राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श

प्रतिवेदन

श्रीशंकर शंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ अक्टूबर २०२३ को शारीरकविमर्श नामक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया। यह संगोष्ठी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान के आचार्य एवं श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के समन्वयक प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुयी जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. भगवत् शरण शुक्ल, पूर्वविभागाध्यक्ष, व्याकरण विभाग, संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. टी. वी. राघवाचार्युलु, आचार्य, आगम विभाग,  राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति तथा दो अन्य वक्ता के रूप में डॉ. राजीव लोचन शर्मा, विभागाध्यक्ष, न्याय विभाग, कुमार भास्कर वर्मा संस्कृत पुरातन अध्ययन विश्वविद्यालय, असम से एवं डॉ. रघु बी. राज्, सहायक आचार्य, अद्वैतवेदान्त विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, वेदव्यास परिसर, हिमाचल प्रदेश ने सहभागिता करते हुए निर्धारित विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किये।

पण्डित मधुसूदन ओझा विरचित शारीरकविमर्श ग्रन्थ के १४ वें प्रकरण को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी सुसंपन्न हुई। १४ वें प्रकरण का विषयवस्तु ग्रन्थकार ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है-

अनेक दार्शनिकों ने अपने सिद्धान्त के अनुसार प्रधान तत्त्व को निर्धारित करते हुए सृष्टि की व्याख्या की है। चार्वाकों ने लोक को, शैवदार्शनिकों ने शिव को, भागवतों ने प्रकृति सहित विष्णु को, वैशेषिक दार्शनिकों ने प्रजापति स्वरूप आत्मा को, सांख्य दार्शनिकों ने पुरुष को और वेदान्तियों ने ब्रह्म तत्त्व को सृष्टि का मूलकारण स्वीकार किया है-

            ‘लौकायतिका लोकं शैवाः शिवमिच्छयैव विश्वसृजम् ।

          भागवताः सप्रकृतिं विष्णुं पश्यन्ति विश्वकर्तारम् ॥

          वैशेषिकाः प्रजापतिमात्मानं पूरुषं सांख्यः ।

          अथ वेदान्ती पश्यति ब्रह्मैवात्मानमस्य विश्वस्य ॥

          तद्ब्रह्मणः स्वरूपं विज्ञातुं प्रयतमनानेन ।

          मीमांसासूत्राणां तात्पर्यं भूयसाऽलोच्यम् ॥’, शारीरकविमर्श, पृ.२५४

इस प्रकरण में १० उपशीर्षकों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर विचार किया गया है। जिसका संक्षिप्त विवरण अधोलिखित है-

  • वेदान्तदर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व : पूर्व-पश्चिम आदि दिशा से, देश से, संख्या से सीमित न होने वाला, हमेशा असीमितरूप में रहने वाला, भाव पदार्थ वाला, समग्र बलों का निधि,  अखण्डात्मा, परमेश्वर परात्पर चिदात्मा निर्विशेष तत्त्व है। वेदान्त के अनुसार यही आत्मतत्त्व है।
  • सांख्यदर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व : जब निर्विशेष तत्त्व माया बल से युक्त होता है और माया बल से आवृत हो जाता है, तब यह निर्विशेष पुरुष बन जाता है। यह पुरुष तीन प्रकार के हैं- महेश्वर, ईश्वर और जीव।
  • योगदर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व : क्लेश, कर्म, कर्मफल, कर्मवासना से रहित जो तत्त्व है, वह ईश्वर कहलाता है। एक ही ईश्वर जो अव्ययपुरुष के नाम से प्रसिद्ध है। उस अनन्त स्वरूप वाले अव्यय पुरुष का अंश जीव है। इस दर्शन में भी ईश्वर और जीव दो प्रधान तत्त्व हैं।
  • वेदान्तदर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व : निर्विशेष तत्त्व निर्गुण है। यहाँ सगुण की दृष्टि से विचार किया जा रहा है। अत एव वेदान्तदर्शन दो बार प्रयुक्त हुआ है। सगुण रूप वाले पुरुष तत्त्व के दो भेद हैं- ईश्वर और जीव। फिर जीवके दो भेद हैं- प्रत्यगात्मा और शारीरकात्मा ।
  • सांख्यदर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व: सांख्यदर्शन के अनुसार पुरुष तत्त्व ही आत्मा है। वह पुरुष अनेक है। सभी जीवों का जन्म एक समय में नहीं होता और न ही एक समय में जीव मृत्यु को प्राप्त होता है। इन तथ्यों के आधार पर पुरुष की अनेकता सिद्ध होती है। सांख्यदर्शन भी दो बार उद्धृत हुआ  है। प्रथम बार पुरुष तत्त्व को स्थापित किया गया और दूसरी बार पुरुष की अनेकता सिद्ध की गयी है।
  • भागवत दर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व : इस सिद्धान्त में विष्णु तत्त्व प्रधान हैं। इसी विष्णु को यज्ञप्रजापति कहा गया है। विष्णु के लक्षण में कहा गया है कि प्रकृति सहित विष्णु ही आत्मतत्त्व है। इस में शैवदर्शन के अनुसार शिव को आत्मतत्त्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। शिव अग्नि  और सोम दोनों तत्त्वों का द्योतक है।
  • चार्वाक दर्शन के अनुसार आत्मतत्त्व : विराट्प्रजापति ही आत्मतत्त्व है।
  • सभी दर्शनों के अनुसार आत्मतत्त्व :

