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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श (भाग-६)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली द्वारा समायोजित शारीरकविमर्श (भाग-६)नामक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन ३० सितम्बर २०२३ को सायंकाल अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया ।यह संगोष्ठी पं. मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविमर्श नमक ग्रन्थ के १३वें प्रकरण को आधार बना करसमायोजित हुई थी । इस प्रकरण में आत्मा के सात संस्थाओं का विवेचन किया गया है। ये संस्थाएँ हैं-निर्विशेष, परात्पर, पुरुष, सत्य, यज्ञ, विराट् और विश्व । इनमें निर्विशेष, परात्पर और पुरुष ये तीन आत्मा केनिर्गुण स्वरूप हैं। शेष चार सत्य, यज्ञ, विराट् और विश्व ये आत्मा के सगुण स्वरूप हैं। निर्गुण की परिभाषा मेंग्रन्थकार ने ‘आश्रितधर्म’ शब्द का प्रयोग किया है। जैसे- नदी में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है। सूर्य के प्रतिबिम्बका आश्रय नदी है। नदी के जल में जो धर्म है वह आश्रितधर्म कहलाता है। अर्थात् यदि नदी का जल स्थिर है तोसूर्य का प्रतिबिम्ब स्थिर होगा। नदी का जल यदि गतिशील होगा तो सूर्य का प्रतिबिम्ब भी गतिशील होगा। सूर्यअपने स्थान पर स्थिर है । जो तत्त्व आश्रित धर्म को स्वीकार नहीं करता है वह निधर्मक या निर्गुण कहलाता है।(‘आश्रितधर्मापरिग्रहान्निर्धर्मको निर्गुणः।’, शारीरकविमर्श, पृ.२३१) निर्विशेष, परात्पर और पुरुष इन तीनों के अन्यनाम भी शास्त्र में प्रयुक्त हुए हैं। ये हैं- गूढोत्मा, परमात्मा, निष्क्रिय, असङ्गः, विभु, अव्यावृत्तरूप। (‘स एषत्रिविधोऽपि गूढोत्मा परमात्मा निष्क्रियोऽसङ्गो विभुरव्यावृत्तरूपः।’,वही) इसी को शुद्ध स्वरूप कहते हैं। आत्मा याब्रह्म के शुद्धस्वरूप में सृष्टि नहीं होती है। जब शुद्ध स्वरूप सृष्टि के लिए माया से संपर्क ग्रहण करता है तब सगुणकहलाता है। जिस में सभी प्रकार के धर्म रह सकते हैं, वह सगुण कहलाता है। (‘अथ सर्वधर्मोपपन्नः सगुणः।’,वही)ब्रह्मसूत्र के ‘सर्वधर्मोपपत्तेश्च’ (२.१.३७) सूत्र के अनुसार एक ही ब्रह्म तत्त्व एक स्थिति में निर्गुण रहता है तोदूसरे स्थिति में सगुण हो जाता है। पण्डित मधुसूदन ओझा जी ने आत्मा के जिन सात संस्थाओं का विवेचनकिया है, वे अधोलिखित हैं- निर्विशेष : ब्रह्म का ही दूसरा नाम रस है। जो विशुद्ध रसमात्र है और जो सीमित नहीं है, वह निर्विशेषकहलाता है। शुद्ध शब्द को इस प्रकार समझना चाहिए। जैसे- शुद्ध आँटा से रोटी नहीं बन सकती है।उस आँटा में पानी और अग्नि का संयोग होने पर ही रोटी बन सकती है। (‘विशुद्धरसमात्रोऽसीमः।’,शारीरकविमर्श पृ. २३२) 2 परात्पर : ब्रह्म का ही दूसरा नाम परात्पर भी है। इस परात्पर में सभी शक्तियों से युक्त अनन्त बल तत्त्वरहता है और यह भी सीमा रहित है। (सर्वविधानन्तबलोपेतोऽसीमः।’,वही) पुरुष : माया नामक बल तत्त्व के संबन्ध से पुरुष तत्त्व सीमित हो जाता है। यह पुरुष सोलह कलाओंवाला हो जाता है। ५ अव्ययपुरुष की कला, ५ अक्षर पुरुष की कला और ५ क्षर पुरुष की कला ये तीनोंमिलकर १५ हो जाते हैं। सोलहवां तत्त्व स्वयं पुरुष है। (‘मायाबलावच्छेदात् सीमितः षोडशकलः।’ ,वही) सत्य : आत्मा, प्राण और पशु इन तीन तत्त्वों से सत्य तीन स्वरूप वाला है। इन तीनों तत्त्वों के क्रमशःज्ञान, कर्म और अर्थ ये तीन नाम हैं। अर्थ से आत्मा आदि वस्तु का बोध होता है। (‘आत्मप्राणपशुभिर्स्त्रिपर्वाप्रजापतिर्ज्ञानकर्मार्थैस्त्रितन्त्रः।’,वही) यज्ञ : अन्न, अन्नाद और आवपन से प्रजापति तीन स्वरूप वाले हो जाते हैं। जिस को जीव खाता है, वहअन्न है । जो अन्न को खाने वाला है, वह अन्नाद कहलाता है और जिस स्थान पर बीज को, अन्न कोडाला जाता है, वह स्थान आवपन है। यज्ञ की प्रक्रिया में अग्नि में हवि डाला जाता है। अग्नि को अन्नादएवं चावल, घी, तिल, यव आदि अन्न है। जिस स्थान पर यह प्रक्रिया होती है वह आवपन है। यही यज्ञकी प्रक्रिया है। (‘अन्नान्नादावपनैस्त्रिपर्वा प्रजापतिः।’,वही)  विराट् : दस प्रकार की प्राणाग्नि में दस प्रकार की आहुति के यज्ञ से उत्पन्न यज्ञ-महिमा से युक्त विराट्कहलाता है। (‘दशविधप्राणाग्नौ दशविधप्राणाहुतियज्ञजो यज्ञमहिमोपेतः।’,वही)  विश्व : पाप स्वरूप अञ्जन और आवरण से रहित आत्मप्रकाश वाला विश्व है। जिस वस्तु का मनुष्य लेपलगाता है, वह अञ्जन कहलाता है। नारी आँख में जो काजल लगाती है, वह अञ्जन कहलाता है। कपड़ाआदि से किसी वस्तु को ढकना आवरण कहलाता है। इन अञ्जन और आवरण से रहित आत्मज्योति तत्त्वही विश्व कहलाता है। (‘पाप्मलक्षणाञ्जनावरणान्निरस्तात्मज्योतिः।’ ,वही) इस प्रकार संपूर्ण प्रकरण में इन संस्थाओं के माध्यम से आत्मा के विविध पक्षों को प्रदर्शित किया गया है।कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान करते हुए प्रो. मधुसूदन पेन्ना, संकायाध्यक्ष, भारतीय धर्म,दर्शन एवं संस्कृति संकाय, कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, महाराष्ट्र ने अपने व्याख्यानमें अद्वैतवेदान्त की दृष्टि आत्मा की विविध संस्थाओं का विवेचन किया। उन्होंने कहा कि निर्विशेष में जो विशेषशब्द है, वह विकार अर्थ वाला है। माण्डूक्यकारिका में इस का सन्दर्भ प्राप्त होता है। ‘निर्गताः विशेषाः यस्मात्,स निर्विशेषः’ जिस से विकार दूर चला गया है, वह निर्विशेष है। ब्रह्म में पहले विकार था फिर वह निर्विकारहुआ, ऐसा अर्थ नहीं समझना चाहिए । प्रक्रिया के प्रदर्शन के लिए यह व्युत्पत्ति की जाती है। उन्होंने शैवागम केपञ्चकञ्चुक का उल्लेख किया । पञ्चकञ्चुक से विशिष्ट शुद्ध तत्त्व शिव है। इसी सिद्धान्त को दृष्टि में रखते हुएग्रन्थकार ने इन सात संस्थाओं का वर्णन किया है। द्वितीय वक्ता के रूप में वक्तव्य देते हुए डॉ. विनय पी., विभागाध्यक्ष, वेदान्त विभाग, कर्नाटक संस्कृतविश्वविद्यालय, बेंगलुरु ने कहा कि ब्रह्ममीमांसा ही शारीरकमीमांसा है। यहाँ ग्रन्थकार ने स्पष्ट लिखा है किआत्मा का अर्थ ही ब्रह्म है। ब्रह्म तत्त्व क्या है, इसके लिए श्रुति को उद्धृत करते हुए लिखा है कि जहाँ से यहसृष्टि उत्पन्न हुई है, जहाँ यह सृष्टि रहती है और जिस में यह सृष्टि विलीन हो जाती है, वह ब्रह्म है। वही ब्रह्मसभी का आत्मा है (‘आत्मा ब्रह्म निरुच्यते। यतो वा इमानि भूतानि जायने, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविसन्ति तद् ब्रह्म’। स आत्मा सर्वेषाम्।’,शारीरकविमर्श, पृ.२३१ ) 3कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्रीशंकर शिक्षायतन के समन्वयक एवं संस्कृत-प्राच्यविद्याध्ययनसंस्थान, जे.एन.यू. के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि शारीरकविमर्श मेंग्रन्थकार ने इसका निर्देश दिया है कि शास्त्र ब्रह्म में निर्गुण और सगुण के भेद से परस्पर विरोध प्रतीत होता है।अनन्त सृष्टि का मूल कारण ब्रह्म है। विशुद्ध आत्मब्रह्म के तटस्थलक्षण से ब्रह्म की संस्था भेद होती है। ये सातसंस्था ही नानात्व के कारण हैं। ब्रह्म का बृंहण करना स्वभाव है। एक ही तत्त्व अनेक हो गया, ऐसा महर्षि कहतेहैं। (‘एकं वा इदं विबभूव सर्वम् इत्याह भगवान् महर्षिः।’ शारीरकविमर्श, पृ. २१७) विकृत बीज से उत्पत्ति होती है।परन्तु ब्रह्म अविकृत रूप में सृष्टि करता है। बृंहण ही ब्रह्म है। (‘विकृताद् वृक्षबीजादङ्कुरोत्पत्तिर्दृश्यते। तत्रत्वविकृतादेव बीजादुत्पत्तिस्तदिदं बृंहणं नाम। तदिदं बृंहणं यत्रोपपद्यते तद् ब्रह्म।’, वही, पृ. २१८)कार्यक्रम का प्रारंभ डॉ. अनयमणि त्रिपाठी,…

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Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture 2023

Pandit Madhusudan Ojha was a profound scholar in the tradition of veda vijnana, said well-known vedic scholar, Acharya Jawalant Kumar Shastri during his lecture at Pandit Motilal Shastri Memorial Lecture 2023 on September 28,2023. The annual lecture is organised by Shri Shankar Shikshayatan to honour Pandit Motilal Shastri. The topic of the lecture was Pandit Madhusudan Ojha’s Contribution to Vedic Thought.Dr Jwalant Kumar Shastri took his early learning in guru-shishya parampara and completed his higher studies at Benares Hindu University. In his 35 years of teaching life, Acharya Shastri taught post-graduate students and guided 16 doctoral students. He has authored 15 books and 250 articles. He has edited the publication of a 700-year old manuscript on Rig Veda bhashya. His programmes on dharmashastra have appeared on Astha Channel.Referring to the great teachers who made stellar contributions to the vedic thought, Acharya Shastri made special mention of Ojhaji, his illustrial disciples Pandit Motilal Shastri and Pandit Giridhar Shastri and Dr Vasudeva Sharan Agarwal.Ordinary people know that there are four Vedas. Ojhaji has instead shown various layers of vedic thought. He pointed out that each of the Vedas were a combination of text and verses and hence they were veda-trayi. He had quoted Taittiriya Brahman to explore the possibility of elemental Vedas. It is said that all the mortal beings in Creation are forms of Rigveda; all actions in Creation are Yajur Veda and Samaveda was the light in every matter. Shastriji pointed out the emphasis laid by Ojhaji on understanding the meaning and context of each specific vedic term. He referred in specific to Ojhaji’s explanation of yajna vijnana and said Yajurveda was the foundation of yajna vijnana. There are forty chapters in this Veda and the first 20 contain mantras related to yajna. Yajna, said Ojahji, was the basis of all Creations. During the meeting, a new publication of Shri Shankar Shikshayatan, Vedic Srishti Prakriya, was released. The chief guest at the meeting, the Chancellor of Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit University, Prof. Murali Manohar Pathak said he had come across Ojhaji and his works during his student days. He referred to Ojhaji’s Dashavadarahasya as one of the texts he had read during those days. Ojhaji had explained the profound mysteries of Creation as mentioned in Rigveda’s nasadiya sukata. The volume referred to sadasadvada, ahoratravada, avaranavada, vyomavada, rajovada etc. Prof. Girish Chandra Pant of Jamia Millia Islamia University, Delhi, referred to Ojhaji’s foreign travels and his various conversations with foreign scholars and journalists. In his speech, former Vice-chancellor of Uttarakhand Sanskrit University, Haridwar, Prof. Devi Prasad Tripathi called Pandit Madhsudan Ojha’s writings as illuminating and profound. He made special mention of Ojhaji’s concept and explanation of the triadic world and how everything emerged and existed in these three worlds. In his introduction to the lecture and Shri Shankar Shikshayatan, Prof. Santosh Kumar Shukla of Jawaharlal Nehru University and convener, Shikshayatan, said the centre was devoted to the promotion of vedic science through it monthly vedic discussions, annual lectures and various publications. He said Pandit Motilal Shastrij’s disciple, Rishi Kumar Mishra had set up the centre to preserve and promote teachings of his two gurus, Ojhaji and Shastriji. The meeting was attended by participants from Delhi University, Jamia Millia Islamia University, Rashtriya Sanskrit University, Jawaharlal Nehru University and other institutions.

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पं. मोतीलाल शास्त्री स्मारक व्याख्यान २०२३

पण्डित मधुसूदन ओझा का वैदिक चिन्तन में योगदान प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली द्वारा दिनांक २८ सितम्बर २०२३ को श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के वाचस्पति सभागार में पण्डित मोतीलाल शास्त्री स्मारक व्याख्यान का समायोजन किया गया । प्रख्यात वैदिक विद्वान् आचार्य ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने ‘पण्डित मधुसूदन ओझा का वैदिक चिन्तन में योगदान’ विषय पर यह स्मारक व्याख्यान प्रस्तुत किया । अपने व्याख्यान में ज्वलन्त कुमार जी ने पं. मधुसूदन ओझा जी के जीवन परिचय को उद्घाटित करते हुए वैदिकविज्ञान परम्परा के महनीय आचार्य के रूप में ओझा जी के शिष्यों महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री एवं डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के नामों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर मीमांसक ने अपनी आत्मकथा में पं. ओझा जी का उल्लेख किया है। युधिष्ठिर मीमांसक जी ने पं. ओझा जी से शास्त्राध्ययन किया था । सामान्य जन वेद चार है, यही जानते हैं। परन्तु शास्त्रप्रमाण से पं. ओझा जी ने वेदत्रयी का विवेचन किया है। ऋग्वेद पद्यात्मक, सामवेद गेयात्मक और यजुर्वेद में गद्य और पद्य दोनों का समावेश है। इस दृष्टि से वेदत्रयी है। तैत्तिरीयब्राह्मण के आधार पर तत्त्वात्मक चतुर्वेद की संकल्पना की गयी है। जिस में कहा गया है कि इस सृष्टि में जितनी मूर्तियाँ हैं वे सब ऋग्वेद के रूप हैं। इस सृष्टि में जो क्रिया अर्थात् गति है वह यजुर्वेद का रूप है और सभी पदार्थों में विद्यमान जो तेज है, वह समवेद है-ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः, सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.८.१) ओझा जी ने वेदार्थ निरूपण के लिए वैदिक पारिभाषिक शब्दों को प्रधान माना। पं. ओझा जी के अनुसार जब तक इन पारिभाषिक शब्दों का अर्थबोध स्पष्ट नहीं हो जाता है तब तक वेदार्थ स्पष्ट नहीं हो सकता है। पं. ओझा जी के यज्ञविज्ञान का अधार यजुर्वेद है। यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं। इन ४० अध्यायों के प्रथम २० अध्यायों में यज्ञ के क्रमानुसार मन्त्र का उपस्थापन है। यज्ञ ही इस सृष्टि का मूल है, ऐसा पं. ओझा जी ने प्रतिपादित किया है। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विद्यमान श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि उन्होंने अपने छात्रजीवन काल में पं. ओझा जी के दशवादरहस्य का अध्ययन किया था। ऋग्वेद के नासदीयसूक्त के मन्त्र में दशवाद संबन्धी अवधारणा को लेकर पं. ओझा जी ने एक विशाल वाङ्मय का प्रणयन किया है। जिस में उन्होंने सदसद्वाद, अहोरात्रवाद, आवरणवाद, व्योमवाद, रजोवाद आदि वादग्रन्थों का प्रणयन किया है । नासदीयसूक्त की ऐसी व्याख्या अन्य आचार्यों ने नहीं किया है। पं. ओझा जी शास्त्रलेखन में तल्लीन रहते थे। वे अधिक यात्रा से बचते रहते थे। जिसका परिणाम है कि उन्होंने २८८ ग्रन्थों का प्रणयन किया । न केवल वे यात्रा से बचते रहते थे अपितु उन्होंने किसी वाद के रूप में वैदिकविज्ञान को प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने वेद, ब्राह्मणग्रन्थ और पुराण में जैसा सृष्टिविज्ञान को देखा वैसा ही उन्होंने हम सब के समक्ष उपस्थापित किया है। विशिष्ट अतिथि के रूप में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश चन्द्र पन्त ने पं. मधुसूदन ओझाजी के अपरवाद ग्रन्थ में विविचित विषयों को उद्घाटित करते हुए पं. मधुसूदन ओझाजी के विदेश यात्रा के समय वैदेशिक विद्वानों के साथ हुयी उनकी रोचक वार्तालाप को भी रेखांकित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्वकुलपति प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी जी ने कहा कि पं. ओझा जी का चिन्तन अद्भुत है। उन्होंने बतलाया कि त्रिलोकी के माध्यम से भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् इन वैदिक व्याहृतियों को व्याख्यायित किया गया है। भू का अर्थ पृथ्वी है और स्वः का अर्थ सूर्य है। इन दोनों के बीच में अन्तरिक्षरूप में भुवः है। स्वः लोक पृथ्वी स्थानीय, महः अन्तरिक्ष स्थानीय और जनः परमेष्ठी है। यह दूसरा त्रिलोकी है। फिर जनः पृथ्वी स्थानीय है, तपः अन्तरिक्षस्थानीय है और सत्यम् प्रजापति स्वयम्भू है। इस प्रकार यह तीसरा त्रिलोकी का रूप है। इन तीनों त्रिलोकियों का शास्त्रपरम्परा में रोदसी, क्रन्दसी और संयती के नाम से व्यवहार होता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान के आचार्य तथा श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के समन्वयक प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि श्रीशंकर शिक्षायतन प्रतिवर्ष २८ सितम्बर को यह कार्यक्रम निरन्तर समायोजित करता है। शिक्षायतन अनेक संगोष्ठी, वैदिकपरिचर्चा, कार्यशाला आदि उपक्रमों के माध्यम से वैदिकविज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर कार्य कर रहा है। यद्यपि पं. ओझा जी का ग्रन्थ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में न होने के कारण प्रचार-प्रसार से वंचित रहा है। इस का संकेत श्रीऋषिकुमार मिश्र के गुरु पं. मोतीलाल शास्त्री ने निर्देश किया था। मिश्र जी ने अपने गुरु के वचनों के आधार पर वैदिकविज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए श्रीशंकर शिक्षायतन को संस्थापित किया है। प्रो. शुक्ल ने समागत सभी अतिथियों एवं श्रोतृवृन्दों का स्वागत तथा धन्यवाद ज्ञापन भी किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्यों प्रो. सुन्दर नारायण झा के द्वारा प्रस्तुत वैदिक मंगलाचरण से एवं प्रो.महानन्द झा के द्वारा प्रस्तुत लौकिक मंगलाचरण से हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डाँ. मणिशंकर द्विवेदी ने किया। वैदिकशान्तिपाठ से यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।कार्यक्रम के आदि में श्रीशंकर शिक्षायतन के द्वारा प्रकाशित “वैदिक सृष्टि प्रकिया” नामक नवीन ग्रन्थ का लोकार्पण समागत अतिथियों के करकमलों के द्वारा किया गया। यह ग्रन्थ वैदिकविज्ञान के अनेक पक्षों को उद्घाटित करता है।इस कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय एवं तत्सम्बद्ध महाविद्यालयों, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, श्रीलाल बहादुरशास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अनेक आचार्य, शोधछात्र एवं वैदिकविज्ञान में रुचि रखने वाले विद्वानों ने अपनी सहभागिता से इस कार्यक्रम को अत्यन्त सफल बनाया।

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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श -भाग-५

