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राष्ट्रीय संगोष्ठी शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : हविर्ग्रहण विमर्श (शृंखला-५)


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० मई २०२६, शनिवार को सायंकाल ५-७
बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘हविर्ग्रहण’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया। इस ब्राह्मणग्रन्थ के
विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।

डॉ. लक्ष्मी मिश्रा, सह आचार्या, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने विषय को उद्घाटित
करते हुए कहा कि विज्ञानभाष्य में अनेक विषय समाहित हैं। विश्व की उत्पत्ति का मूल यज्ञ है। ‘पाङ्क्तो वै यज्ञः’
इस सिद्धान्त के आधार पर संपूर्ण तत्त्वों को पञ्चात्मक माना गया है। पाङ्क्त शब्द का अर्थ है- पाँच यज्ञों का
समूह, वह समूह एक होकर के पाङ्क्त शब्द के द्वारा व्यवहृत होता है। मनुष्य का सम्पूर्णं शरीर पाँच पर्व वाला
है। उस में मस्तक पहला पर्व, कण्ठ से मल द्वार तक दूसरा पर्व, श्रोणि से जाँघ की हड्डी तक तीसरा पर्व, जाँघ की
हड्डी से पाद के मूल तक चौथा पर्व, पाँचवां पर्व पाद है। इन सभी पर्वों के नाम क्रमश हैं- पार्श्वकपाल,
जातूकास्थि, शङ्खास्थि, गण्डास्थि, अघोहन्वस्थि। (शतपथब्राह्मणम पृ. ३९६)


डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी, सहायक आचार्य, संस्कृत एवं प्राकृत विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर
विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने विषय पर बोलते हुए कहा कि नक्षत्रमूला अदिति यह विषय अत्यधिक विस्तृत है।
इसमें पृथिवी के परिभ्रमण वृत्त को क्रान्तिवृत्त और चन्द्रमा के परिभ्रमण वृत्त को दक्षवृत्त कहा जाता है। चन्द्रमा
सत्ताईस नक्षत्रों के साथ संबन्ध स्थापित कर के दक्षवृत्त के सत्ताईस विभाग हो जाते हैं। अत एव कन्या रूप वाले
सोम सत्ताईस भाग में विभक्त हो जाते हैं। सूर्य कश्यप रूप में बदल कर प्रजाओं की सृष्टि करता है। सूर्य से
निकलता हुआ सौरप्राण ही कश्यप कहलाता है। सूर्य और चन्द्रमा के आधार पर ही समस्त सृष्टि व्याख्यायित है।
इस प्रकार के वैज्ञानिक व्याख्या से परिपूर्ण यह शातपथब्राह्मण हिन्दी विज्ञानभाष्य है। (वही पृ. ४०७)


डॉ. जय साहा, सहायक आचार्या, संस्कृत विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा ने अपना सारगर्भित
व्याख्यान देते हुए कही कि इस भाष्य में विविध विषयों का प्रतिपादन वैज्ञानिक रूप में किया गया है। उन
विषयों में हविर्ग्रहण का विषय इस प्रकार है- अग्निहोत्र के बाद हविर्यज्ञ होता है। हविर्यज्ञ के बाद सोमयज्ञ होता
है। सोमयज्ञ का ही दूसरा नाम ज्योतिष्टोमयज्ञ है। इन यज्ञों में हविर्यज्ञ प्रधान है। हविर्यज्ञ पार्थिवयज्ञ की
प्रतिकृति है। पार्थिवयज्ञ में अन्न और सोम की आहुति दी जाती है। पृथ्वी दो रूपों में विभक्त है। पृथिवी का एक
भाग सूर्य की ओर झुकी हुई है। दूसरा भाग सूर्य से विपरीत दिशा की ओर झुकी हुई है। सूर्य से विपरीत भाग
वाले पृथिवी गार्हपत्यकुण्डाग्नि है । इस कुण्ड में जो अग्नि रहता है वह गार्हपत्याग्नि कहलाता है। सूर्य की दिशा में
जो भाग है वह आहवनीयकुण्ड है, उसी को आहवनीय अग्नि कहते हैं। पृथिवी के बीच का भाग वेदी है, पृथिवी
का दक्षिणभाग दक्षिणाग्निकुण्ड है, उसी को दक्षिणाग्नि कहते हैं। दक्षिणाग्नि का ही दूसरा नाम श्रपणाग्नि भी है।
(वही पृ. ३६८)

डॉ. अंकुर वत्स, सहायका आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, रघुनाथकीर्ति परिसर ने
विषय को प्रतिपादित करते हुए कहा कि हविर्ग्रहण शकट नामक अस्त्र से होता है। यदि शकट न हो तो
‘स्फ्योपहिता इडापात्री’ इस अस्त्र से हविर्ग्रहण करना चाहिए। जिस प्रकार यज्ञ का प्रकृतिस्वरूप पुरुष यज्ञ है,
उसी प्रकार प्रकृतिस्वरूप शकट भी यज्ञ है। प्रकृतियज्ञ में दूसरे दूसरे अनेक पदार्थ संकलित किये जाते हैं। उन
पदार्थों में अग्नि है, वेदि है और हविर्धान है। हविर्वेदि का संबन्ध दर्शपूर्णमासेष्टि से है। महावेदि का ज्योतिष्टोम से
संबन्ध है। संपूर्ण भूमि गार्हपत्याग्निकुण्ड है। भूपृष्ठ से सूर्य का प्रदेश महावेदि है। सप्तदश स्तोम वाला अहर्गण
उत्तरवेदि आहवनीय है। एकविंश सूर्य यूप है। सूर्यरूप यूप के नीचले भाग में सप्तदश स्तोम आहवनीय है।
‘आहूयते यत्र सोमः’ इति व्युपत्ति से आहवनीय होता है । (वही पृ. ३२५)

श्रीअभिषेक दुबे, वैदिक, आचार्य कक्षा, वेदविभाग, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय,
दरभंगा ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन जामिया मिल्लिया इस्लामिया के
अतिथि प्राध्यापक डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और
महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर
गोष्ठी को सफल बनाया।

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