(क)चार्वाकदर्शन में लोक को आत्मा स्वीकार किया गया है। लोक को विश्वप्रजापति कहा गया है। यह आत्मातीत है। यह चार्वाक दर्शन नास्तिक कहलाता है।

(ख) शैवदर्शन में विराट् प्रजापति आत्मा है। उपासक की दृष्टि से यह ईश्वर है। इस आत्मा की उपासना उपासक करते हैं।

(ग) वैष्णव भागवत दर्शन वाले विराट् प्रजापति को ही आत्मतत्त्व मानते हैं। यह विष्णु प्रकृति में स्थित रहता है।

(घ) वैशेषिक सत्यप्रजापति को आत्मतत्त्व मानते हैं।

(ङ) सांख्यदर्शन वाले कपिल यज्ञप्रजापति को आत्मतत्त्व मान्ते हैं। इस दर्शन में पुरुष और प्रकृति साथ साथ सृष्टि करते हैं।

(च) वेदान्तदर्शन निर्विशेष परात्पर को आत्मतत्त्व मानते हैं।

अपने उद्बोधन में प्रो. भगवत् शरण शुक्ल ने कहा कि शारीरकविमर्श के १४ वें प्रकरण में ईश्वर तत्त्व पर ही विचार किया गया है। न्यायकुसुमञ्जलि के आलोक में उन्होंने कहा कि सभी दार्शनिकों ने इस ईश्वर को भिन्न-भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हुए भी एक ही तत्त्व की व्याख्या की है।

प्रो. टी. वी. राघवाचार्युलु ने कहा कि निर्विशेष उपनिषद् दर्शन का चिन्तन है। दर्शन की भाषा में इसे शुद्धचैतन्य कहा जा सकता है।

डॉ. राजीव लोचन शर्मा ने इस प्रकरण का अक्षरशः व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें सांख्यदर्शन के प्रधान तत्त्व पुरुष पर विशेष विचार किया गया है।  जो पुर् अर्थात् शरीर पिण्ड  में निवास करता है, वह पुरुष कहलाता है। वही पुरुष महेश्वर, ईश्वर और जीव है।

डॉ. रघु बी. राज् ने कहा कि जिस  तत्त्व का कोई विशेषण न हो वह तत्त्व निर्विशेष है। इसी विषय का वेदान्त में शुद्धचैतन्य, ईश्वरचैतन्य और जीव चैतन्य के नाम से भी वर्णन किया गया है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि सभी दार्शनिकों ने आत्मा को स्वीकार किया है। परन्तु इस आत्मा के स्वरूप में मतभिन्नता प्रतिपादित की गयी। पं. ओझाजी ने सभी दार्शनिकों का विचार यहाँ प्रस्तुत किया है। ग्रन्थ के अन्त में इसका संकेत प्राप्त होता है। आत्मा की पाँच संस्थाओं के आधार पर दृष्टिकोण की भिन्नता है । वस्तुतः आत्मतत्त्व एक है।

संगोष्ठी का प्रारंभ वैदिक मंगलाचरण से तथा समापन वैदिक शान्तिपाठ से हुआ। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मीकान्त विमल ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने किया। देश के विविध विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों के आचार्यों एवं शोधछात्रों ने अपनी सहभागिता द्वारा इस संगोष्ठी को सफल बनाया।