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राष्ट्रीय संगोष्ठी शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : वाक् संयमन एवं पात्रप्रतपन विमर्श (शृंखला-४)


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० अप्रैल २०२६, बृहस्पतिवार को सायंकाल
५-७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री
प्रणीत शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘वाक् संयमन एवं पात्रप्रतपन’ नामक प्रकरण पर विचार
किया गया। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।


डॉ. रामचन्द्र, अध्यक्ष, इन्स्टीट्युट आफ इन्टीग्रेटेड एण्ड आनर्स स्डडीज, संस्कृत विभाग, कुरुक्षेत्र
विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र ने कहा कि वाक् संयमन व्यावहारिक जीवन में अत्यन्त आवश्यक है। शतपथ ब्राह्मणग्रन्थ
में कहा गया है कि ‘वाग्वै यज्ञः’, इस के अनुसार यज्ञ से ही वाक् की उत्पत्ति होती है। वाक्पिण्ड ही यज्ञ का
परिचायक है। मनुष्यलोक में वाक् के बिना यज्ञ नहीं हो सकता है। देवता के स्तर पर एवं मनुष्य के स्तर पर
इन दोनों स्तरों में वाक् की ही प्रधानता है । शतपथ ब्राह्मणा में प्रजापति तत्त्व की प्रधानता है। यह प्रजापति
तीन रूपों में विभक्त है- आत्मा, ब्रह्म और यज्ञ । इन तीनों में आत्मा मुख्य है। इस आत्मा का पहला रूप ब्रह्म है।
जिसे मौलिकतत्त्व कहा गया है। इस आत्मा का दूसरा रूप यज्ञ है । यज्ञ यौगिकतत्त्व है। शतपथब्राह्मणाविज्ञानभाष्य पृ. २४६

डॉ. ओङ्कार यशवन्त सेलूकर, सहायक आचार्य, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने अपने व्याख्यान में कहा कि शतपथब्राह्मण के हिन्दी विज्ञानभाष्य में इन्द्र की
व्याख्या विविधि प्रकार से की गयी है। सूर्य के प्रकाश से इन्द्र तत्त्व का बोध होता है। पृथ्वी छोटी है और सूर्य
बडा है। इस दृष्टि से सूर्य का साम बड़ा है। पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक और द्युलोक ये तीनों मिल कर ही त्रैलोक्य
कहलाता है। पृथ्वीलोक पर जो इन्द्रप्राण है उसको वासव कहा जाता है। पृथ्वीलोक का देवता वसु है। वसु शब्द
से वासव शब्द बना है। अन्तरिक्षलोक का देवता रुद्र है, ‘मरुतो रुद्रपुत्रासः’ इस सिद्धान्त के अनुसार मरुत् ही
अन्तरिक्ष का देवता है। वही इन्द्र का रूप है। द्युलोक में मघवा प्रधान है। इन्द्र का नाम मघवा है। वेद में सूर्य का
वाचक इन्द्र है। द्युलोक में सर्वत्र इन्द्रप्राण की प्रधानता रहती है। वही पृ. २६४

श्रीरजनीश कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर
ने कहा कि वेदशब्द की व्युत्पत्ति के आधार पर नवीन अर्थ की परिकल्पना इस विज्ञानभाष्य में किया गया है।
‘विद्यते’ इस क्रियापद के द्वारा वर्तमानकाल का, ‘वेत्ति’ इस क्रियापद के द्वारा ज्ञान का, ‘विन्दते’ इस क्रियापद के
द्वारा बोध का अर्थ स्पष्ट होता है। इस परकार सत्ता, ज्ञान और उपलब्धि ये तीन अर्थ वेदशब्द के सिद्ध हो जाते
हैं। मन, प्राण और वाक् ये तीन तत्त्व वैदिकविज्ञान में मुख्य हैं। मन को ज्ञानप्रधान कहा गया है, प्राण को
क्रियाप्रधान कहा गया है और वाक् को अर्थप्रधान कहा गया है। फिर अमृत और मर्त्य के भेद से मन, प्राण और
वाक्, ये तीनों तत्त्वों को दो भागों में विभक्त किया गया है। अमृतभाग में ‘मन, प्राण और वाक्’ ये तीन तत्त्व
रहते हैं। मर्त्यभाग में ‘नाम, रूप और कर्म’ ये तीन तत्त्व हैं। वही पृ. २९९

डॉ. अंकित शाण्डिल्य, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय,
उज्जैन ने कहा कि शतपतब्राह्मणा हिन्दी विज्ञानभाष्य में ‘चतुष्टयं वा इदं सर्वम्’ इस वैदिकसिद्धान्त का अभिनव
व्याख्या की गयी है।। पूर्वरूप, उत्तररूप, सन्धि और सन्धान ये चार तत्त्वों का विश्लेषण किया गया है। ये चारों
तत्त्व मिलकर ही संहिता है। इस संहिता का विचार छान्दोग्य उपनिषत् मे भी प्राप्त होता है।

प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रथम इष्टि
व्रतोपायन है। व्रतग्रहण अर्थात् सत्यवचन का पालन ही व्रतोपायन है। यह व्रत तीन प्रकार के हैं- कायिक,
वाचिक और मानसिक। वाचिक व्रत को ही वाक्संयमन कहा गया है। धर्मशास्त्र के अनुसारं तिथिपरक जो व्रत
कहे गये हैं उस व्रत में वाक्संयमन कर्म को किया जाता है। दर्शपूर्णमास इष्टि में व्रतग्रहण से लेकर व्रतविसर्जन
तक सत्यवचन का पालन अत्यन्त आवश्यक है। आज का विचार इसी पर था। सभी विद्वानों न् ग्रन्थ को आधार
बना कर सारगर्भित व्याख्यान किया है, जिससे यह कार्यक्रम अत्यन्त सफल रहा।

श्रीसतीश कुमार पाण्डेय, वैदिक, आचार्य कक्षा, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर ने सस्वर
वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध
अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के
आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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