्ट कहते हैं। उपसर्ग का अर्थ उपाधियुक्त होता है। परात्पर उपाधि रहित होता है। उपसृष्ट और उपाधि एक ही वस्तु है। उपसृष्ट का अर्थ उपहित होता है।

“यो निर्विशेषः स परात्परो भवन्
निरञ्जनः सन्नुपसृष्ट ईक्ष्यते ।
हित्वोपसर्गं स निरञ्जनो भवन्
परात्परः शिष्यत एव लक्ष्यते ॥” शारीरकविमर्श, पृ.२६१, का.१

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. गोपाल प्रसाद शर्मा, आचार्य, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने ब्रह्म के चतुष्पादों में वर्णित पुरुष और पुर पर अपना सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया । उन्होंने कहा कि ऋग्वेद में ‘पुरुष एवेदम्’ यह उल्लेख है। यह पुरुष ही प्रजापति है। पुर का अर्थ नगर है। यह शरीर ही नगर है। इस दृष्टि से ‘पुरि शेते इति’ पुरुष सिद्ध होता है। विकार के प्रसंग में ग्रन्थकार ने आत्मग्राम और भूतग्राम का उल्लेख किया है। ग्राम शब्द का अर्थ समूह होता है। भूत अर्थात् जीव अनेक हैं । इस दृष्टि से भूतग्राम समुचित है। परन्तु आत्मा शब्द में भी ग्राम शब्द रहने से आत्मसमूह का बोध होता है। यहाँ आत्मा के साथ ग्रामशब्द व्यापकत्व का निर्देश करता है न कि अनेकत्व का।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, समन्वयक, श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि शारीरकविमर्श का १५ वां प्रकरण अत्यन्त विशाल एवं विषयगाम्भीर्य से युक्त है जिस पर अभी तक हिन्दी अनुवाद भी नहीं हुआ है। इस प्रकरण में ईश्वर तत्त्व पर विचार किया गया है। आचार्य उदयन ने भी न्यायकुसुमाञ्जलि नामक ग्रन्थ में ईश्वर की सिद्धि की है। अन्य दार्शनिकों ने भी अपनी-अपनी दृष्टि से ईश्वर तत्त्व का विवेचन किया है। आचार्य मधुसूदन ओझा जी ने इस प्रकरण में ईश्वर का साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया है। इस प्रकरण में ईश्वर के शरीर पक्ष पर अधिक विचार किया गया है। यद्यपि पं. ओझा जी ने ईश्वर को ‘निस्तनुः’ अर्थात् शरीरहित कहा है। किन्तु दूसरे रूप में उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया है कि शरीर के माध्यम से ही आत्मा का बोध संभव है। देह के द्वारा ही ईश्वर का बोध होता है। ईश्वर ही देही है और उसी को आत्मा कहा जाता है।

“आत्मैवेश्वर उच्यते न तु तनुः किन्त्वेष नात्मा विना
देहेन क्व च भाति तेन भगवान् देहीश्वरो गम्यते।
जीवस्येव च तस्य भाति परमाराध्यस्य देहत्रयं
स्थूलं सूक्ष्ममथास्ति कारणवपुस्तत्रान्तरे निस्तनुः॥ ”, वही, पृ. २६१, का.३

इस कार्यक्रम का शुभारम्भ डॉ. मधुसूदनशर्मा, अतिथि प्राध्यापक, पौरोहित्य विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वैदिकमंगलाचरण से हुआ। श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने कार्यक्रम का संचालन किया एवं डा. लक्ष्मी कान्त विमल ने धन्यवाद ज्ञापन किया । इस कार्यक्रम में देश के विविध प्रदेशों के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शोधसंस्थानों के आचार्यों, शोधच्छात्रों एवं संस्कृतानुरागी विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग लेते हुए इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को सफल बनाने में अपना अप्रतिम योगदान दिया। वैदिक शान्तिपाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ।