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सप्तदिवसीय राष्ट्रीय जगद्गुरुवैभवम्- कार्यशाला

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ११-१७ फरवरी २०२६ को सायंकाल ५-७ बजेतक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय कार्यशाला का समायोजन किया गया। पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीतजगद्गुरुवैभवम् नामक ग्रन्थ को आधार बना कर यह सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न हुई। प्रथम दिवस डॉ. कुलदीप कुमार, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय,धर्मशाला ने विषयविशेषज्ञ के रूप में ग्रन्थ का पङ्क्तिशः पाठ किया। जगद्गुरुवैभव ग्रन्थ के लोकसृष्टि प्रसङ्गमें कहा गया है कि नरब्रह्मा दिव्यब्रह्मा का अवतार है। दिव्यब्रह्मा की प्रेरणा शक्ति से नरब्रह्मा ही तीन लोकों काविभाग किया। इन तीन लोकों में पृथ्वीलोक पहला है, अन्तरिक्षलोक दूसरा है, द्युलोक तीसरा है। पृथ्वीलोक केउच्चस्थान पर यज्ञ के लिए वेदिस्थान कल्पित किया गया, पृथिवी का यह विभाग ब्राह्मयुग के अनुसार है। फिरनरब्रह्मा ने संपूर्ण पृथ्वी को भी तीन विभागों में विभाग किया। इस ग्रन्थ में दिव्यब्रह्मा का नरब्रह्मा के रूप मेंपरिकल्पना ग्रन्थकार ने की है। नरब्रह्मा की सृष्टिशैली का विस्तार से निरूपण यहाँ किया गया है। दिव्यब्रह्मावतारोऽयं नरब्रह्मा महाशयः ।दिव्यब्रह्मप्रेरिततया शक्त्या लोकान् व्यचालयत् ॥पृथिव्या उच्चस्थानं यज्ञार्थं वेदिरूपतः क्लृप्तम् ।ब्राह्मे युगे तु पश्चात् सर्वा पृथ्वी व्यभज्यत त्रेधा ॥ जगदुरुवैभव पृ. ५३, का. १-२ डॉ. कौशलेन्द्र दास, सहयक आचार्य, दर्शनविभाग, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय,जयपुर ने कहा कि इस ग्रन्थ में विश्वसृष्टि का निरूपण करने वाला ग्रन्थ पुराण ही है। प्राचीनकाल में भारतीयविद्वानों के द्वारा पुराण का निरूपण विस्तार से किया गया है। पुराण ही सृष्टिविद्या है । यह पुराण का विषयपाँच प्रकार हैं । इस प्रकार पुराण में पाँच विषय हो जाते हैं- त्रैलोक्यविद्या, ज्योतिर्विद्या, भुवनकोशविद्या,प्रासङ्गिकविद्या एव वंशावलीविद्या । ये पाँच पुराणविद्या पुराण में निरूपित हैं। तद्विश्वसृष्टेर्बहुधा निरूपणं पुरातनं यत्कृतमादिसूरिभिः।सा सृष्टिविद्येह पुराणसंज्ञया ख्याता विभक्ता बहुधा च पञ्चधा ॥त्रैलोक्यविश्वविद्या ज्योतिश्चक्रं च भुवनकोशश्च । प्रासङ्गिकं च वंशावली पुराणं च पञ्चविधम् ॥ वही पृ. ४, का. २-३ द्वितीय दिवस प्रो. मीरा द्विवेदी, आचार्या, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने ग्रन्थ को पढ़ाती हुईकही कि ब्रह्मा ही सृष्टि रचता है, वह सृष्टि वर्तमानकाल में, भूतकाल में, भविष्यत्काल में ब्रह्मा के द्वारा हीबनायी जाती है, देवता के स्तर पर ब्रह्मा प्राण स्वरूप है। वह ब्रह्मा पृथ्वीलोक में मनुष्य के रूप में गुरु है। वहब्रह्मा तीन प्रकार की सृष्टि को बनाता है- मानसी सृष्टि, स्थानवती सृष्टि और मैथुनी सृष्टि । संपद्यते ब्रह्मत एव सृष्टिर्याऽभूद् भवत्यद्य भविष्यतीति ।