प्रतिवेदन
श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक २८ फरवरी २०२६, शनिवार को सायंकाल ५-
७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के द्वितीय ब्राह्मण का नाम ‘अपांप्रणयन’ है। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध
विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।
प्रो. गोपाल प्रसाद शर्मा, आचार्य, वेदविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने अपांप्रणयनविमर्श के क्रम में कहा कि गार्हपत्य अग्नि से उत्तरभाग में अध्वर्यु बैठता है। अध्वर्यु
अपने बायें हाथ पर प्रणीतापात्र को रख कर दायें हाथ से उस प्रणीतापात्र को जल से भरता है। इसी यज्ञीय
क्रिया को अपांप्रणयन कहते हैं।
डॉ. प्रचेतस्, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने कहा कि ब्रह्मप्रजापति
के प्राण, आप, वाक्, अन्न- अन्नाद ये चार मुख हैं । उनके दूसरे मुख को आपोमय कहा गया है। ब्रह्मा के इस
आपोमयमुख से लोकसृष्टि होती है। इस लोकसृष्टि करने के लिए प्रकृति में अपांप्रणयन यज्ञीय विधान होता
रहता है।
डॉ. रमाशंकर मिश्र, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्णि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन ने
कहा कि प्रजापति ही यज्ञ में प्रधानपुरुष हैं। ‘क’ इस शब्द का अर्थ जल है तथा ‘क’ इस पद का अर्थ प्रजापति
भी होता है। किस के साथ इस को जोड़ा जाय, इस के लिए ‘कस्मै युनक्ति’ इति मन्त्र की व्याख्यान से यह विषय
स्पष्ट होता है कि करूप प्रजापति ही है। शतपथब्राह्मण के विज्ञान भाष्य में प्रजापति का विस्तार से व्याख्या की
गयी है।
श्रीप्रणव कश्यप, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लक्ष्मणपुर परिसर ने कहा कि
योषाप्राण और वृषाप्राण इन दोनों प्राणों के संयोग से सृष्टि होती है।
प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई
दिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि शतपथब्राह्मण को आधार बना कर कार्यक्रम चल रहा है । पण्डित
मोतीलाल शास्त्री जी का विज्ञानभाष्य अत्यन्त विशद और सारगर्भित है। इस भाष्य में अनेक प्रतीकों का
विवरण ब्राह्मणग्रन्थ के प्रमाण से दृढ किया गया है। आज के सभी आचार्य स्तुति के योग्य हैं। जो शिक्षायतन में
आकर कृपा पूर्वक व्याख्यान करते हैं। ये सभी धन्यवाद के पात्र तथा श्रोता भी धन्यवाद के पात्र हैं।
डॉ. सत्यव्रत पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, रणवीर परिसर ने सस्वर
वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध
अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के
आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।