राष्ट्रीय संगोष्ठी – शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य :उपवेष सम्पादन और हविःपरिपाक विमर्श–शृंखला-८

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ अगस्त २०२६, सोमवार को सायंकाल ५-७बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीतशतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘उपवेष सम्पादन और हविःपरिपाक’ नामक प्रकरण पर विचारकिया गया। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। प्रो.देवेन्द्र प्रसाद मिश्र, आचार्य एवं अध्यक्ष, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृतविश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि ‘पाङ्क्तो वै यज्ञः’ इस वाक्य की अभिनव व्याख्या शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य में प्राप्त होता है। संवत्सरयज्ञ के पाँच विभाग हैं। अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध औरसोमयज्ञ । इस को दूसरे रूप में भी कहा गया है- पाकयज्ञ, हविर्यज्ञ, महायज्ञ, अतियज्ञ और शिरोयज्ञ ।(शतपथब्राह्मणम् पृ. ६२७) प्रो. योगेन्द्र भानु, आचर्य एवं अकादमिक अधिष्ठाता, महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय, भरतपुरने कहा कि जिस अग्निखण्ड में हविर्द्रव्य का परिपाक होता है। उस अग्नि को हाथ के आकार वाले लकड़ी के डण्डेसे फैलाया जाता है। वह लकड़ी ही उपवेष है। आचार्य सायण ने शतपथब्राह्मण के भाष्य में लिखा है कि आग केगोले को फैलाने वाला लकड़ी ही उपवेष है-‘अङ्गार-विभजनार्थं काष्ठम् उपवेषः’। जो ऋत्विक् अथवा आग्नीध्रकपाल का उपधान कर्म को करता है। वह ‘धृष्टिरसि’ इस यजुर्मन्त्र को पढता हुआ उपवेष को उठाता है। (वही पृ.६१९) डॉ. अर्चना कुमारी, सह आचार्य, व्याकरण विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नईदिल्ली ने कही कि अग्नि में सोम की आहुति दी जाती है। अग्नि सात प्रकार के हैं, इस दृष्टि से ‘सप्तसंस्थो वैज्योतिष्टोमः’, यह कहा गया है। ये हैं- अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्यसोम, षोडशीस्तोम, अतिरात्रस्तोम,वाजपेयस्तोम और आप्तोर्यामस्तोम। अग्नि सात प्रकार के हैं, इस आधार पर अन्न भी सात प्रकार के हैं। ‘यत्सप्तान्नानि तपसाजनयत् पिता’। (वही पृ. ६२९) डॉ. पवन कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी नेकहा कि अध्वर्यु कृष्णमृग चर्म को ‘धिषणामि पर्वती प्रत्त्वादित्यास्त्वग् वेत्तु’ इस मन्त्र को बोलता हुआ फैलाये हुएमृगचर्म पर दृषत् (शिलबट) को स्थापित करता है। यह शिला पिसने योग्य चाबल को धारण करता है, इस दृष्टिसे दृषत् को धिषणा शब्द से भी कहा जाता है। पर्वत का अवयव होने से वह पर्वतखण्डः पर्वती नाम सेशतपथब्राह्मण में प्रयुक्त हुआ है। (वही पृ. ६२२) प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरूविश्वविद्यालय, नई दिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे । उन्होंने कहाँ कि अग्नि तीन प्रकार के हैं- आमात् नामकअग्नि, कव्यात् नामक अग्नि और हव्यवाट् नामक अग्नि। जीव के शरीर में विद्यमान अग्नि अमात् कहलाता है,मृतशरीर को जलाने वाला अग्नि क्रव्यात् है। जिस अग्नि से देवता हवि को ग्रहण करते हैं वह हव्यवाट् अग्नि है।हिन्दी विज्ञानभाष्य में विविधविषय हैं। हमलोगों को सावधानता से इस का अध्ययन करना चाहिए। (वही पृ.६४०) डॉ. कमलराज उपाध्याय, प्राध्यापक वेदाचार्य, श्री तोताद्रि कमलनयन वेद विद्यालय परकोटा अनुपशहरबुलंदशहर ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिकशोधसंस्थान के शोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्यालऔर महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहणकर गोष्ठी को सफल बनाया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : पुरोडाशसम्पादन विमर्श -शृंखला-७