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक २९ अगस्त २०२३ को शारीरकविमर्श विषयक एक ऑनलाईन राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया । पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत ब्रह्मविज्ञान सिद्धान्त शृंखला के अन्तर्गत आने वाले शारीरकविमर्श नामक ग्रन्थ में कुल सोलह प्रकरण हैं। यह संगोष्ठी इस ग्रन्थ के ‘आत्मब्रह्ममीमांसा’ नामक १२ वें प्रकरण को आधार बनाकर समायोजित थी। शारीरकविमर्श के बारहवें प्रकरण में ब्रह्म और आत्मा के विषयवस्तु को उद्घाटित किया गया है। शास्त्र में यह दोनों ही शब्द एक ही अर्थ के द्योतक बतलाये गये हैं। इस प्रकरण का विषयवस्तु विविध उपशिर्षकों में विभक्त है।केवलात्मनिरुक्ति नामक उपशीर्षक में अव्यय को आधार बना कर व्याख्या की गयी है। विशुद्ध अव्यय को केवलात्मा कहा जाता है। इसे परात्पर एवं निर्विशेष भी कहा जाता है। ईश्वर अव्यय को ईश्वरात्मा कहा जाता है। इसे विश्वशरीर, पुरुष एवं ईश्वर भी कहा जाता है। जीव अव्यय को जीवात्मा कहा जाता है। इसी का दूसरा नाम विश्वेश्वर पुरुष भी है। इन तीनों प्रकार के आत्मा को ब्रह्म कहा जाता है-‘इत्थं त्रिविधोऽयम् आत्मा ब्रह्मपदार्थः।’, शारीरकविमर्श पृ. २१७ विशुद्धात्मनिरुक्ति नामक उपशीर्षक में ब्रह्म के बृंहण अर्थात् विकास की विस्तृत व्याख्या की गयी है। जिस प्रकार विकृत बीज से अंकुर की उत्पत्ति होती है। उसी प्रकार अविकृत बीज से जो उत्पत्ति होती है, वह बृंहण कहलाता है। ग्रन्थकार ने बीज के विशेषण में विकृत और अविकृत शब्द का प्रयोग किया है। जब कृषक कीड़ा से युक्त बीज को बाहर डालता है तो उस से भी अंकुर निकलता है। जो बीज, शुद्ध एवं कीड़ा आदि दोषों से रहित होता है उसी को खेत में फसल के लिए उपयोग किया जाता है। जैसे बीज बढता है उसी प्रकार ब्रह्म भी अपने आप को बढाता है। जिस स्थान पर बृंहण होता है वह ब्रह्म है। (‘तदिदं बृंहणं यत्र उपपद्यते तद् ब्रह्म।’, वही, पृ. २१८) यह ब्रह्म दो प्रकार का है- अचिन्त्य और प्रमेय । तटस्थ लक्षण से जिसका ज्ञान होता है परन्तु स्वरूप लक्षण से जिसका ज्ञान नहीं होता है, वह अचिन्त्य कहलाता है। इस सृष्टि में जिस तत्त्व को हम जान सकते हैं, वह प्रमेय है। इस प्रकार ब्रह्म के तीन प्रकार हैं- विश्व, विश्वचर और विश्वातीत। जो यह विशाल सृष्टि है, यही विश्व है। इस विशाल सृष्टि में जो ब्रह्म तत्त्व प्रवेश किया हुआ है, वह विश्वचर है। इस सृष्टि से जो भिन्न सत्तारूप परम तत्त्व है उसी को विश्वातीत कहते हैं।विश्वातीत उपशीर्षक में अनेक विषयों को समाहित किया गया है। जिस में नाम, रूप और कर्म नहीं रहता है, वह तत्त्व विश्वातीत कहलाता है। ब्रह्म व्यापक है, माया सीमित है। माया का ब्रह्म के जितने भाग से संबन्ध होता है उतना ही भाग विश्व बनता है। विश्वसृष्टि को ही मायासृष्टि कहते हैं। विश्वचर विश्व का आत्मा है। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है कि ब्रह्म इस सृष्टि की रचना कर के उस सृष्टि में प्रवेश करते हैं। ‘तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ । इस विश्वात्मा विश्वव्यापी को प्रजापति कहा जाता है। प्रजापति दो प्रकार के हैं- अनिरुक्त और सर्व। जो अनिरुक्त है वह इस सृष्टि का कारण है। जो सर्व रूप प्रजापति है वह कार्य है अर्थात् सृष्टि है। कारण और कार्य जब दोनों मिल जाता है तब यह प्रजापति चार प्रकार के हो जाते हैं- अमृत, सत्य, यज्ञ और विराट्। इस चार बनने में श्रुति प्रमाण है-‘चतुष्टयं वा इदं सर्वम्’। कारण भी दो प्रकार के हैं- अचिन्त्य और विज्ञेय। मृत्यु के बन्धन से रहित केवल विशुद्धरूप अचिन्त्य कारण कहलाता है। जो आकार से युक्त होता है वह विज्ञेय कारण कहलाता है। इस प्रसंग में परिग्रह शब्द का प्रयोग हुआ है। परिग्रह का अर्थ ग्रहण करना होता है। शुद्ध तत्त्व जब आकार ग्रहण करता है तो उस को परिग्रह कहते हैं। ये परिग्रह ६ प्रकार के हैं-माया, कला, गुण, विकार, आवरण और अञ्जन। इनमें प्रारंभ के तीन आत्मा को पुष्ट करने वाले तत्त्व हैं। ग्रन्थकार ने इन्हें ‘महिमा’ कहा है। अन्तिम जो तीन हैं वे आत्मा में दोष को उत्पन्न करते हैं। आत्मा की सात संस्था नामक उपशीर्षक में क्रमशः आत्मा के सात नामों का उल्लेख किया गया है। ये हैं- निर्विशेष, परात्पर, पुरुष, सत्य, यज्ञ, विराट् और विश्व । इन सातों में आदि के तीन (निर्विशेष, परात्पर, पुरुष,) को गूढोत्मा और अन्तिम चार (सत्य, यज्ञ, विराट् और विश्व ) को प्रजापति शब्द से व्याख्यायित किया जाता है।दृष्टि के भेद से आत्मा की पाँच संस्था नामक उपशीर्षक में प्राण, महिमा, अन्न, परिग्रह और पाप इन पाँच का वर्णन है। पाँच प्रकार के आत्मशास्त्र में सात प्रकार की आत्मसंस्थाओं का विषय नामक उपशीर्षक में वेद, उपनिषद्, दर्शन, मीमांसा और गीता को आत्माशास्त्र कहा गया है। वेद में प्रजापति का, उपनिषद् में गूढोत्मा का, दर्शन में गूढोत्मा की प्रकृति और प्रकृतिविकार का, मीमांसा में आत्मसंबन्धी विरोधाभास का समन्वय, गीता में अव्यय ब्रह्म का स्पष्ट रूप से वर्णन प्राप्त होता है।संस्था के भेद से आत्मभेद का प्रतिपादन होने पर भी ऐकात्म्य का सिद्धान्त नामक उपशीर्षक में कहा गया है कि उपनिषद् के द्वारा ही आत्मतत्त्व का विस्तार से निरूपण हुआ है। फिर दर्शन, मीमांसा और गीता का क्या प्रयोजन है, इस प्रश्न के उत्तर में ग्रन्थकार ने लिखा है कि वेद और उपनिषद् (वेदान्त) श्रुति शब्द से अभिहित हैं। इन्हीं का विस्तार दर्शन, मीमांसा एवं गीता में किया गया है। इस संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में डॉ. के. एस्. महेश्वरन्, सहायक आचार्य, मद्रास संस्कृत महाविद्यालय, चेन्नई ने अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से निर्विशेष तत्त्व का एवं ब्रह्म के स्वरूपलक्षण तथा तटस्थलक्षण पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।द्वितीय वक्ता के रूप में प्रो. सुन्दर नारायण झा, आचार्य, वेदविभाग, श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने अपने व्याख्यान में अव्ययपुरुष का विस्तार से वर्णन किया। तृतीय वक्ता के रूप में डॉ. मणि शंकर द्विवेदी, शोध अधिकारी, श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली ने शारीरक विमर्श के बारहवें प्रकरण के प्रतिपाद्य विषय को पी.पी.टी के माध्यम से प्रदर्शित करते हुए व्याख्यान दिया।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जे.एन.यू., नई दिल्ली के आचार्य एवं श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के समन्वयक प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि यह ग्रन्थ अत्यन्त ही सारगर्भित है। इसमें अनेक विषयों को समाहित किया गया है। इस ग्रन्थ के १२वें प्रकरण के प्रारंभ में लिखा गया है कि सबसे पहले शास्त्रब्रह्म…

