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राष्ट्रीय संगोष्ठी-इन्द्रविजय : भारतवर्ष आख्यान उपद्वीपप्रसङ्ग


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ मई २०२४ को इन्द्रविजयग्रन्थ के
उपद्वीपप्रसङ्ग को आधार बनाकर एक ऑनलाईन राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया।
यह संगोष्ठी प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। जिसमें प्रो. हरीश, आचार्या, संस्कृत
विभाग, किरोड़ीमल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय; डॉ. सत्यकेतु, सहायक आचार्य, संस्कृत
विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय; डॉ. योगेश शर्मा, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, पी. जी. डी.
ए. वी. महाविद्यालय (सान्ध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय; डॉ. धीरज कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य,
दर्शन विभाग, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा ने वक्ता के रूप में व्याख्यान
किया।

प्रो. हरीश ने इन्द्रविजय ग्रन्थ के लङ्काप्रसङ्ग पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। पं.
मधुसूदन ओझा ने १२ प्रमाणों के आधार पर इस तथ्य को सिद्ध किया गया है कि सिंहलद्वीप
लङ्का नहीं है । पहले प्रमाण में कहा गया कि भागवत पुराण में सिंहलद्वीप को सातवें स्थान पर
और लङ्का को आठवें स्थान पर रखा गया है। दूसरे प्रमाण में कहा गया कि लङ्का अक्षांश रहित
स्थान है। सिंहलद्वीप में अक्षांश है। तीसरे प्रमाण में कहा गया है कि जैसे उज्जयिनी में मध्यरेखा है
वैसे ही लङ्का में भी मध्यरेखा है। इससे सिद्ध होता है कि सिंहलद्वीप लङ्काद्वीप से भिन्न है। चौथे
प्रमाण में कहा गया कि लङ्का विषुवत् रेखा को छूती है परन्तु सिंहलद्वीप विषुवत् रेखा से बहुत दूर
पर स्थित है। पाँचवे प्रमाण में कहा गया है कि सिंहलद्वीप की लम्बाई १३५ कोश और चौड़ाई
१२२ कोश है। जबकि लङ्का की लम्बाई ४ कोश और चौड़ाई २० कोश है। छठे प्रमाण में भी
सिंहलद्वीप एवं लङ्काद्वीप के आकार के आधार पर ही इनमें भेद बतलाया गया है। सातवें प्रमाण के
अनुसार सिंहलद्वीप में अनेक पर्वत हैं, इस युक्ति से लङ्का और सिंहलद्वीप में भेद है। आठवें प्रमाण
में कहा गया है कि त्रिकूटपर्वत पर रावणविहार था, इस युक्ति से सिंहलद्वीप लङ्का है, यह कहना
उचित नहीं होगा। नवमें प्रमाण में कहा गया है कि यूनानीग्रन्थ में सिंहलद्वीप को ‘टापरोवेन’ शब्द
से कहा गया है। उसी प्रकार ‘टापू रावण’ इस शब्द को मान कर सिंहलद्वीप लङ्का नहीं है। दशवें
प्रमाण में कहा गया है कि सेतुबन्ध-रामेश्वर से सिंहलद्वीप तक भग्नावशेष रूप में जो पर्वत शृङ्खला
अभी दिखाई देती है। वह भी लङ्का नहीं हो सकती। क्योंकि राम ने समुद्र में पुल बनाया था और
वह पुल समुद्र में विलीन हो गया। ग्यारहवें प्रमाण में कहा गया कि अग्नीध्र नामक राजा था।
जिन्होंने भारतवर्ष को नौ भागों में बाँटा। उन में नवाँ द्वीप कुमारीद्वीप है। अन्य आठ द्वीप समुद्र में
विलीन हो गये। बारहवें प्रमाण में ६ युक्तियों के आधार पर दोनों का पार्थक्य सिद्ध किया गया है।
डॉ. सत्यकेतु ने उपद्वीपप्रसङ्ग को आधार बना कर अपना व्याख्यान दिया। जिस का वर्णन
भागवत महापुराण में आठ उपद्वीपों के माध्यम से किया गया है। वे उपद्वीप इस प्रकार हैं-
स्वर्णप्रस्थ, शुक्ल, आवर्तन, नारमणक, मन्दरहरिण, पाञ्चजन्य, सिंहल और लङ्का । यहाँ सातवें
स्थान पर सिंहल और आठवें स्थान पर लङ्का है।

डॉ. सत्यकेतु ने उपद्वीपप्रसङ्ग को आधार बना कर अपना व्याख्यान दिया। जिस का वर्णन
भागवत महापुराण में आठ उपद्वीपों के माध्यम से किया गया है। वे उपद्वीप इस प्रकार हैं-
स्वर्णप्रस्थ, शुक्ल, आवर्तन, नारमणक, मन्दरहरिण, पाञ्चजन्य, सिंहल और लङ्का । यहाँ सातवें
स्थान पर सिंहल और आठवें स्थान पर लङ्का है।

डॉ. योगेश शर्मा ने भारतीयभाषाप्रसङ्ग पर व्याख्यान करते हुए कहा कि भारतवर्ष में
तीन भाषाएँ थीं। पहली भाषा छ्न्दोभाषा, दूसरी भाषा संस्कृतभाषा और तीसरी नागरी भाषा थी।
इन्द्रविजयग्रन्थ में यह वर्णन प्राप्त होता है कि पाणिनि के समय में भारतवर्ष में छन्दोभाषा को दैवी
भाषा और ब्राह्मी भाषा भारती कही जाती थी। इस प्रसंग में ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने भाषासंबन्धी
अनेक पक्षों पर विचारविमर्श किया है।

डॉ. धीरज कुमार पाण्डेय लिपिप्रसङ्ग पर व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि वेद के
मन्त्रनिर्माणकाल में लिपि शब्द का स्पष्ट उद्धरण प्राप्त होता है। शुक्लयजुर्वेद के पन्द्रवें अध्याय में
‘छन्दः क्षुरोभ्रजः’ शब्द आया है। यहाँ क्षुर पद से लेखनी और भ्रज शब्द से छन्द अर्थ का ग्रहण किया
गया है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य
विषय भारतवर्ष की प्राचीन भौगोलिकी स्थिति का विवेचन है। इस में उपद्वीप और लङ्काप्रसङ्ग
भूगोल का विषय है। इस भूगोल में भाषा कैसी होनी चाहिए एवं लिपि कैसी हो इत्यादि विषय
आमन्त्रित विद्वानों के द्वारा ठीक से प्रतिपादन किया गया। जम्बूद्वीप नामकरण का आधार क्या है।
मातृकाप्रसङ्ग में पथ्यास्वस्ति वैदिकवर्णमाला है। इस वर्णमाला की संख्या भिन्न-भिन्न है। वेद में
९७ वर्ण इस वर्णमाला में मिलते हैं।

श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के वेदविभाग के अतिथि प्राध्यापक
डॉ. मधुसूदन शर्मा के वैदिक मङ्गलाचरण से संगोष्ठी का प्रारम्भ हुआ। कार्यक्रम का सञ्चालन
श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस
कार्यक्रम में अनेक प्रान्त के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के आचार्य, शोधच्छात्र तथा
विषायानुरागी जनों ने उत्साह पूर्वक सहभागिता की।

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