प्रतिवेदन
श्रीशंकर शिक्षायत वैदिक शोध संस्थान द्वारा ३०-३१ दिसम्बर २०२५, मंगलवार-बुधवार को श्री लाल बहादुर
शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वाचस्पति सभागार में कादम्बिनी : वृष्टिविज्ञान विमर्श
नामक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन प्रातः १० वादन से सायंकाल ५ बजे तक किया गया ।
उद्घाटनसत्र
इस सत्र में अध्यक्ष के रूप में विराजमान श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के माननीय
कुलपतिप्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि यह द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सफल हों एवं यह कादम्बिनी ग्रन्थ
समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी है। जल हम सभी के लिए अत्यन्त आवश्यक है। जल का मुख्य आधार वृष्टि ही
है। किस कारण से वृष्टि होती है और किस कारण से वृष्टि नहीं होती है, इसकी व्यापक व्याख्या इस ग्रन्थ में
मिलती है। वृष्टि का मूलकारण सूर्य है। सूर्य ही पृथ्वी से जल का शोषण करता है और सूर्य ही पृथ्वी पर जल की
वृष्टि करता है।
मुख्य अतिथि के रूप में श्रीराजेश्वर शुक्ल, प्रधान न्ययाधीश, पारिवारिक न्यायालय, गोरखपुर ने कहा कि प्राणी
के जीवनरक्षा के लिए वृष्टि अत्यन्त आवश्यक है। पर्यावरण की दृष्टि से जल का संरक्षण करना हम सब का
दायित्व है। इस ग्रन्थ के माध्यम से वृष्टि का अनुमान करना आसान होगा। इसीलिए यह ग्रन्थ पठनीय है।
प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई
दिल्ली ने विषयप्रवर्तन करते हुए कहा कि ग्रन्थ के मंगलाचरण में वृष्टिकारक देवताओं का निरूपण किया गया
है। वसव्य नामक देवता, शर्मण्य नामक देवता, सपीति नामक देवता और मरुत् नामक देवता ये चार
वृष्टिप्रदायक देवता हैं।
देवान् वसव्यान् शर्मण्यान् सपीतीन् मरुतोऽपि च ।
अभ्यर्थये वशे येषामेषा वृष्टिः प्रवर्तते ॥ कादम्बिनी पृष्ठ १, का. ६
द्वितीयसत्र
इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने की। उन्होंने कहा कि उदय काल में अथवा अस्त काल में सूर्य अथवा चन्द्रमा
शहद के रंग के रूप में प्रतीति हो, एवं प्रचण्ड हवा चले तो अतिवृष्टि होती है।
उदयेऽस्तमये वापि विवर्णोऽर्कोऽथवा शशी ।
मधुवर्णोऽतिवायुश्चेदतिवृष्टिर्भवेत्तदा ॥ वही, पृ. २१९, का.४२
प्रो. रामराज उपाध्याय, आचार्य, पौरोहित्य विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई
दिल्ली ने कहा कि आषाढमास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को वृष्टि करने वाले जितने शुभग्रह हैं यदि वे
दोषयुक्त हो जाते हैं तब अशुभ की अत्यधिक आशंका रहती है, यह ग्रन्थकार का अभिप्राय है।
गर्भाः पुष्टिकराः सर्वे सुयोगा विलयं गताः ।
आषाढ्यां तु विनष्टायां सर्वमेवाशुभं भवेत् ॥ वही, पृ. ८५, का.४१७
प्रो. हरीश, आचार्या, संस्कृत विभाग, किरोड़ी मल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कही कि
मार्गशीर्षमास में, पौषमास में, माघमास में बर्फ के द्वारा सूर्य और चन्द्रमा यदि मलिन प्रतीति हो तो वृष्टि के
समय आषाढमास के शुक्लपक्ष के सप्तमी तिथि से तेरह दिन पर्यन्त सुवृष्टि होगी।
तुषारमलिनौ ताम्रौ चन्द्रार्कौ मार्गतस्त्रये ।
आषाढशुक्लसप्तम्यारब्धे वृष्टिर्दिनत्रये ॥ तत्रैव पृष्ठम् २०, का. १९
डॉ. धनञ्जय मणि त्रिपाठी, सह आचार्य, संस्कृत विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली ने कहा कि
पौषमास में चन्द्रमा की गति के आधार पर मूलनक्षर से धरणीनक्षत्र तक मेघ का गर्भ रहता है। उस स्थिति में
सूर्य की गति से आर्द्रानक्षत्र से विशाखानक्षत्र तक मेघ बरसता है।
