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सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला — पितृसमीक्षा


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक १५-२१ जून २०२६ को सायंकाल ५-७ बजे
तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय कार्यशाला का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत
पितृसमीक्षा नामक ग्रन्थ को आधार बना कर यह सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न हुई।


प्रथम दिवस प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदि, वरिष्ठ आचार्य एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अपने निर्धारित ग्रन्थ पर व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि आधुनिक समय में
पितृसमीक्षा नामक ग्रन्थ की अत्यधिक उपयोगिता है। आश्विन मास के कृष्णपक्ष में पितृपक्ष आता है जिसमें
हमलोग अपने पितरों का तर्पण करते हैं। देवतर्पण, ऋषितर्पण और गोत्रतर्पण आदि इसमें विहित है। इस ग्रन्थ में
प्रजापति से विषय को प्रारम्भ कर के पितरों का स्वरूप निर्धारित किया गया है। विषय को स्पष्ट करते हुए कहा
गया है कि ब्रह्म दो प्रकार के हैं- निरुक्त और अनिरुक्त । इनमें निरुक्त तीन प्रकार के हैं- विश्व, विश्वात्मा और
विश्वातीत। ब्रह्म जिसकी सृष्टि करता है वह विश्व कहलाता है, विश्व की सृष्टि कर के ब्रह्म उस विश्व में प्रवेशा
कर जाता है, इस दृष्टि से वह विश्वात्मा कहलाता है, इन दोनों तत्त्वों से जो भिन्न है वह विश्वातीत कहलाता है।


डॉ. पतञ्जलि कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक
विश्वविद्यालय, उज्जैन ने कहा कि यजुःशब्द की अभिनव ब्याख्या इसमें प्राप्त होती है। यजुः में दो शब्द हैं-यत्
और जू। यत् शब्द से गतिशब्द का और जूः शब्द से स्थिरशब्द का ग्रहण किय अगया है। सृष्टि में जो गतिशील
पदार्थ है, वह वायु है। सृष्टि में जो स्थिरपदार्थ है, वह आकाश है । आकाश में वाक् रहती है, वायु प्राण का द्योतक
है। अत एव वाक् और प्राण के द्वारा सृष्टिसंरचना स्थिर रहती है।


द्वितीय दिवस प्रो.धर्मदत्त चतुर्वेदी, आचार्य, संस्कृत विभाग, केन्द्रीय उच्च तिब्बत शिक्षा संस्थान मानित
विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी ने अपने निर्धारित विषय पर बोलते हुए है कहा कि यह ग्रन्थ अतीव
लोकोपकारी है। इस ग्रन्थ का प्रचार करना चाहिए। ब्रह्मरूप जो ऋषिप्राण है, देवरूप जो देवप्राण है और
पितृरूप जो पितृप्राण है। इन तीनों प्राणों के परस्पर संमेलन से पितृतत्त्व का सम्यक् अवबोध होता है। ब्रह्मसत्य
नामक तत्त्व से एवं देवसत्य तत्त्व से जीव के दो प्रकार के संस्कार होते हैं।


डॉ. कुलदीप कुमार, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
धर्मशाला ने ग्रन्थ का पङ्क्तिशः पाठ किया । पितृसमीक्षा नामक ग्रन्थ में ऋतशब्द की और सत्यशब्द की व्याख्या
की गई है। इस दोनों तत्त्वों का समानरूप से महत्त्व है। इन दोनों तत्त्वों में पौर्वापर्य के क्रम का विचार नहीं
करना चाहिए। विष्णु तत्त्व गति का द्योतक है, जो बाह्यजगत् से सोमरूप अन्न को लाता है। इन्द्र तत्त्व प्राणरूप
है। जीव के अन्तःशरीर मे जो अग्नि रहता है, उस अग्नि को इन्द्र बाहर लाता है। जहाँ यह क्रिया होती है, वह
ब्रह्मा तत्त्व है। उस ब्रह्मा को प्रतिष्ठा शब्द से प्रतिपादन किया जाता है।

