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राष्ट्रीय संगोष्ठी-शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : परिस्तरण एवं पात्रासादन विमर्श -(शृंखला-३)


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ मार्च २०२६, मंगलवार को सायंकाल ५-७
बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘परिस्तरण एवं पात्रासादन’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया।
इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।

डॉ. ज्योत्स्ना द्विवेदी, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, उच्चशिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, शासकीय ठाकुर रणमत
सिंह महाविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश ने अपने व्याख्यान में कही कि शतपथब्राह्मण में ‘शूर्प-अग्निहोत्रहवणी,
स्फ्य-कपालानि, शम्या-कृष्णाजिन, उलूखल-मूसल, दृशत्-उपल’ ये दस पात्र हैं । ये दस यज्ञपात्र को यज्ञशाला
में रखे जाते हैं। इसी कर्म को पात्रासादन कहते हैं। इन पात्रों को युग्म रूप में रख कर पात्रासादन का विधान
किया जाता है। युग्म से ही सृष्टि होती है, ऐसी व्याख्या विज्ञानभाष्य में प्राप्त होता है। विज्ञानभाष्य में द्वन्द्व
शब्द की व्याख्याख्या करते हुए कहा गया है कि किसी कार्य को एक मनुष्य करता है और उसी कार्य को दो
मनुष्य भी करता है। जहाँ दो लोगों के द्वारा कार्य किया जाता है वहाँ शक्ति अधिक होती है। द्वन्द्व शब्द की
अभिनव व्याख्या पात्रासादन के क्रम में कि पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य में किया
है।

डॉ. सपना चन्देल, सहायक आचार्य, संस्कृत सान्ध्यकालीन अध्ययन विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय,
शिमला ने कही कि आध्यात्मिक जगत् का आधिदैविक जगत् के साथ संबन्ध ही यज्ञ है। जब जीवात्मा इश्वरात्मा
से संबन्ध बनाता है तभी यज्ञ चलता है। पात्रासादन कर्म में ये दश पात्र मध्यस्थता का प्रतिपादन करता है। कहाँ
यह मध्यस्थता है इस विषय में विज्ञानभाष्यकार लिखते हैं कि जीवात्मा और ईश्वरात्मा के बीच मध्यस्थभाव का
निर्वाह ये दस पात्र करते हैं।

डॉ. शिल्पा सिंह, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कही
कि यज्ञसृष्टि का मूल तत्त्व वाक् है। यज्ञ का पहला प्रवर्तक आपोमय परमेष्ठी है। सृष्टि दो प्रकार के हैं- अर्थसृष्टि
और शब्दसृष्टि । परमेष्ठितत्त्व में भृगु और अङ्गिरा रहते हैं। इन दोनों तत्त्वों का वर्णन ऋतशब्द से एवं सत्यशब्द
से विस्तारपूर्वक ग्रन्थकार ने किया है। अङ्गिरा की घनावस्था ही अग्नि है। अग्नि वाक् बन कर मुख में प्रवेश
करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार अग्नि ही शब्द की उत्पत्ति में प्रधान है।

डॉ. रञ्जन लता, सहायक आचार्य, संस्कृत एवं प्राकृत विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय,
गोरखपुर ने कही कि वैदिकविज्ञान में त्रैलोक्य के माध्यम से सृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। त्रैलोक्य में पृथ्वी
पहली स्थान पर है। पृथिवी पर माछन्द और अग्नि देवता हैं। अन्तरिक्ष दूसरा है। अन्तरिक्ष में प्रमाच्छ्न्द और
वायु देवता रहता है। तीसरा लोक द्युलोक है। द्युलोक में प्रतिमाच्छन्द और सूर्य देवता हैं। पात्रासादन कर्म में
दस पात्र होते हैं। दस छन्द भी हैं। छन्द से ही यह सृष्टि बनी है। परिस्तरणविध में पवित्र कुश को विस्तार पूर्वक
यज्ञशाला में रखा जाता है। पात्रासादनविध में यज्ञ के उपयुक्त दस पात्र रखे जाते हैं।

प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई
दिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि आज देश के प्रख्यात विदुषियों का सारगर्भित व्याख्यान था। ये
सभी विदुषी स्वागत के योग्य हैं। इन्होंने कठिन परिश्रम से शतपथब्राह्मण के विषय को उद्घाटित किया है। जिस
प्रकार प्रकृति में यज्ञ होता है उसी प्रकार भौतिक द्रव्य से हमलोग यज्ञ को करते हैं। इस प्रकरण में विराट् पुरुष
का, छन्द का और यज्ञ के पात्रों का वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्या की गयी है। सृष्टि के विषय में जो नवीन तथ्यों का
उपस्थापन है वही विज्ञान है।

डॉ. कमलराज उपाध्याय, वेदाचार्य, ब्रह्मचारी महानन्द वेदपाठशाला, बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश ने सस्वर वैदिक
मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी
डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य,
शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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