ब्रह्मास्त्यसौ प्राणविधोऽधिदैवं भूमौ मनुष्यस्तु गुरुः स आसीत् ॥ब्रह्माऽधिदैवं सृजति त्रिधा पृथक् स मानसीं स्थानवतीं च मैथुनीम् ।ये ह्येकबिन्दौ बहवः सह स्थितास्ते मानसा भूतगुणादयो यथा ॥ वही पृ. ७, का.१-२ प्रो. कृपाशंकर शर्मा, आचार्य, साहित्य विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर ने ग्रन्थांश कोउद्घाटित करते हुए कहा है कि वाक् प्राण मन, यह पहला त्रिक है। इच्छा, तप और श्रान्ति, यह दूसरा त्रिक है।ज्ञान, क्रिया और अर्थ, यह चौथा त्रिक है, विड्, ब्रह्म, क्षत्र, यह पाँचवाँ त्रिक है। ये सभी त्रिक यजुः का स्वरूप है।ग्रन्थ के इस भाग में अर्थसृष्टि पर विचार करते हुए कहा गया है कि यह तीन प्रकार का है। पहले प्रकार मेंअव्यय, अक्षर, क्षर हैं। क्षर कार्यरूप, अक्षर कारणरूप और अव्यय कारणकार्य से भिन्न है। विड् ब्रह्म च क्षत्रमिति त्रिवीर्यं यजुर्हि वाक्-प्राणमनोरसत्वम् ।इच्छा तपः श्रान्तिमयं त्रिवृत्तिर्ज्ञानक्रियार्थैर्भवति त्रिभावम् ॥त्रिधाऽर्थसृष्टिः प्रथमोऽव्ययोऽर्थस्ततोऽक्षरोऽथ क्षरसृष्टिरन्ते ।कार्यं क्षरं कारणमक्षरं स्यादस्त्यव्ययं कारणकार्यभिन्नम् ॥ वही पृ. ११, का. १-२ तृतीय दिवस प्रो. राजधर मिश्र, आचार्य, व्याकरण विभाग, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृतविश्वविद्यालय, जयपुर ने निर्धारित ग्रन्थ को प्रस्तुत करते हुए कहा कि मणिजसमुदाय ने सभ्यसमाज के रूप मेंबहुदिनों तक समय बिताया । उस समय के सभ्यसमाज में एक अत्यधिक प्रतिष्ठित विद्वान् हुआ, वह विद्वान्संपूर्ण पृथ्वी पर शासन किया । उन्होंने वेदसृष्टि, धर्मसृष्टि, प्रजासृष्टि और लोकसृष्टि की रचना की है। इस ग्रन्थ केआगे के भाग में इन सृष्टियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। भूयःसु कालेषु गतेषु साध्येष्वेकोऽतिविद्वान् पृथगुद्बभूव ।तस्य प्रभावादभवन्नवस्यारम्भो युगस्येह समस्तपृथिव्याम् ॥स वेदसृष्टिं स च धर्मसृष्टिं स च प्रजासृष्टिमलं विद्याय ।स लोकसृष्टिं विदधे विधाता स्रष्टेति विख्यातिमगात् ततः सः ॥ वही पृ. २०, का. १-२ प्रो.राम कुमार शर्मा, मानद आचार्य, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर अपने विषय पर बोलते हुएकहा कि ब्रह्मा सभी के स्वामी हैं, सृष्टिप्रसङ्ग के क्रम में यह ब्रह्मा छः प्रकार के हैं। जीव-ईश्वर के भेद से दोप्रकार के ब्रह्मा हैं। आध्यात्मिक ब्रह्मा दो प्रकार के हैं। दिव्यब्रह्मा और नरब्रह्मा के रूप में दो हैं। इस प्रकार छःसंख्या हो जाते हैं। सृष्टविधि के विविध विषय इस ग्रन्थ में वर्णित हैं। ब्रह्मा प्रभुः षड्विध एव तत्र द्विधाऽयमाध्यात्मिक एष तावत् ।