राष्ट्रीय संगोष्ठी-कादम्बिनी : प्रकीर्णाधिकार विमर्श (शृंखला-१०)
प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ अक्टूबर, शुक्रवार २०२५ को सायंकाल ५-७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीतकादम्बिनी नामक ग्रन्थ के प्रकीर्णाधिकार के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजितकी गई थी। प्रो. अमित कुमार शुक्ल, आचार्यः, ज्योतिष विभाग, संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अपने मुख्यअतिथि के रूप में वक्तव्य देते हुए कहा कि जिस मास में चमकते हुए साफ स्फटिक मणि के समान आभा वालीतारा की पंक्ति चमकती हुई दिखाई दे तो उस मास में अच्छी वृष्टि के लिए मेघ आता ही आता है। विमल-स्फटिकाभासा रोचते तारकावली ।तत्र मासे सुभिक्षाय मेघो नूनं प्रवर्षति ॥ कादम्बिनी पृ. १८७, कारिका ३७७ सात रात तक जल की आभा वाली ताराओं की पंक्ति जब दिखाई देती है तो इससे अच्छी वृष्टि होती है। वृष्टि केलिए तारा का दर्शन प्रधान है और उस तारा के रंग के आधार पर वृष्टि की भविष्यवाणी करना एक बड़ा विषयहै। इस ग्रन्थ में अनेक ऐसे विषय समाहित हैं। सप्तरात्रं जलाधारा भासते तारकावली ।तदावश्यं सुभिक्षाय मेघस्तत्र प्रवर्षति ॥ वही, कारिका ३७८ डॉ. प्रवेश व्यास, सहायक आचार्य, वास्तुशास्त्र विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने अपने वक्तव्य में कहा कि कादम्बिनी ग्रन्थ के इस प्रकरण में केतुओं का विस्तार से वर्णन हुआ है।इन केतुओं में संवर्तकेतु नाम वाला १००८ वर्ष तक प्रवास में रह कर पश्चिम दिशा में सायंकाल के समय आकाशके तीन अंशो का आक्रमण कर के दिखाई देता है। संवर्तः प्रोष्य वर्षाणाम् अष्टोत्तर-सहस्रकम् ।पश्चिमे दृश्यते सायम् आक्रम्य त्र्यंशकं दिवि ॥ वही, कारिका ३६३ धूम्र, तामवर्ण के शूल जैसी कान्ति वाला, रूखी शिखा वाला यह केतु भी रात्रि में जितने मुहूर्त तक दिखाई देताहै उतने ही वर्ष तक वह अनिष्ट करता है। ध्रूम-ताम्राणु-शूलाभ-रूक्ष-चूड़ः स यावतः ।मुहूर्तान्निशि दृश्यते तावद्वर्षाण्यनिष्टकृत् ॥ वही, कारिका ३६४ डॉ. ज्योति प्रसाद दाश, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, सदाशिव परिसर, नेकहा कि यदि वसाकेतु अत्यन्त स्निग्ध हो, अच्छी वृष्टि वाला हो और महामारी को लाने वाला हो, तो वह १३०वर्ष तक प्रवासित रहता हुआ उत्तरदिशा की ओर लम्बा होता हुआ उदय करता है। वसाकेतु के समान अस्थिकेतुभी होता है। यदि वह अस्थिकेतु रूक्ष हो तो इस से भुखमरी होते है। पश्चिम दिशा में वसाकेतु की समानता कादीखा हुआ शस्त्रकेतु महामारी को लाता है। वसाकेतुर्महान् स्निग्ध-सुभिक्ष-मरकप्रदः।त्रिंशद्वर्षशतं प्रोष्य परोदप्युदगा यतः ॥ वही, कारिका ३५०वासाकेतुसमो रूक्षोऽस्थिकेतुः क्षुद्भयावहः।प्राच्यां वसासमो दृष्टः शस्त्रकेतुर्मरप्रदः ॥ वही, कारिका ३५१ डॉ. चन्द्र कान्त, सहायक आचार्य, ज्योतिष विभाग, महर्षि वाल्मिकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल, हरियाणा नेकहा कि औद्दालककेतु और श्वेतकेतु इन दोनों का अग्रभाग दक्षिण दिशा की ओर होता है और अर्धरात्रि में इनकाउदय होता है। ककेतु पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा में एक साथ युगाकरा से उदय होता है। औद्दालक और श्वेतकेतुसात रात तक स्निग्ध दिखाई देते हैं। ककेतु कभी अधिक भी दिखता रहता है। वे दोनों स्निग्ध होने पर दस वर्षतक शुभ फल देते हैं और रूक्ष होने पर शस्त्र आदि से दुःख देते हैं। औद्दालकः श्वेतकेतुर्याम्याग्रोऽर्धनिशोदयः ।प्राच्याम् प्रतीच्यां युगपत् कसंज्ञोऽन्यो युगाकृतिः ॥स्निग्धावुभौ सप्तरात्रं दृश्येते काऽधिकं क्वचित् ।शुभदो दशवर्षाणि रूक्षौ शस्त्रदिनार्तिदौ ॥ वही, कारिका ३३९-३४० प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने कहा कि इस प्रकीर्णाधिकार में केतूग्रहों पर विशेष विचार व्यापक दृष्टि से किया गया है। कभीकभी आकाश में विकीर्ण तेज वाले स्वप्राकाशमय पिण्ड दोखाई दिया करते हैं, ये ही पिण्ड केतु कहलाते हैं। विकीर्णतेजसः केचित् स्वप्रकाशमया दिवि ।दृश्यन्ते जातुचित् पिण्डापिण्डास्ते केतवो मताः।। वही, कारिका २९६ डॉ. मधुसूदन शर्मा, अतिथि प्राध्यापक, पौरोहित्य विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृतविश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकरशिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेकप्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों नेउत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।