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ जुलाई २०२६, शुक्रवार को सायंकाल ५-७बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीतशतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘पुरोडाशसम्पादन कर्म’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया। इसब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। प्रो. सुन्दर नारायण झा, आचार्य, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली ने कहा कि स्वयम्भू परमेष्ठी सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी ये पाँच सृष्टि के विभाग करने वाले तत्त्व हैं।उनमें स्वयम्भू और् परमेष्ठी इन दोनों का अमृत स्वरूप है, सूर्य का अमृत और मर्त्य स्वरूप है तथा चन्द्रमा औरपृथ्वी इन दोनों का मर्त्य स्वरूप है। तस्मात् यत् किञ्च अर्वाचीनम् आदित्यात् सर्वं तन्मृत्युना अप्तम् । (इस प्रकारजो कुछ आदित्य से नवीन है, वह सब मृत्यु के द्वारा प्राप्त होता है), इस शतपथब्राह्मण के वचनों के आधार पर,पृथ्वी एवं चन्द्रमा का स्वरूप निर्धारित किया गया है। क्योंकि आदित्य से नवी ये दोनों तत्त्व हैं। ‘निवेशयन्अमृतं न मर्त्यं च’ इस मन्त्र के आधार पर सूर्य की व्याख्या की गयी है। (शतपथब्राह्मण पृ. ५४०) डॉ. दुर्गा शरण रथ, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीरघुनाथकीर्तिपरिसर ने कहा कि इस भाष्य में विविध विषय हैं। प्रस्तुत प्रकरण में त्रित्ववाद की व्याख्या की गयी है। ‘त्रिःसत्या वा देवता’ इस सिद्धान्त के अनुसार त्रित्ववाद की सिद्धि होती है। ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद ये तीनवेद त्रित्ववाद में आते हैं। देवता भी त्रित्ववाद में समाहित हैं, लौकिकव्यवहार में भी वैदिकमङ्ल का पाठ तीनबार किया जाता है। त्रित्ववाद के अनेक उदाहरण शातपथब्राह्मण हिन्दीविज्ञान भाष्य में देखने को मिलता है।जैसे- पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक- ये तीन त्रैलोक्य हैंअग्नि, वायु आदित्य- ये तीन देवता हैं।वसु रुद्र आदित्य- ये तीन अधिदेवता हैं। इस प्रकार से आठ उदाहरणों का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। (शतपथब्राह्मण पृ. ५११) डॉ. सुधाकर कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर नेकहा कि प्रस्तुत प्रकरण में प्रजापति का महत्त्वपूर्ण वर्णन किया गया है । इस प्रजापति के सत्यप्रजापति और यज्ञप्रजापतिये दो रूप हैं कृष्णमृग के प्रकरण में इसका वर्णन आता है। सत्यप्रजापति मैलिक तत्त्व है। यज्ञप्रजापति यौगिक तत्त्व है।सत्यप्रजापति ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है। (शतपथब्राह्मण पृ. ४६७) डॉ. निशान्त मिश्र, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, एकलव्य परिसर नेअपने व्याख्यान के क्रम में कहा कि यह संपूर्ण सृष्टि पाँच भागों में विभक्त है। उनमें स्वयम्भू पहला है, परमेष्ठीदूसरा है, सूर्य तीसरा है, चन्द्रमा चौथा है और पृथ्वी पाँचवीं है। इस विभाग के कारण ही पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्यबल्शा कहा जाता है। जिसकी एका शाखा स्वयम्भू आदि हैं। स्वयम्भू और परमेष्ठी ये दोनों मिलकर परमधामकहलाते हैं, सूर्य को मध्यमधाम कहा जाता है, चन्द्रमा और पृथ्वी ये दोनों मिलकर ही अवरधाम कहलाते हैं।(शतपथब्राह्मण पृ. ५७२) केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीरघुनाथकीर्ति परिसर के वेदविभाग के सहायक आचार्य डॉ. अमन्दमिश्र ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिकशोधसंस्थान के शोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्यालऔर महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहणकर गोष्ठी को सफल बनाया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : प्रोक्षण विमर्श (शृंखला-६)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक २९ जून २०२६, सोमवार को सायंकाल ५-७बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीतशतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘प्रोक्षणकर्म’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया। इस ब्राह्मणग्रन्थके विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी। डॉ. प्रवीण कुमार द्विवेदी, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, प्रो.