दिव्यो द्विधाऽथैषनरो द्विधैते सर्वेऽपि साम्येन सृजन्ति विश्वम् ॥जीवेश्वराभ्यां द्विविधः स तेषामाध्यात्मिको यत्र यथास्ति देहे ।यथा स सृष्टिं तनुते तदुक्तं परात्परस्योपनयानुवाके ॥ वही पृ. २२, का. १-२ चतुर्थ दिवसप्रो.धर्मदत्तचतुर्वेदी, आचार्य, संस्कृत विभाग, केन्द्रीय उच्च तिब्बत शिक्षा संस्थान मानितविश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी ने निर्धारित ग्रन्थ पर बोलते हुए कहा कि मनुष्य ब्रह्मा सूर्य की परीक्षाकरके फिर वह ब्रह्मा देवविद्या और प्राणविद्या का प्रतिपादन किया। यह मनुष्य ब्रह्मा ने समझा की इस संपूर्णसृष्टि का मूल ब्रह्म ही है। इस विषय में ऋग्वेद का मन्त्र ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है। परीक्ष्य सूर्यं तु स देवविद्याः स प्राणविद्याः प्रकटीचकार ।एकं तु स ब्रह्म समस्तमूलं समीक्ष्य देवानवशानपश्यत् ॥ वही पृ. २७, का. १ प्रो. भागीरथि नन्द, अध्यक्ष, शैक्षणिकपीठ, श्री लाल बहादुर शास्त्रि राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली नेकहा कि ऋक्संहिता के अन्तिम भाग में दो सूक्तों में इन्द्र का चरितचित्रण किया गया है। वैकुण्ठलोक में जो इन्द्रहै उसके जीवनचरित का विस्तार से वर्णन इन्द्रविजयनामक ग्रन्थ में तथा ओझा जी के अन्य ग्रन्थों में भी कियागया है। ऋक् संहितान्तभागे सूक्तद्वयमैन्द्रमाम्नात् ।वैकुण्ठेन्द्रस्तस्मिन् जीवनचरितं स्वमादिशत् सर्वम् ॥ तत्रैव पृ. ३२, का. १ पञ्चम दिवस प्रो. श्यामदेव मिश्र, आचार्य, ज्योति विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लक्ष्मणपुर परिसर,लखनऊ ने विषय को उद्घाटित करते हुए कहा कि वेद हमेशा निश्चितरूप से नित्य है। नित्यवेद को आधार बनाकर ही मनुष्य ब्रह्मा ने वेद का दर्शन किया । दिव्यब्रह्मा को ही आत्मा कहते हैं, वही परमात्मा, मनुष्यब्रह्म मेंआत्मा है। दिव्यब्रह्मा ही वेद का उपदेश मानुषब्रह्मा को दिया है। यद्वा स नित्यं प्रतिपद्य वेदं ब्रह्मा मनुष्योऽपि चकार वेदम् ।तस्यैष आत्मैव परो यथाऽभूदुद्बुद्ध एवं स उवाच वाचम् ॥ वही पृ. ३८, का. १ डॉ. अरविन्द कुमार तिवारी, प्रवक्ता, आदर्श वैदिक विद्यालय इण्टर महाविद्यलय संस्कृत, बागपत नगर, उत्तरप्रदेश ने कहा कि सूर्य ही प्रधानदेवता है, सूर्य वह स्थान परम स्थान कहलाता है, संवत्सर में सर्वविधदेव ही सूर्यहै। सूर्य से ही दूसरे देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ है। प्राण ही देव है, इति सिद्धान्त के द्वारा प्राणरूप देव पाँचभूतों से भिन्न हैं तथा पाँच भूतों के साथ…

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