प्रतिवेदन
श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक २९ जून २०२६, सोमवार को सायंकाल ५-७
बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘प्रोक्षणकर्म’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया। इस ब्राह्मणग्रन्थ
के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।
डॉ. प्रवीण कुमार द्विवेदी, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, प्रो.राजेन्द्र सिंह (रज्जूभय्या)
विश्वविद्यालय, प्रयागराज, ने व्याख्यान देते हुए कहा कि संकुचित भाव ही अल्पता का द्योतक होने से दुःख का
कारण माना जाता है। ऐसी दृष्टि यज्ञविरोधी माना जाता है। इसे दूर करने के लिए ‘देवीरापो’ इति मन्त्र को
बोलता हुआ यजमान वामहस्त में पात्र को लेकर दक्षिण दिशा से ऊपर की ओर प्रोक्षण कर्म करता है। भूमण्डल
पर जो जल है वह जल दुषित है। अन्तरिक्ष लोक में रहने वाला जल इन्द्ररूप से सौरप्राणमय बनता हुआ वायु के
साथ संबन्ध होने से शुद्ध और पवित्र माना जाता है। इस प्रकार के विवेचन से सिद्ध होता है कि भूपिण्ड पर जो
जल है वह जल सर्वथा दुषित नहीं है अपितु अन्तरिक्ष में रहने वाला जल सर्वथा शुद्ध है। यहाँ अन्तरिक्ष के जल
की अपेक्षा से पृथ्वीलोक पर जल का विचार किया गया है।। यज्ञ में रखा हुआ प्रोक्षणीपात्र से जल को ऊपर उठा
कर प्रोक्षणकर्म किया जाता है। (शतपथब्राह्मण पृ. ४४८)
डॉ. राजकिशोर आर्य, सहायक आचार्य, आयुर्वेद संकाय संहिता एवं संस्कृत विभाग, काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि अव्यय तत्त्व के पाँच कला हैं- आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् । इनमें
आनन्द और विज्ञान मन के साथ जुड़ कर विद्या नाम से जाना जाता है। विद्या का नाम ही ब्रह्म है। अविद्या का
नाम कर्म है। अव्ययपुरुष सृष्टि का आधार है। (वही पृ. ४०७)
डॉ. नीरजा कुमारी, सहायक आचार्या, संस्कृत विभाग, महन्त दर्शनदास महिला महाविद्यालय,
मुजफ्फरपुर, बिहार ने कही कि शतपथब्राह्मणहिन्दीविज्ञानभाष्य में प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान
इन प्राणों में बीच वाला प्राण व्यान है। व्यान को यज्ञीयदृष्टि से उपांशुसवन नाम दिया गया है। अपान नामक
प्राण अन्तर्याम कहलाता है, प्राण का नाम उपांशु है। उपांशुसवन एक स्थिर शिला है। प्राण और अपान ये दोनों पत्थर हैं। इन दोनों के सहयोग से व्यानशिला पर उपांश्वन्तर्याम का घर्षण व्यापार होता है। एक भाग से प्राण
आता है और दूसरे भाग से अपान आता है, बीच में स्थित व्यान पर घर्षण कर्म किया जाता है। (वही पृ. ४३१)
डॉ. प्रकाश रञ्जन मिश्र, सहायक आचार्य, वेदकर्मकाण्ड पौरोहित्य विभाग, श्रीरामसुन्दर संस्कृत
विश्वविद्या प्रतिष्ठान आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, दरभङ्गा ने कहा कि यज्ञियपदार्थो में प्रविष्ट आसुरभाव को
दूर करने के लिए पवित्रीकरण कर्म को किया जाता है। एक कुश के बीच में छेद कर के दो भागों में बाँटा जाता
है। पहला भाग मूल कहलाता है और दूसरा भाग आगे का भाग कहलाता है। प्रोक्षणीपात्र में रखे हुए जल में कुश
के इन दोनों भागों को रख दिया जाता है। समय समय पर उस कुश से प्रोक्षणकर्म किया जाता है। (वही पृ.
४२८)
प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की । उन्होंने कहा कि यज्ञ दो प्रमुख भेद हैं- वितानयज्ञ और
पाकयज्ञ। वितानयज्ञ का संबन्ध श्रौतयाग से है और पाकयज्ञ का संबन्ध स्मार्तयज्ञ से है । गृह्यसूत्र में पाकयज्ञ का
विस्तार से व्याख्या मिलती है। संपूर्ण सृष्टि ही एक प्रकार से यज्ञ है। प्रकृति में निरन्तर यज्ञ चलता रहता है।
लोक में भी यज्ञ निरन्तर होता रहता है। देवता के अनुकरण से मनुष्य भी अपना यज्ञ संपन्न करता रहता है।
केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर वेदविभाग सहायक आचार्य डॉ. रजनीश कुमार पाण्डेय ने
ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोधसंस्थानस्य
शोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल
के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।