तृतीय दिवस प्रो. श्यामदेव मिश्र, आचार्य, ज्योति विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर,
लखनऊ ने विषय को उद्घाटित करते हुए कहा कि अग्नि, यम और सोम ये तीन तत्त्व देवपितर कहलाते हैं। सभी
देवताओं की उत्पत्ति अङ्गिरा तत्त्व से होती है।। अङ्गिरा स्वभाव से ज्योतिःस्वरूप है। इस दृष्टि से अग्नि भी
तेजोमय है। भृगु स्नेह रूप होता हुआ रसरूप है, इस दृष्टि से सोम को रसमय कहा जाता है। जहाँ न तेज और न
स्नेह रहता है, वह यम तत्त्व है। इस प्रकार तीन पितर सिद्ध होते हैं।


प्रो. शशिकान्त द्विवेदी, आचार्य, वैदिक दर्शन विभाग, संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय, काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि पितृतत्त्व निरूपण के क्रम में अग्नि की प्राधानता है। अग्नि का स्वभाव
प्रसरण है, अग्नि के द्वारा ही हृदय अर्थात् केन्द्र से बाह्यभाग में चयन किया जाता है। । उस चयन में सवन की
त्रिविधता से अग्नि भी तीन प्रकार का हो जाता है- अग्नि, वायु और आदित्य। । विकास की यात्रा में सर्वप्रथमरूप
अग्नि, उस के बाद का विकास वायु का है और अन्तिम विकास अत्यन्त विरल अवयव वाला आदित्य तत्त्व है।

चतुर्थ दिवस प्रो. कृष्ण कान्त झा, अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा ने
कहा कि प्राण को आधार बना कर यम की व्याख्या ग्रन्थकार ने किया है। । विवस्वान् शब्द का अर्थ सूर्य होता है,
विवस्वान् प्राण में विश्वामित्रप्राण रहता है। विश्वामित्रप्राण बृहतीछन्द का रूप बनता हुआ इन्द्र है। अत एव इन्द्र
भी प्राण है। विश्वामित्र प्राण और इन्द्रप्राण इन दोनों प्राणों के मेल से मनुप्राण उत्पन्न होता है। मनुप्राण में स्थित
अग्नि ही यम कहलाता है।

डॉ. रामचन्द्र, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, इन्स्टीट्यूट आफ इन्टीग्रेटेड एण्ड आनर्स स्ट्डीज,
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र ने कहा कि जब प्रकृति में अग्नि अपनी उत्पत्तिस्थान से वायु के साथ चलता है
वह ऋत तत्त्व है। ऋत अग्नि में ऋतुशब्द का प्रयोग किया जाता है। । ऋत रूप अग्नि दश हैं- धिष्ण्य अग्नि आठ,
गायत्र अग्नि और सावित्र अग्नि इन दोनों के मिलने से अग्नि के दश रूप हो जाते हैं।


पञ्चम दिवस डॉ. कौशलेन्द्र दास, सहयक आचार्य, दर्शनविभाग, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत
विश्वविद्यालय, जयपुर ने विषय को उद्घाटित करते हुए कहा कि श्राद्धकर्म में सपिण्डीकरण के बाद पार्वण की
व्यवस्था है। भारतीय परम्पराया में अमावास्या तिथि को पार्वण किया जाता है। आर्द्रानक्षत्र में भी पार्वण
गृहस्थ लोग करते हैं। । पार्वणपितरः नान्दीमुख पितर से नीचे के स्थान में रहते हैं। पार्वणपितर मूर्तिमान् होते
हैं। पार्वणपितर चार प्रकार के हैं– सोमपा, हविर्भुज, आज्यपा और सुकालिन । सोमपा को ही पार्वणपितर कहते
हैं।