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National seminar on Sharirikavimarsha– Part IV

The fourth seminar on Pandit Madhusudan Ojha’s Sharirikavimarsha, an exceptional work on Brahma vijnana, was organised by Shri Shankar Shikshayatan on July 31, 2023. The present seminar focussed on eighth, tenth and twelfth chapters of the text. In his keynote address, Prof. Vishnupada Mahapatra of Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit University, New Delhi, spoke on the life’s journey of a living being as mentioned in Pandit Madhusudan Ojha’s Sharirikavimarsha as well as in the fourth chapter of Brahmasutra authored by sages Bādarāyaṇa and Vyāsa. The Brahmasutra chapter has four padas and explains the state and condition of a being after death. The first pada describes the form of nirguna or devotion to the divine as formless. Humans must always remember self, a being distinct from ishwar. The soul of a being is not the same as that of self. There is a discussion on various forms of worship, posture, introspection and concentration. In the second pada or section, there is an explanation on where does the human self go after leaving the material body. Prof. Ramanuj Upadhyaya of Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit University, New Delhi, spoke on the twelfth chapter of Sharirikavimarsha titled, Atmabrahma Mimamsa. He said Ojhaji has explained three forms of atma or self–kevalatma, ishwaratma and jeevatma. All three are products of Brahma. Prof. Parag Bhaskar Joshi of Kavikulguru Kalidasa Sanskrit University, Ramtek, Nagpur spoke on the tenth chapter of Sharirikavimarsha titled Shodashapadipadarthanirukti. He said Ojhaji has explained the meaning of Brahmasutra in his book. Dr Janakisharan Acharya of Sri Somanath Sanskrit University, Veraval, Gujarat, presented his views on the eighth chapter of the book. Titled Upanishachastranirukti, the chapter examines the form of Upanishads. There is a detailed explanation of upanishads related to four vedas. The session was chaired by Prof. Santosh Kumar Shukla of Jawaharlal Nehru University. He explained that Ojhaji’s objective was to present an overview of the principles of Upanishad in his book. He has presented a new perspective on Brahmasutra. The seminar was organised and managed by Dr Lakshmi Kant Vimal and Dr Manishankar Dwivedi. The online seminar was attended by students, teachers and scholars from different universities.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श (भाग-४)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ जुलाई २०२३ को शारीरकविमर्श विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया । पण्डित मधुसूदन ओझा जी के ब्रह्मविज्ञान सिद्धान्त शृंखला के अन्तर्गत शारीरकविमर्श नामक ग्रन्थ आता है। इस ग्रन्थ में सोलह प्रकरण हैं। यह संगोष्ठी इस ग्रन्थ के आठवें, दसवें एवं बारहवें अधिकरण के आलोक में समायोजित थी। शारीरकविमर्श के इन्हीं प्रकरणों में वर्णित विषय को आधार बनाकर पर सभी वक्ता विद्वानों ने व्याख्यान प्रस्तुत किया।मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. विष्णुपद महापात्र, आचार्य, न्याय विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने दसवें प्रकरण के ‘जीवयात्रा-भेद-निरुक्ति’ नामक शीर्षक पर बोलते हुए कहा कि ब्रह्मसूत्र के चौथे अध्याय में चार पाद हैं। इस चौथे अध्याय में जीव की यात्रा का क्रम वर्णित है। जीव मृत्यु के बाद किस किस लोक एवं अवस्था को प्राप्त होता है, इस विषय का यहाँ विवेचन किया गया है। पहले पाद में निर्गुण उपासना का स्वरूप वर्णित है। मनुष्य को आत्मभावना का बार-बार स्मरण करना चाहिए। ईश्वर से अभिन्न जीव की भावना करनी चाहिए। जीवात्मा और प्रत्यगात्मा की ऐक्य का प्रतिषेध करना चाहिए। उपासना के विविध रूप आसन, ध्यान और एकाग्रता पर विचार किया गया है। दूसरे पाद में जीवात्मा जब शरीर से निकलता है तब वह किस लोक को जाता है। तीसरे पाद में देवयान का वर्णन है और चौथे पाद में अनेक प्रकार की मुक्तियों का वर्णन है। प्रो. रामानुज उपाध्याय, विभागाध्यक्ष, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने बारहवें प्रकरण ‘आत्मब्रह्ममीमांसा’ नामक शीर्षक पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस में आत्मा के तीन रूपों पर विचार किया गया है- केवलात्मा, ईश्वरात्मा और जीवात्मा। ये तीनों ही ब्रह्म पदार्थ हैं। जो केवलात्मा है उसे निर्विशेष एवं परात्पर शब्द से अभिहित किया जाता है। ईश्वरात्मा विश्वशरीर है और वह पुरुष अतः ईश्वर है। जीवात्मा शरीर लक्षण वाला विश्वेश्वर पुरुष है। केवलात्मा को ही विशुद्धात्मा कहते हैं। प्रो. पराग भास्कर जोशी, विभागाध्यक्ष, आधुनिक भाषा विभाग, कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, नागपुर ने दसवें प्रकरण ‘षोडशपदीपदार्थनिरुक्ति’ नामक शीर्षक पर बोलते हुए कहा कि ब्रह्मसूत्र में चार अध्याय हैं एवं प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद हैं। इस प्रकार सोलह विषय निर्धारित होते हैं। ब्रह्मसूत्र के पहले अध्याय का नाम समन्वयाधिकार है। इस के चार पादों का विषय इस प्रकार हैं- पहले पाद का नाम ‘निरूढशब्दपाद’ है। इसमें भूतेश्वर का स्वरूप है। दूसरे पाद का नाम ‘विशेषणशब्दपाद’ है, इसमें जीवेश्वर का वर्णन है। तीसरे पाद का नाम ‘पराश्रयशब्दपाद’ है, इसमें ब्रह्म के विचालीभाव का वर्णन है। चौथे पाद का नाम प्रधानशब्दपाद है, इसमें ब्रह्म को बतलाने वाले अनेक नामों का विवेचन है। इसी प्रकार से आगे के अध्याय एवं पाद के नाम एवं विषय पर विस्तृत विमर्श किया गया है। उन्होंने बतलाया कि ग्रन्थकार पण्डित ओझा जी ने ब्रह्मसूत्र को समझने के लिए यह वर्गीकरण किया है जो भारतीय दर्शन शास्त्र के अध्येताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। डॉ. जानकीशरण आचार्य, सहायक आचार्य, दर्शन विभाग, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, वेरावल, गुजरात ने आठवें प्रकरण पर अपना व्याख्यान प्रदान किया। इस प्रकरण का नाम ‘उपनिषच्छास्त्रनिरुक्ति’ है। इस में उपनिषदों के स्वरूप और संख्या पर विचार किया गया है। चारों वेदों से संबन्धित उपनिषदों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यहाँ सोलह उपनिषदों का एवं एक सौ आठ उपनिषदों की तालिका अंकित है। जिसमें ऋग्वेद से संबन्धित ऐतरेय उपनिषद्, सामवेद से संबन्धित छान्दोग्य उपनिषद्, यजुर्वेद से संबन्धित बृहदारण्यक उपनिषद् एवं अथर्ववेद से सम्बन्धित मुण्डक उपनिषद् है। इस के साथ अन्य उपनिषदों का भी विवेचन किया गया है। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि यह ग्रन्थ दर्शन के अध्येताओं के लिए अत्यन्त ही उपादेय है। पण्डित ओझा जी ने वेदान्त को उपनिषद् कहा है। प्रो. शुक्ल ने बतलाया कि ओझाजी के द्वारा उपनिषद् के शान्तिपाठ का उल्लेख करने का मुख्य उद्देश्य उपनिषद् के प्रतिपाद्य सिद्धान्तों का दिग्दर्शन कराना है। सोलह पदार्थों से समान्यतया लोग न्याय शास्त्र के पदार्थ समझते हैं। किन्तु यहाँ ये सोलह पदार्थ ब्रह्मसूत्र के विषय को सूक्ष्मता से उद्घाटित करते हैं। ओझा झी की इस दृष्टि को आधार बना कर ब्रह्मसूत्र को एक नवीन आयाम में प्रस्तुत किया जा सकता है। संगोष्ठी का शुभारम्भ श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वेद विभाग के शोधछात्र श्री विवेक चन्द्र झा के द्वारा प्रस्तुत वैदिक मङ्गलाचरण से तथा समापन वैदिक शान्तिपाठ से हुआ। संगोष्ठी का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ.लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। देश के विविध विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों के शताधिक विद्वानों, शोधछात्रों एवं इस विद्या के जिज्ञासुओं ने अपनी सहभागिता द्वारा इस इस संगोष्ठी को अत्यन्त सफल बनाया।

