Books Section Right (Home Page)

ब्रह्म-कर्म-रहस्य


पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने ब्रह्म-कर्म नामक लघुग्रन्थ में इन दो तत्त्वों को विवेचित किया है। यह ग्रन्थ भी गीताविज्ञान भाष्य का ही भाग है। शास्त्री जी के अनुसार आत्मा में हमेशा दो भावों की सत्ता होती हैं। वे हैं-ज्ञान और कर्म। आत्मा जानता है और करता है। सारा संसार जानना और करना इन दो धर्मों से युक्त है। न आत्मा शुद्ध ज्ञानमय है, न आत्मा शुद्ध कर् मय है अपितु उभयात्मक है। जो ज्ञान भाग है- वह ब्रह्म कहलाता है। वही गीता में अमृत शब्द से व्यवहृत किया गया है। एवं कर्म मृत्यु शब्द से कहा गया है। इस प्रकार आत्मप्रजापति का आधाभाग अमृत है और आधा भाग मर्त्य है। दोनों की समष्टि आत्मा है। आत्मा ब्रह्मकर्ममय है । ब्रह्मभाग के रूप में अव्यय, अक्षर, क्षर का वर्णन तथा कर्म के विविध आयामों का वर्णन इस ग्रन्थ में किया गया है।