राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श

प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक २९ दिसम्बर २०२३ को शारीरकविमर्श नामक एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया । पं. मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविमर्श नामक ग्रन्थ के ‘जीवात्मप्रतिपत्ति’
नामक १६ वें प्रकरण को आधार बना कर यह संगोष्ठी समायोजित हुई थी । ओझाजी ने इस प्रकरण में जीवात्मविषयक विविध विषयों को उपस्थापित किया है जिनमें शारीरक जीवात्मा प्रत्यगात्मा, चिदात्मा, चिदंश एवं चिदाभास आदि पर विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।


यह संगोष्ठी श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के समन्वयक तथा संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई जिसमें प्रो. वीरनारायण
एन्. के. पाण्डुरंगी, विभागाध्यक्ष, वेदान्त विभाग, कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय, बेंगलुरू ने मुख्य वक्ता के रूप में तथा प्रो. प्रदीप कुमार पाण्डेय, आचार्य, व्याकरण विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर ने विशिष्ट वक्ता के रूप में
व्याख्यान प्रस्तुत किया। प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, आचार्य, वेदान्त विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिभागियों को उद्बोधित किया।

संगोष्ठी में विशिष्ट वक्ता के रूप में व्याख्यान करते हुए प्रो. प्रदीप कुमार पाण्डेय ने कहा कि पं. मधुसूदन ओझाजी के अनुसार इस विश्व का विचार करते हुए पुरुषों के लिए विज्ञान से दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं-अमृत और मृत्यु। इनमें अमृत को चित् और मृत्यु को अचित् कहा गया है। इनमें ज्ञानस्वरूप जो ज्योति विज्ञात होती है, वह चित् है तथा जो आवरणस्वरूप अज्योति है वह अचित् है। इनमें से चित् तीन प्रकार से जाना जाता है-चिदात्मा, चिदंश एवं चिदाभास ।

मुख्य वक्ता के रूप में अपने व्याख्यान में प्रो. वीरनारायण एन्. के. पाण्डुरंगी ने चिदात्मा एवं चिदंश के स्वरूप पर विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने बयलाया कि पं मधुसूदन ओझा जी के अनुसार अत्यन्त रूप से अबद्ध रहने वाला तत्त्व चिदात्मा है।
ओझाजी ने इसके लिए अत्यनपिनद्ध शब्द का प्रयोग किया है। दिक्, देश, काल और संख्या के अनवच्छेद से आकाश की तरह असीम जो रूप विचारित किया जाता है और जिसकी सीमा किसी भी प्रकार से उपपन्न नहीं होती है, उसे अत्यनपिनद्ध कहा गया है। चिदात्मा ही जब सीमाबद्ध हो जाता है तो वह चिदंश के रूप में जाना जाता है। वह चिदंश दो प्रकार का है- प्रत्यगात्मा और शारीरक। प्रतिभागियों को उद्बोधित करते हुए प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने शारीरक शब्द की व्याख्या करते हुए वेदान्तदर्शन के दो महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त अवच्छेदवाद और प्रतिबिम्बवाद पर विस्तार से विवेचन किया। उन्होंने बतलाया कि ओझाजी के अनुसार
चिदंश ही शरीरोपाधि से युक्त होने की विवक्षा में चिदाभास होकर शारीरक स्वरूप हो जाता है।


अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने बतलाया कि श्रीशंकर शिक्षायतन इस वर्ष पं. मधुसूदन ओझाजी के शारीरकविमर्श पर एक विशिष्ट शृंखला का समायोजन कर रहा था जिसमें इस ग्रन्थ के प्रत्येक अधिकरण को लेकर एक वर्ष पर्यन्त प्रत्येक महीने में एक संगोष्ठी का समायोजन हुआ। प्रत्येक संगोष्ठियों में इस विषय के विशेषज्ञ विद्वान् वक्ताओं ने अपने वैदूष्यपूर्ण व्याख्यान द्वारा इस ग्रन्थ पर गहन विमर्श किया।


कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिकमंगलाचरण से था वैदिक शान्तिपाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ। श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने कार्यक्रम का संचालन किया एवं डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया । देश के
विविध प्रदेशों के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शोधसंस्थानों के आचार्यों, शोधच्छात्रों एवं संस्कृतानुरागी विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग लेते हुए इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को सफल बनाया।