राजेन्द्र सिंह (रज्जूभय्या)विश्वविद्यालय, प्रयागराज, ने व्याख्यान देते हुए कहा कि संकुचित भाव ही अल्पता का द्योतक होने से दुःख काकारण माना जाता है। ऐसी दृष्टि यज्ञविरोधी माना जाता है। इसे दूर करने के लिए ‘देवीरापो’ इति मन्त्र कोबोलता हुआ यजमान वामहस्त में पात्र को लेकर दक्षिण दिशा से ऊपर की ओर प्रोक्षण कर्म करता है। भूमण्डलपर जो जल है वह जल दुषित है। अन्तरिक्ष लोक में रहने वाला जल इन्द्ररूप से सौरप्राणमय बनता हुआ वायु केसाथ संबन्ध होने से शुद्ध और पवित्र माना जाता है। इस प्रकार के विवेचन से सिद्ध होता है कि भूपिण्ड पर जोजल है वह जल सर्वथा दुषित नहीं है अपितु अन्तरिक्ष में रहने वाला जल सर्वथा शुद्ध है। यहाँ अन्तरिक्ष के जलकी अपेक्षा से पृथ्वीलोक पर जल का विचार किया गया है।। यज्ञ में रखा हुआ प्रोक्षणीपात्र से जल को ऊपर उठाकर प्रोक्षणकर्म किया जाता है। (शतपथब्राह्मण पृ. ४४८) डॉ. राजकिशोर आर्य, सहायक आचार्य, आयुर्वेद संकाय संहिता एवं संस्कृत विभाग, काशी हिन्दूविश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि अव्यय तत्त्व के पाँच कला हैं- आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् । इनमेंआनन्द और विज्ञान मन के साथ जुड़ कर विद्या नाम से जाना जाता है। विद्या का नाम ही ब्रह्म है। अविद्या कानाम कर्म है। अव्ययपुरुष सृष्टि का आधार है। (वही पृ. ४०७) डॉ. नीरजा कुमारी, सहायक आचार्या, संस्कृत विभाग, महन्त दर्शनदास महिला महाविद्यालय,मुजफ्फरपुर, बिहार ने कही कि शतपथब्राह्मणहिन्दीविज्ञानभाष्य में प्राण, अपान, व्यान, समान और उदानइन प्राणों में बीच वाला प्राण व्यान है। व्यान को यज्ञीयदृष्टि से उपांशुसवन नाम दिया गया है। अपान नामकप्राण अन्तर्याम कहलाता है, प्राण का नाम उपांशु है। उपांशुसवन एक स्थिर शिला है। प्राण और अपान ये दोनों पत्थर हैं। इन दोनों के सहयोग से व्यानशिला पर उपांश्वन्तर्याम का घर्षण व्यापार होता है। एक भाग से प्राणआता है और दूसरे भाग से अपान आता है, बीच में स्थित व्यान पर घर्षण कर्म किया जाता है। (वही पृ. ४३१) डॉ. प्रकाश रञ्जन मिश्र, सहायक आचार्य, वेदकर्मकाण्ड पौरोहित्य विभाग, श्रीरामसुन्दर संस्कृतविश्वविद्या प्रतिष्ठान आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, दरभङ्गा ने कहा कि यज्ञियपदार्थो में प्रविष्ट आसुरभाव कोदूर करने के लिए पवित्रीकरण कर्म को किया जाता है। एक कुश के बीच में छेद कर के दो भागों में बाँटा जाताहै। पहला भाग मूल कहलाता है और दूसरा भाग आगे का भाग कहलाता है। प्रोक्षणीपात्र में रखे हुए जल में कुशके इन दोनों भागों को रख दिया जाता है। समय समय पर उस कुश से प्रोक्षणकर्म किया जाता है। (वही पृ.४२८) प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरूविश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की । उन्होंने कहा कि यज्ञ दो प्रमुख भेद हैं- वितानयज्ञ औरपाकयज्ञ। वितानयज्ञ का संबन्ध श्रौतयाग से है और पाकयज्ञ का संबन्ध स्मार्तयज्ञ से है । गृह्यसूत्र में पाकयज्ञ काविस्तार से व्याख्या मिलती है। संपूर्ण सृष्टि ही एक प्रकार से यज्ञ है। प्रकृति में निरन्तर यज्ञ चलता रहता है।लोक में भी यज्ञ निरन्तर होता रहता है। देवता के अनुकरण से मनुष्य भी अपना यज्ञ संपन्न करता रहता है। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर वेदविभाग सहायक आचार्य डॉ. रजनीश कुमार पाण्डेय नेने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोधसंस्थानस्यशोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्यालके आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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