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National Seminar on Sharirikavijnana Part III

On June 30, 2023, Shri Shankar Shikshayatan organised the national seminar on Sharirikavimarsha. This was the third meeting on Sharirikavimarsha. The meeting focused on the seventh chapter of the book on Brahmavijnana authored by Pandit Madhusudan Ojha. The main speaker was Prof. Kamlakant Tripathi of Sampoornanand Sanskrit University, Varanasi. Other speaker was Dr Kuldeep Kumar of Himachal Pradesh Central University. The meeting was chaired by Prof. Santosh Kumar Shukla, Centre for Sanskrit and Indic Studies, Jawaharlal Nehru University and convener, Shri Shankar Shikshayatan. In the seventh chapter, Ojhaji has dealt with 42 principles of paurusheya-apaurusheya through six schools of thought. Six conclusions have been drawn from this examination: 1) Veda is not created by anyone and exists on its own. There are 13 proofs of Veda; 2) Veda is created by ishvar. There are seven proofs; 3) Veda is created by ishwar’s incarnations and there are seven proofs; 4) Veda is born of nature and this has been discussed in seven ways; 5) Veda is created by rsis and there are seven proofs; and 6) Veda is created by villagers and there are three arguments to prove it. Dr Kuldeep Kumar, in his presentation, threw light on some of the principles. He pointed out that in the 28th principle, it has been proved that veda and yajna were same. Brahma is yajna and rik, yaju and sama vidya are yajna. In the 35th principle, Rigveda, Yajurveda and Samaveda have been divided into two–in one part is Rigveda and in the second is Yajurveda and Samaveda. Rigveda is called Agni-Brahma and Yajurveda and Samaveda are Soma-Brahma. Rigveda is related to Brahma, Yajurveda to Bhrigu and Samaveda to Angira. Rigveda is connected to prithvi, Yajurveda to antariksha and Samaveda to dyuloka. Prof Kamlakant Tripathi spoke about the first principle which stated that Ishwar was imbued with knowledge, and this could be known from the term, Brahma. Veda too is knowledge and is known as Brahma. A synonym for Ishwar is Pranav, similar to that of Veda. From Ishwar, the universe is created. Likewise, from Veda is the universe created. Veda is indestructible. In his address, Prof. Shukla said atma-shastra (knowledge of self) has been divided into five parts in Sharirikavimarsha. These are Veda-shastra, Upanishad-shastra, darshan-shastra, Mimamsa-shastra and Gita-shastra. Pandit Madhusudan Ojhaji has given an exceptional rendition of the form of Veda. There is vivid account of the context of Veda and the great teacher of Veda, Brahma. Brahma is full of compassion, omnipresent and hiranyagarbha. The meeting was organised and coordinated by Dr Lakshmi Kant Vimal and Dr Manishankar Dwivedi of Shri Shankar Shikshayatan. The meeting was attended by students, teachers and other scholars from various universities and educational institutions.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श (भाग-३)

