राष्ट्रीय संगोष्ठी-कादम्बिनी : प्रकीर्णाधिकार विमर्श (शृंखला-११)

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० नवम्बर २०२५, रविवार को सायंकाल ५-
७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत
कादम्बिनी नामक ग्रन्थ के प्रकीर्णाधिकार के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित
की गई थी।

डॉ. नवीन शर्मा, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, महर्षि वाल्मिकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल,
हरियाणा ने अपने वक्तव्य में कहा कि राहु से सातवें स्थान पर मंगल हो, मंगल से पाँचवें स्थान पर बुध हो और
बुध से चौथे स्थान पर चन्द्रमा हो, तो इस स्थिति में भूकम्प होता है। भूकम्प का यह लक्षण ऐन्द्र भूकम्प से
संबन्धित है। भूकम्प के कारक तत्त्वों में इन्द्र, वरुण, वायु और अग्नि हैं। दिन के प्रथम भाग में वायु रहता है, दिन
के दूसरे भाग में अग्नि रहता है, दिन के तीसरे भाग में इन्द्र रहता है और दिन के चौथे भाग में वरुण रहता है।
इन चारों का एक मण्डल बनता है। इन चारों मण्डलों के आधार पर भूकम्प का विचार किया जाता है।

तमसः सप्तमे भौमे भौमात् पञ्चमगे बुधे ।
बुधाच्चतुष्टये चन्द्रे भूकम्प इति दिग्विधिः ॥
भागस्तुर्यस्तृतीयोऽह्नो द्वितीयः प्रथमः क्रमात् ।
वरुणेन्द्राग्निवायूनां मण्डलानि प्रचक्षते ॥ कादम्बिनी पृ. १८८, कारिका ३८९-३९०

डॉ. विजय कुमार, सहायक आचार्य, वास्तु विभाग, महर्णि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय,
उज्जैन, ने अपने व्याख्यान में कहा कि उल्का, निर्घात, भूकम्प, दिग्दाह, आकाशनगर, रज, ग्रहण और महावात ये
आठ मण्डल हैं । जिनके आधार पर भूकम्प का फल निर्धारित होता है। चार पक्षों में अर्थात् २ मासों में वायु का
प्रभाव रहता है, तीन पक्षों में अर्थात् ४५ दिनों तक अग्नि का प्रभाव रहता है, एक सप्ताह तक इन्द्र का प्रभाव
रहता है और वरुण का प्रभाव तत्काल ही होता है।

उल्कानिर्घातभूकम्पा दइदाहः खपुरं रजः।
उपरागो महावातः फलदा मण्डलाश्रयात् ॥

चतुर्भिरनिलः पक्षेः पाकमेति त्रिभिः शिखी ।
सप्ताहाद्वासवः सद्यो वरुणोऽनुक्तकालके ॥ वही, पृ. २०९, कारिका ४०४-४०५

डॉ. पुनीता गुप्ता, सहायिका आचार्या, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, रणवीर
परिसर, जम्मू ने कही कि सूर्य अपनी किरणों के द्वारा समुद्र से जल ग्रहण करता है और मेघ को समर्पित करता
है। वायु के द्वारा प्रेरित यह मेघ अपने समय के अनुसार और जिस किसी स्थान पर वृष्टि करता है। इस
वृष्टिविद्या को जानने के लिए अनेक स्वरूप वाले निमित्त शास्त्र हैं। जिसके पार्थिव, आन्तरिक्ष, दिव्य और मिश्र
ये नाम हैं। इस प्रकार निमित्त चार प्रकार के हैं। ग्रन्थ के आगे के भाग में इस का निरूपण किया जायेगा ।

हस्ती समुद्रादादाय जलमभ्राय यच्छति ।
वातप्रेरितमभ्रं तु काले स्थानेऽभिवर्षति ॥
तज्झानाय निमित्तं स्याद्बहुभेदं चतुर्विधम् ।
पार्थिवं चान्तरिक्षं च दिव्यं मिश्रमिति क्रमात् ॥ वही,, पृ. २११, कारिका १-२

डॉ. सत्य स्वरूप बाजपेयी, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, एकलव्य
परिसर ने अपने व्याख्यान देते हुए कहा कि वर्षाऋतु में वर्षा से संबन्धित प्रश्न करने के समय यदि प्रश्नलग्न में
जलराशि हो और जल संबन्धी वारुणनक्षत्र हो तथा शुभग्रहों के द्वारा देखे जाने वाले केन्द्रस्थान में चन्द्रमा या
शुक्र हो, तो शीघ्र ही वर्षा होगी ।

वर्षर्तौ वर्षणप्रश्ने तोयलग्नेऽथ तोयभे ।
केन्द्रे शुभेक्षिते चन्द्रः शुक्रो वा वर्षति द्रुतम् ॥
लग्ने वा जलराशिस्थे चन्द्रे वा स्याद्बहूदकम् ।
प्रश्नलग्ने शिलावृष्टिः शनिज्ञशशिभिः स्थितैः ॥ तत्रैव, पृ. २११, कारिका ८-९

प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने कहा कि भूकम्प चार प्रकार के होते हैं। इन्द्र के संबन्ध से ऐन्द्रभूकम्प, वरुण के संबन्ध से
वारुणभूकम्प, वायु के संबन्ध से वायव्य भूकम्प और अग्नि के संबन्ध से आग्नेयभूकम्प होता है।

श्रीकरण वशिष्ठ, शोधछात्र, संस्कृत विभाग, जमिया मिल्लिया इस्लामिया, ने सस्वर वैदिक
मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी
डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य,
शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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