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राष्ट्रीय संगोष्ठी– शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : व्रतोपायनविमर्श – (शृंखला-१)

प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ जनवरी २०२६, शनिवार को सायंकाल ५-
७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के प्रथम ब्राह्मण का नाम ‘व्रतोपायन’ है। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध
विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।

प्रो. रामानुज उपाध्याय, आचार्य, वेदविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने व्रतोपायन विषय पर व्याख्यान करते हुए कहा कि इस प्रकरण में सर्वप्रथम आचमन पर विचार
किया गया है। शतपथब्राह्मण का वाक्य है.‘मेध्या वा आपः’। विज्ञानभाष्य में ‘आपः’ शब्द से सोमतत्त्व का ग्रहण
किया गया है। सोम की आहुति से ही सूर्य प्रकाशित होता है। अग्निमय सूर्य और अन्नमय चन्द्रमा ये दोनों वर्ण में
काले हैं। इन दोनों तत्त्वों के संयोग से प्रकाश निकलता है। सोम के विषय में ऋग्वेद का यह मन्त्र प्रमाण है-‘त्वं
ज्योतिषा वितमो ववर्थ’ (१.९१.२२)

डॉ. आशीष मिश्र, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, त्रिपुरा-परिसर, ने कहा
कि यज्ञ से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ से यजमान स्वर्ग जाता है। इस यज्ञ का
सौरसंवत्सरमण्डल से संबन्ध है। इस ज्योतिष्टोम यज्ञ के द्वारा यजमान पार्थिव आत्मा को छोड़कर जन्म-मरण
और वृद्धावस्था से मुक्त होकर सौरसंवत्सर में प्रतिष्ठित होता है। सौरसंवत्सर अग्नि चार प्रकार के हैं- अहोरात्र,
पक्ष (शुक्ल-कृष्ण), ऋतु और अयन। सौरसंवत्सर अग्नि अहोरात्र की अपेक्षा से ७२० (दिन-रात) के रूप में
विभक्त हैं। पक्ष की दृष्टि से २४ भागों में विभक्त है, क्योंकि एक मास में २ पक्ष होते हैं । इस प्रकार १२ मास में
२४ पक्ष होते हैं। ऋतु के अनुसार इसके ६ भाग हैं। अयन की दृष्टि से यह संवत्सर अग्नि दो प्रकार के हैं-
उत्तरायण और दक्षिणायन। अयन के बाद यजमान संवत्सरमण्डल में गमन करता है।

डॉ. पतञ्जलि कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्णि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक
विश्वविद्यालय, उज्जैन ने अपने व्याख्यान में कहा कि प्रजापति के दो रूप हैं- सत्य और विश्व। सत्य शब्द से अमृत
का बोध होता है और विश्वशब्द से मृत क अबोध होता है। अमृत अविनाशी और मृत विनाशी है। सत्यतत्त्व पूर्ण,शान्त, नित्य, आनन्दपूर्ण है। विश्व तत्त्व अपूर्ण, अशान्त, अनित्य, और दुःखरूप है। ये दोनों अमृत और मृत
अन्धकार और प्रकाश की तरह परस्पर विरुद्ध हैं फिर भी ये दोनों तत्त्व साथ साथ रहते हैं। अमृत के बिना मृत
नहीं रह सकता है और मृत के बिना अमृत नहीं रह सकता है। ये दोनों परस्पर भाव में ही रहते हैं। जब अग्नि के
साथ जल का संबन्ध है। तब जल गर्म हो जाता है। जबकि ये दोनों परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाले हैं। इसी दृष्टि को
ध्यान में रखते हुए शतपथब्राह्मण में कहा गया है कि ‘अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम्, १०.३.६.४’

डॉ. धर्मेन्द्र कुमार पाठक, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर ने कहा
कि दर्शेष्टि याग अमावस्या के बाद होता है और पूर्णमासेष्टि याग पूर्णिमा के बाद होता है। शुक्लपक्ष के प्रतिपदा
तिथि को दर्शेष्टि याग होता है। कृष्णपक्ष के प्रतिपदा तिथि को पूर्णमासेष्टि याग होता है। इस का अर्थ यह हुआ
कि इष्टि याग प्रतिपदा तिथि को ही होता है। अमावास्या को ही यज्ञ से संबन्धित व्रतोपायन आदि नियमों का
पालन किया जाता है। इस दृष्टि से दर्शेष्टि को अमावास्येष्टि इस नाम से भी प्रयोग किया जाता है।

प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि आज के सभी वक्ता विद्वानों का व्याख्यान सुस्पष्ट और
सारगर्भित था। शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के सभी वैदिक विद्वानों का व्याख्यन
होगा । इस वर्ष शतपथब्राह्मण के प्रत्येक ब्राह्मण ग्रन्थों को आधार बना कर विषय का विश्लेषण किया जायेगा ।
आज के विषय में प्रजापति एक मुख्य विषय है। इस प्रजापति ने संपूर्ण सृष्टि की रचना की। इस सिद्धान्त के
अनुसार प्रजापति के दो रूप हैं- सत्य और विश्व। सत्य शाब्द से आत्मा का और विश्व शब्द से शरीर का ग्रहण
होता है। इस सृष्टि के अव्यय, अक्षर, क्षर और परात्पर ये चार प्रधान तत्त्व हैं। ये चारॊ मिलकर ही षोडशी
प्रजापति कहलाते हैं। अव्यय, अक्षर और क्षर की पाँच कलाये हैं। सोलहवां तत्त्व परात्पर है। इस सृष्टि की यह
संरचना अन्य दर्शन में नहीं पाया जाता है। यही वैदिकविज्ञान की विशेषता है।


श्रीमान् अनिकेत त्रिपाठी , शोधछात्र, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, त्रिपुरा ने ने सस्वर वैदिक
मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी
डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य,
शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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