पौषेमूलाद् भरण्यन्तं चन्द्रचारेण गर्भति ।
आर्द्रादिभे विशाखान्ते सूर्यचारेण वर्षति ॥ वही, पृ. २४, का.४१
डॉ. रतीश कुमार झा, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, डॉ. जगन्नाथ मिश्र संस्कृत महाविद्यालय, मधुवनी,
बिहार ने कहा कि आषाढ शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार के दिन यदि आकाश मेघ रहित हो, बिजली और गर्जना
से रहित हो तो दो मास तक अतिवृष्टि होगी ।
आषाढे प्रथमे भौमे निरभ्रे यदि भास्करः।
न विद्युद्गर्जितं तर्हि द्वौ मासौ स्यादवर्षणम् ॥ वही, पृ. ८०, का.३५७
डॉ. माधव गोपाल, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यलय दिल्ली, ने कहा कि
भाद्रमास के शुक्लपक्ष के प्रतिपदा, सप्तमी, द्वादशी और पूर्णिमा के दिन पश्चिम में बादल के होने से अच्छी वृष्टि
होती है।
प्रतिपत् सप्तमी भाद्रे द्वादशी च त्रयोदशी ।
पूर्णिमा चासु वारुण्यां श्रितैर्मेघैः प्रवर्षणम् ॥ वही, पृ. ११४, का.५५२
डॉ. मणिशंकर द्विवेदी, अतिथि प्राध्यापक, संस्कृत विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली ने कहा कि
फाल्गुन मास में हमेशा आकाश में मेघ रहता हो और जल न बरसे तो गर्भ सम्पन्न समझना चाहिए। इस से
वर्षाकाल में वृष्टि अच्छी होगी ।
फाल्गुने नित्यमभ्रं स्यान्न तु पातयते जलम् ।
गर्भदोहसम्पत्तिं विद्याद् वृष्टिः शुभा भवेत् ॥ वही, पृ. ३९, का.१२५
तृतीयसत्र
प्रो. सुन्दर नारायण झा, आचार्य, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
ने सत्राध्यक्ष के रूप में अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यदि चैत्रमास में रेवतीनक्षत्र पर सूर्य हो
और तेरह दिन तक न मेघ हो, न हवा हो और न विद्युत् हो तो इस योग के कारण मेघ का गर्भ फलप्रद समझना
चाहिए।
रेवत्या अर्कभोग्येषु त्रयोदशदिनेष्वपि ।
यत्राभ्रं पवनो विद्युत् तत्र गर्भः शुभावहः ॥ वही, पृ. ४३, का.१५३
प्रो. महानन्द झा, आचार्य, न्याय विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने
कहा कि माघ मास में मूल नक्षत्र से भरणी नक्षत तक बिजली, गर्जना, पूर्व और उत्तर की वायु और मेघ के होने
से आर्द्रा पर सूर्य का निवास हो, विशाखा नक्षत्र पर जब सूर्य आते हैं, इतने समय तक वृष्टि होती है।
पौषारब्धोडुसंदोहे मूलाद्ये भरणीपरे ।
विद्युद्गर्जितवाताभ्रैरार्द्रार्कादिषु वृष्टयः॥ वही, पृ. ३२, का.८८
डॉ. कुलदीप कुमार, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला ने कहा
कि सूर्य अपने किरणों के द्वारा पृथ्वी से रस लेता है और अन्न के लिए एवं प्राणियों के लिए पृथ्वी पर फिर वही
सूर्य वर्षा करता है।
सरित्समुद्रभूमिस्थास्थापः प्राणिसम्भवाः ।
चतुःप्रकारा भगवानादत्ते सवितांशुभिः ॥ वही, पृ. ३, का.१२
डॉ प्रवेश व्यास, सहायक आचार्य, वास्तुशास्त्र विभाग, , श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में गर्जना होन् स्से म्घ का गर्भ नष्ट हो जाता है और मेघ के कड़कने से
वज्र सी आवाज होने से श्रावण और भाद्रपद में अनावृष्टि होती है।
गर्जितं ज्यैष्ठशुक्ले तु गर्भनाशाय जायते।
स्फूर्जथुश्चेत्तदा वृष्टिर्नास्ति श्रावणभाद्रयोः॥ वही, पृ. ६४, का.२६६
डॉ नवीन पाण्डेय, सहायक आचार्य, वास्तुशास्त्र विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने कहा कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में पञ्चमी तिथि को यदि मेघ गरजता है, और मेघ बरसता है
और पूरे दिन पूर्व दिशा वाली हवा चलती हो तो भाद्रमास में फसल महगी होगी ।
वैशाखे पञ्चमी शुक्ला यद् गर्जति वर्षति ।
पूर्ववातो द्नं यावद् भाद्रे धान्यमहार्घता ॥ वही, पृ. ५७, का.२४९