प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली द्वारा दिनांक ३० जून २०२३ को शारीरकविमर्श विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया। यह संगोष्ठी पं. मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविमर्श नामक ग्रन्थ के सप्तम प्रकरण को आधार बनाकर समायोजित की गयी थी। जिसमें संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के मीमांसा विभाग के अध्यक्ष प्रो. कमलाकान्त त्रिपाठी ने विशिष्ट वक्ता के रूप में तथा हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के संस्कृत, पालि एवं प्राकृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. कुलदीप कुमार ने वक्ता के रूप में व्याख्यान दिया । यह संगोष्ठी श्रीशंकर शिक्षायतन के समन्वयक तथा संस्कृत एवं प्राच्य अध्ययन संस्थान,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।शारीरकविमर्श के सातवें प्रकरण में शब्दमय वेद के पौरुषेय-अपौरुषेय विषयक ४२ सिद्धान्तोंका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकरण में सर्वप्रथम वेद के पौरुषेय- अपौरुषेय का, नित्य-अनित्य काऔर कृतक-अकृत का विचार मीमांसा, सांख्य, नव्यन्याय, प्राचीनन्याय, वैशेषिक एवं नास्तिक दर्शनों केआलोक में प्रस्तुत किया है। मीमांसादर्शन के अनुसार वेदों का कोई रचनाकार नहीं है, महर्षियों ने केवल वेद तत्त्व का साक्षात्कार किया है। वेद नित्य हैं एवं यह स्वयं उत्पन्न हुए हैं- ‘अकर्तृका इमे वेदाः। महर्षयस्तु द्रष्टारो न कर्तारः।’, शारीरकविमर्श पृ. ४४ सांख्यदर्शन के अनुसार वेद अनित्य हैं और उत्पन्न हुए हैं। जिस प्रकार वृक्ष अंकुर आदि से उत्पन्नहोता है एवं जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा उत्पन्न होते हैं। उसी प्रकार वेद भी प्रकृति के नियमानुसारस्वयं उत्पन्न हुआ है। अतः वेद अनित्य हैं- ‘वृक्षाङ्कुरादिवत् सूर्यचन्द्रादिवच्चैते वेदा अपि प्रकृतिनियमानुसारेण स्वयम् उत्पन्नाः। अत एवअनित्याः।’, वही पृ. ४४ नव्यन्यायदर्शन के अनुसार वेद अपौरुषेय हैं। वेद कूटस्थनित्य और प्रवाहनित्य से रहित होने केकारण नित्य नहीं है।प्राचीनन्यायदर्शन के अनुसार वेद महर्षि के द्वारा प्रणीत होने के कारण पौरुषेय हैं- ‘वेदा महर्षिकृता पौरुषेयाः।’ वही पृ.४५ वैशेषिकदर्शन के अनुसार वेद को शब्दरूप और अर्थरूप इन दो दृष्टियों से देख सकते हैं। वेदशब्दव्यवहार के समय वाक्यप्रधान होने से महर्षियों की रचना है और पौरुषेय हैं- ‘वेदशब्दानां द्वेधाविवक्षा द्रष्टव्या । शब्दरूपेण चार्थरूपेण च । वेदशब्दव्यवहारे वाक्यप्रधानतायां वेदा महर्षिकृताःपौरुषेया अनित्या इति।’ वही पृ. ४७ नास्तिकदर्शन में वेद को पौरुषेय एवं अनित्य माना गया है। ओझाजी के अनुसार नास्तिक वेदतत्त्व से अनभिज्ञ हैं अतः उनका सिद्धान्त अवैज्ञानिक है। इसलिए इस मत पर पर अधिक विचार कीआवश्यकता नहीं है।–‘अथ षष्ठं नास्तिकानां वेदपदार्थान् अनभिज्ञानाम् अवैज्ञानिकं मतम् अस्ति इतिअसारत्वाद् अश्रद्धेयम् इति अत उपेक्ष्यते ।’ वही पृ. ४७ यहाँ तक छः दर्शनों के आलोक में वेद तत्त्व पर विचार किया गया। तत्पश्चात् अधोलिखित छः बिन्दुओंके आलोक में विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है-(1) वेद को किसी ने बनाया नहीं है एवं यह नित्यसिद्ध है। इस पक्ष में तेरह सिद्धान्तों काउपस्थापन है।(2) वेद ईश्वर के द्वारा रचित हैं। इस सन्दर्भ में सात तथ्यों को समाहित किया गया है।(3) वेद ईश्वर के अवतारों के द्वारा रचित हैं। इस मत में में पाँच सिद्धान्त समाहित हैं।(4) वेद प्रकृति के द्वारा स्वयं सिद्ध हैं। इस के लिए सात प्रकार से विचार किया गया है।(5) वेद महर्षियों के द्वारा रचित हैं, इसके लिए सात विचार समाहित हैं।(6) वेद ग्रामीण मनुष्यों के द्वारा रचित है, इस सन्दर्भ में तीन विचार हैं।इस प्रकार उपर्युक्त छः बिन्दुओं के द्वारा विषय को स्पष्ट करते हुए कुल ४२ सिद्धान्तों का प्रतिपादनकिया गया है। डॉ. कुलदीप कुमार ने अपने वक्तव्य में ४२ सिद्धान्तों का दिग्दर्शन कराते हुए हुए कुछ सिद्धान्तोंपर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अट्ठाईसवें सिद्धान्त में वेद और यज्ञ को एक सिद्धकरते हुए कहा गया है कि ब्रह ही यज्ञ है, त्रयी (ऋक्, यजुः और साम) विद्या ही यज्ञ है। इसमेंशतपथब्राह्मण के वाक्य को ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है-‘ब्रह्म वै यज्ञः। सैषा त्रयीविद्या यज्ञः ।एतावान् वै सर्वो यज्ञो यावनेष तर्यो वेदाः।’ वही पृ. ६२ पैंतींसवें सिद्धान्त के अनुसार ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के दो विभाग किये गये हैं। एकभाग में ऋग्वेद और दूसरे भाग में यजुर्वेद और सामवेद हैं। ऋग्वेद को अग्निब्रह्म तथा यजुर्वेद औरसामवेद को सोमब्रह्म कहा गया है। सोमब्रह्म का ही दूसरा नाम सुब्रह्म है। ऋग्वेद का संबन्ध ब्रह्मसे है जबकि यजुर्वेद का संबन्ध भृगु से और सामवेद का संबन्ध अङ्गिरा से है। ऋग्वेद का पृथ्वी से,यजुर्वेद का अन्तरिक्ष से एवं सामवेद का द्युलोक से संबन्ध है-‘ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेदः इत्येते त्रयोवेदा एकाग्निब्रह्म। तज्ज्येष्ठं ब्रह्म। तथा भृगुवेदः अङ्गिरोवेदः इत्येतौ द्वौ वेदावेकं सोमब्रह्म तत्सुब्रह्म।’, वही पृ. ६४ प्रो. कमलाकान्त त्रिपाठी ने व्याख्यान देते हुए कहा कि यह ग्रन्थ दर्शन के अध्येताओं के लिएअत्यन्त उपादेय है। इस में विविध विषयों को समाहित किया गया है। उन्होंने विषय पर बोलते हुएकहा कि प्रथम सिद्धान्त के अन्तर्गत कहा गया है कि ईश्वर ज्ञानमय है और वह ब्रह्म शब्द से भीजाना जाता है। वेद भी ज्ञानमय है और ब्रह्म शब्द से जाना जाता है। इस ईश्वर का वाचक प्रणव है।यह प्रणव ही वेद का वाचक है। ईश्वर के अंश से जगत् की सृष्टि होती है। वेद शब्द से जगत् की सृष्टिहोती है। प्रलय काल में अविनाशी ईश्वर नित्य रूप से रहता है और वेद भी प्रलय काल में रहता है। वेद का विनाश किसी काल खण्ड में नहीं होता है-‘ईश्वरो ज्ञानमयो ब्रह्मशब्दवाच्यः । वेदोऽपिज्ञानमयो ब्रह्मशब्दवाच्यः। ईश्वरस्य तस्य वाचकः प्रणवः। त्रयी वेदस्याप्येष वाचकः प्रणवः ।ईश्वरांशेभ्यो जगतः सृष्टिः । वेदशब्देभ्यो जगतः सृष्टिः। प्रलयेऽप्यविनाशी नित्य ईश्वरः। प्रलयेऽप्येतेवेदा नित्या न विनश्यन्ति।’ वही पृ ४९ अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि शारीरक विमर्श में आत्मशास्त्र कोपाँच भागों में विभक्त किया गया है। ये हैं- वेदशास्त्र, उपनिषत् शास्त्र, दर्शनशास्त्र, मीमांसाशास्त्रऔर गीताशास्त्र । पं. मधुसूदन ओझा जी ने वेद के स्वरूप पर जितने विस्तार से एवं प्रमाणपूर्वकविचार किया है, वैसा विचार संस्कृत साहित्य में अन्यत्र प्राप्त नहीं होता है। वेदशास्त्र का प्रसंग औरवेद के प्रवर्तक आचार्य की चर्चा इस ग्रन्थ में विस्तार से की गयी है। वेदशास्त्र के आदि प्रवर्तक ब्रह्माहैं। इस ब्रह्मा के विशेषण में अनेक शब्दों का प्रयोग ग्रन्थकार ने किया है। ब्रह्मा परम करुणा वालेहैं, सर्वज्ञ हैं, हिरण्यगर्भ हैं। इस हिरण्यगर्भने ब्रह्म दृष्टि से विश्व के कारणरूप ब्रह्मविद्याशास्त्र काप्रचार किया- ‘परमकारुणिको विश्वगुरुः सर्वज्ञो हिरण्यगर्भ-ब्रह्मद्रष्टृतया हिरण्यगर्भसञ्ज्ञो ब्रह्माविश्वकारण-विज्ञानोपपादकं ब्रह्मशास्त्रं लोके प्रचारयामास ।’ वही पृ. ४२ संगोष्ठी का शुभारम्भ महर्षि सान्दीपनि वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन द्वारा संचालित गुरुकुल केवेदाचार्य डॉ.रवीन्द्र कुमार ओझा एवं उनके शिष्यों के द्वारा प्रस्तुत वैदिक मङ्गलाचरण से तथासमापन वैदिक शान्तिपाठ से हुआ। संगोष्ठी का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान केशोध अधिकारी डॉ.लक्ष्मी कान्त विमल ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने…

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Report: National Seminar on Sharirikavimarsha

