राष्ट्रीय संगोष्ठी यज्ञसरस्वती विमर्श 

वाराणसी, २९ नवम्बर २०२५, शनिवार प्रतिवेदन  श्री शंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली एवं  ज्ञानप्रवाह सांस्कृतिक अध्ययन शोध केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक २९ नवम्बर २०२५, शनिवार को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन काशी के ज्ञानप्रवाह के सभागार में किया गया। उद्घाटन सत्र में प्रो. विजय शंकर शुक्ल, पूर्व निदेशक, इन्दिरा गाँधी कला केन्द्र, वाराणसी कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि पण्डित मधुसूदन ओझाजी का यज्ञसरस्वती यज्ञीयदृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वैदिक विज्ञान में सदसद्वाद, रजोवाद, आवरणवाद  आदि सिद्धान्त सृष्टिप्रक्रिया विमर्श में उल्लेखनीय स्थान रखता है।  प्रो. शरदिन्दु तिवारी, आचार्य, संस्कृत विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणासी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपना व्याख्यान दिया । उन्होंने कहा कि श्री शंकर शिक्षायतन संगोष्ठी के माध्यम से वैदिक विज्ञान के प्रचार और प्रसार में निरन्तर लगा हुआ है। ऋषिसम्मान से विद्वानों को सम्मानित करता है। शिक्षायतन की शैक्षणिक गतिविधि समादर के योग्य है। प्रो. चन्द्रकान्त राय, भूतपूर्व आचार्या, आर्य कन्या पी जी महाविद्यालय, वाराणसी ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कही कि पञ्चमहायज्ञ एक सामाजिक व्यवस्था है जो सनातन परम्परा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । इस यज्ञ के माध्यम से सामाजिक संरचना सुदृढ होता है। प्रो. श्रीकिशोर मिश्र, पूर्वसंकाय प्रमुख, कलासंकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने समागत अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पण्डित मधुसूदन ओझा का यह यज्ञसरस्वती ग्रन्थ पठनीय है। शुक्लयजुर्वेद के यज्ञक्रम की उत्तम व्याख्या  यज्ञसरस्वती है। श्री शंकर शिक्षायतन के प्रतिनिधि डॉ. लक्ष्मीकान्त विमल ने विषयप्रवर्तन के क्रम में कहा कि ब्रह्मविज्ञान दो प्रकार के हैं। एक वेदविज्ञान दूसरा यज्ञविज्ञान । वेदविज्ञान से मौलिकतत्त्व का विचार होता है। यज्ञविज्ञान से यौगिकतत्त्व का विचार होता है। समापनसत्र में प्रो. राममूर्ति शर्मा, पूर्व आचार्य, संस्कृत विभाग, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी, ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन कहा कि  एक तत्त्व का बोध ज्ञान है और अनेक  तत्त्व का बोध  विज्ञान है।  जिस प्रकार मिट्टी ज्ञान है और मिट्टी  से बना हुआ सभी पात्र विज्ञान हैं। प्रो. गोपाल प्रसाद शर्मा, आचार्य, वेदविभाग, श्री लाल बाहादुर शास्त्रि राष्ट्रिय संस्कृत विश्वविद्यालय,  ने मुख्य अतिथि के रूप में यज्ञ के महत्त्व को उद्घाटित किया । उन्होंने कहा कि व्याकरण से वैदिकशब्दों का अर्थ नहीं किया जा सकता है। इस संगोष्ठे में काशी हिन्दू विश्वविद्यलय के  प्रो. अभिमन्यु, डॉ. ठाकुर शिवलोचन शाण्डिल्य,  डॉ. राज किशोर आर्य, संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यलय के, संस्कृत पाठशाला के अनेक छात्रों ने भाग ग्रहण किया।  प्रो. हनुमान मिश्र, डॉ. गंगाधर मिश्र, डॉ. पवन कुमार पाण्डेय आदि अनेक विद्वांनों ने शोधपत्र का  वाचन किया । संगोष्ठी का संचालन काशी हिन्दू विश्वविद्यलय के डॉ. शिल्पा सिंह ने किया।

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