डॉ निगम पाण्डेय, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, धर्म समाज संस्कृत महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार ने
कहा कि मेष राशि पर शुक्र और राहु का साथ रहना दुर्भिक्ष का कारक है, मेष राशि पर ही सूर्य, मङ्गल, शनि
और शुक्र का होना भी दुर्भिक्ष का कारण है।
मेघे राहुश्च शुक्रश्च दुर्भिक्षाय सहस्थितौ ।
मेषेऽर्को मङ्गलः शुक्रः शनिर्दुर्भिक्षहेतवः॥ वही, पृ. २७८, का.२५९
डॉ कृष्ण कुमार भार्गव, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति ने कहा कि
सूर्य के किरणों में सात प्रकार के विकार होते हैं। इनके ये नाम हैं- सन्ध्या, कुण्डल, इन्द्रधनुष, दण्ड, त्रिशूल,
मत्स्य, और अमोघ।
सन्ध्या च कुण्डलं शक्रायुधं दण्डस्त्रिशूलकम् ।
मत्स्योऽमोघश्च सप्तैते विकारा रविरश्मिजाः॥ वही, पृ. १५४, का.१२६
समापनसत्र
प्रो. देवीप्रसाद त्रिपाठी, पूर्वकुलपति, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय ने इस सत्र की अध्यक्षाता करते हुए कहा
कि यह कादम्बिनी ग्रन्थ सर्वाथा लोकोपकारक है। इस ग्रन्थ में विविधविषय समाहित हैं। वृष्टिविज्ञा की समग्र
सामग्री यहाँ प्राप्त होती है। हमलोगों को इस ग्रन्थ के आधार पर प्रयोग क् माध्यम से वृष्टि का अनुमान करना
चाहिए।
डॉ. ममता त्रिपाठी, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, गार्गी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कही कि
श्रावण मास क् शुक्लपक्ष में यदि सिंहराशि के ऊपर सूर्य का संक्रमण होता है तो समुद्र के तट पर पूर्ण वर्षा
होगी, परन्तु देश केअन्य भागों में कहीं कहीं यह वर्षा होगी ।
श्रावणे शुक्लपक्षे तु सिंहसंक्रान्तिसंभवः।
समुद्रे पूर्णवृष्टिः स्यादन्यदेशे तु कुत्रचित् ॥ वही, पृ. १०८, का.५२१
डॉ. कामिनी, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, माता सुन्दरी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने
कही कि चन्द्रमा यदि रिहिणी के उत्तर भाग से रोहिणी के स्थान को स्पर्श करे तो वृष्टि करने वाला होता हुआ
भी वह अनेक उपद्रवों को करता है।
रोहिण्या उत्तरोऽपीन्दुर्यदि स्पृशति रोहिणीम् ।
तदोपसर्गान् बहुलान् कुरुते वृष्टिदोऽपि सः ॥ वही, पृ. ९२, का.४९७
डॉ. बालकराम सारस्वत, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति ने कहा
कि मेघ चार प्रकार के होते हैं- नाग नामक मेघ, पर्वत नामक मेघ, बृषभ नामक मेघ और अर्बुद नामक मेघ।
मेघश्चतुर्विधो नागः पर्वतो वृषभोऽर्बुदः।
नागशैलगजाभ्राणं योनिरेकैव तूदकम् ॥ वही, पृ. १३४, का.४१
डॉ. कौशलेन्द्र दास, सहायक आचार्य, दर्शन विभाग, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय,
जयपुर ने अपने व्याख्यान में कहा कि फाल्गुन मास में मूल नक्षत्र से लेकर भरणी नक्षत्र तक दिनों की परीक्षा
करनी चाहिए। यदि इन दिनों में जल बरसता है तो वर्षा ऋतु में भी जल बरसेगा। यदि इन् अदिनों में बर्षा नहीं
होती है तो बर्षा कल अमें भी वर्षा नहीं होगी।
मूलमादौ यमं चान्ते फाल्गुनेप्यवलोकयेत् ।
सजला निर्जला ज्ञेया निर्जला सजला भवेत् ॥ वही, पृ. ४०, का.१४८
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ दीपप्रज्वलन एवं वैदिक मंगलाचरण से एवं समापन शान्तिपाठ से
हुआ। इसमें लगभग १०० विद्वानों ने उत्साहपूर्वक भाग ग्रहण किया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में ३० विद्वानों के
द्वारा शोधपत्र का वाचन किया गया। यह कार्यक्रम में आनलाईन के माध्यम से भी विद्वानों का शोधपत्र प्रस्तुत
किया गया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी
कान्त विमल ने किया ।