प्रो. शोभा मिश्रा, आचार्या, संस्कृत विभाग, विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय, कानपुर ने
अपने निर्धारित विषय प्रेतपितर व्याख्यान प्रस्तुत किया । पृथ्वीलोक पर भूतात्मा अर्थात् जीव शरीर को त्याग
कर ऊपर के लोक को जाता है। गन्धर्व शरीर के द्वारा चन्द्रलोक को जाता है। इस प्रकार प्रेतपितर तीन प्रकार के
हैं- परा, मध्यमा और अवर । नान्दीमुख पार्वण प्रेत और अवर अश्रुमुख होते हैं।

षष्ठ दिवस डॉ. अरविन्द कुमार तिवारी, प्रवक्ता, आदर्श वैदिक विद्यालय इण्टर महाविद्यलय संस्कृत, बागपत
नगर, उत्तर प्रदेश ने कहा कि ऋतुपितर और दिव्यपितर चैतन्यात्मक मनुष्यशरीर को उत्पन्न करता हुआ
भोगलोक से कर्मभोग के बाद लौट कर कर्मात्मा भूतात्मा बन कर मूर्तियोनि में आत्मरूप में विचरण करता है।

प्रो. सरोज कौशल, आचार्या पूर्व अध्यक्षा, संस्कृत विभाग, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर
ने कही कि निर्धारित प्रकरण में पितृतत्त्व विषय में सन्तान का क्या योगदान है, इस पर विचार किया गया है।
इस विषय में चन्द्रमा से २८ कला उत्पन्न होते हैं। २८ कला पिण्डगततेज शोणितमय अग्नि में प्रवेश कर के
पितृस्तोमयज्ञ के द्वारा सन्तानरूप में विस्तार को प्राप्त होता है। ज्योतिष्टोम सदृश पितृस्तोम यज्ञ होता है। यह
यज्ञ साथ संस्था वाला होता है। किस विधि से सन्तान की उत्पत्ति होती है, इसकी समुचित वैज्ञानिक व्याख्या
यहाँ मीलती है।

सप्तम दिवस प्रो. रामराज उपाध्याय, आचार्य, पौरोहित्य विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि गयाश्राद्ध के विशेष महत्त्व का प्रतिपादन ग्रन्थकार ने किया है।
सपिण्डीकरण श्राद्ध को छोड़ कर गयाक्षेत्र में किया गया पिण्डदान सर्वश्रेष्ठ है। भूतात्मा कर्ममय आत्मा होता है,
वह अपने कर्म के बल से चन्द्रलोक को न जाकर दुष्कर्मफल के कारण दूसरे लोक में जाकर दुर्गतिग्रस्त हो जाता
है। उसके उद्धार के लिए गया में पिण्डदान किया जाता है।

डॉ. रञ्जन लता, सहायक आचार्या, संस्कृत एवं प्राकृत विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर
विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने कहा कि गोत्रसन्त का विस्तार से व्याख्या पितृसमीक्षा नामक ग्रन्थ में मिलता है ।
वर्तमानपुरुष से पूर्व सात पुरुष तक प्राप्त पिण्डों के आधार पर वर्तमान वंशपरम्परा चलती है।

प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने सप्तदिवसीय राष्ट्रिय कार्यशाला के अध्यक्ष थे । उन्होंने कहा सभी विद्वानों का
व्याख्यान सुस्पष्ट और सारगर्भित था। उन्होंने कहा कि ब्रह्म को आधार बना कर पितर के स्वरूप का निरूपण
किया गया है। जो सभी प्रकार के धर्मों से युक्त होता है वह निरुक्त नामक ब्रह्म कहलाता है। छोटापन बडारूप
क्रिया ये सभी धर्म हैं। निरुक्त के लिए ही सगुण शब्द का और व्यक्त शब्द का प्रयोग होता है।

वैदिक आशीष शर्मा शास्त्री, आचार्यवर्गीय छात्र ,वेदविभाग, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक
विश्वविद्यालय, उज्जैन ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन
वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में
अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों
ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर कार्यशाला को सफल बनाया। इस कार्यशाला के सातों दिवसों में लगभग २००
विद्वानों ने भाग ग्रहण किया।

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