Shri Shankar Shikshayatan organised a National Seminar on Pandit Madhusudan Ojha’s work on Brahmavijnana, Sharirikavimarsha, on May 30, 2023. The seminar focussed on four chapters of the book. The main speakers included Prof. Dharanidharan of the University of Pondicherry, Prof. Ganapati Bhatt, of Rashtriya Sanskrit University, Tirupati, Dr. Ram Chandra Sharma of Shri Lal Bahadur Shastri Rashtriya Sanskrit University, New Delhi and Dr. Devesh Kumar Mishra of Indira Gandhi Open University, New Delhi. The meeting was chaired by Professor Santosh Kumar Shukla of Jawaharlal Nehru University, New Delhi. Sharirikavimarsha is an important work on advaita vedanta. There are in total sixteen chapters in the book, of which the seminar focused on the first, second, third and fifth chapters. According to the first chapter titled Brahma-Mimamsa-pravritti nimitta, Brahma Tattva is the root cause of creation. Mimamsa means thought. The meaning of pravritti nimitta is reason. Thus the reason for the idea of Brahma is explained in this chapter. This chapter has twelve subtitles in which Pandit Madhusudan Ojha ji has explained daiva-tattva, rajas-tattva, apa-tattva, vakta-tattva, vyoma-tattva, sadasat-tattva, amritamrityu-tattva and sanshayat-tattva respectively as the root cause of creation. The keynote speaker of the seminar, Prof. Dharanidharan presented his lecture on the first chapter. In his lecture, he considered each and every element of the creator, saying that creation occurs through the element of vak or speech.. This is the principle of grammar. In sruti, it is written ‘vageva vishwa bhuvanani jajne ‘–Brahma is the root cause of the creation of the world. Ojhaji has examined the question whether Brahma was one or many. He wrote that before Creation, Brahma was tattva or the basic element. It is one and not many. The second chapter is called Shastra-Brahma-Mimamsa. The meaning of shastra here is sruti. Brahma cannot be known directly as senses are not capable of knowing Brahma. Inference cannot lead to the realisation of Brahma because inference can only be made of what is visible. Brahman cannot be realised by upman or analogy because there is no other instance similar to Brahma. Brahma cannot be realised even by the word because even the word does not have the power to convey Brahma. Yet the word only indicates Brahman . In Vedic science, shastra means Veda and that Veda is Brahma. On this chapter, Prof. Ganapati Bhatt said Ojhaji had rendered two forms of Brahma. One is atman brahma and the other is shastra brahma. On the basis of the Brihadaranyaka Upanishad, Ojha ji has interpreted the soul in these three forms –vāṇmaya, pranmaya and manomaya. Atma has three tantras. Here Tantra means form. The atma has three forms-knowledge, karma and meaning. These three tantras are emblematic of the veerya or virility. The third chapter is titled veda tattva nirukti. Just as advaita vedanta is created from Brahma, Nyaya-Vaisheshika is created from paramanu or atom and Sankhya-yoga is created from prakriti and purusha. Similarly, in Vedic science, creation occurs through veda tattva. Referring to this chapter, Dr. Ram Chandra Sharma explained how Ojhaji had interpreted veda tattva in many forms. Creation occurs through vak. Speech is always associated with mind and life. These (Rigveda, Yajurveda and Samaveda) are Vedas from the speech. These Vedas are the glory of atma. This whole world is Brahma. (sarva khalvidan Brahma). Prajapati has divided this world into three forms – knowledge, action and meaning. (१) There are three forms of knowledge – bliss, science and mind. The individual who is the head of this knowledge is called chidatmaya. The glory of this atma is spiritual Veda. (२) Karma is also of three types-mana, prana and vak. The dominant purusha of karma is called karmatma. The glory of karma is the pranamaya Veda. (३) Artha or meanings are of three types-vak, aap and agni. The individual who is the head of this is called bhutatma. The glory of this bhutatma is the Veda. The title of the fifth chapter is veda shakha vibhag. There are so many branches of the Vedas. There are one thousand one hundred and thirty-one branches of the Vedas. These are explained in this chapter. Speaking on the chapter, Dr. Devesh Kumar Mishra explained that in science, ritu and satya are two creative doctrinal elements. Ritu means zero and satya means absolute. Ritu is apa and agni is satya. Water protects the womb in the true form of fire. The water element grows while located in the womb of that fire. In his address, Prof. Santosh Kumar Shukla offered his view on the term, sahasra. He said Ojhaji had explained sahasra as loka, veda and vakta. These elements were born from the mutual competition of Indra and Vishnu. The seminar was conducted by Dr. Mani Shankar Dwivedi and Dr.Lakshmi Kant Vimal of Shri Shankar Shikshayatan. Several scholars, teachers and students from various universities, colleges and other educational institutions of the country participated in the seminar.

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राष्ट्रीय संगोष्ठी : शारीरकविमर्श

प्रतिवेदनश्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान, नई दिल्ली द्वारा ब्रह्मविज्ञानविमर्श शृंखला के अन्तर्गत दिनांक ३० मई २०२३ को शारीरकविमर्श विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन अन्तर्जालीय माध्यम से किया गया। यह संगोष्ठी पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविमर्श नामक ग्रन्थ के चार प्रकरणों को आधार बनाकर समायोजित थी। जिसमें पाण्डिचेरी विश्वविद्यालय, पाण्डिचेरी के संस्कृत विभाग के आचार्य. प्रो. के. ई. धरणीधरण ने मुख्य वक्ता के रूप में तथा अन्य वक्ताओं में प्रो. के. गणपति भट्ट, आचार्य, अद्वैतवेदान्त विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति, डॉ. रामचन्द्र शर्मा, सह आचार्य, न्यायविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वद्यालय, नई दिल्ली तथा डॉ. देवेश कुमार मिश्र, सह आचार्य, संस्कृत विभाग, इन्दिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली ने व्याख्यान प्रस्तुत किया। यह संगोष्ठी श्रीशंकर शिक्षायतन के समन्वयक तथा संस्कृत एवं प्राच्य अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। पं. मधुसूदन ओझा प्रणीत शारीरकविर्मश अद्वैतवेदान्त का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एक मौलिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में कुल सोलह प्रकरण हैं। जिसके पहले, दूसरे, तीसरे एवं पाँचवें प्रकरण को आधार बना कर वक्ताओं ने व्याख्यान दिये। ब्रह्म-मीमांसा-प्रवृत्तिनिमित्त नामक पहले प्रकरण के अनुसार ब्रह्म तत्त्व सृष्टि का मूल कारण है। मीमांसा का अर्थ विचार होता है। प्रवृत्तिनिमित्त का अर्थ कारण है। इस प्रकार ब्रह्म के विचार का जो कारण है। उस विषय पर विचार यहाँ प्रारंभ होता है। इस अध्याय में बारह उपशीर्षक हैं। जिसमें पं. ओझा जी ने सृष्टि के मूलकारण के रूप में क्रमशः दैवतत्त्व, रजस्तत्त्व, अपरतत्त्व, आपतत्त्व, वाक्-तत्त्व, व्योमतत्त्व, सदसत्-तत्त्व, अमृतमृत्युतत्त्व एवं संशयतत्त्व को उपस्थापित किया है। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. के. ई. धरणीधरण ने इसी प्रकरण पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने व्याख्यान में सृष्टिकारक प्रत्येक तत्त्व पर विचार करते हुए कहा कि सृष्टि वाक् तत्त्व से होती है, यह व्याकरणदर्शन का सिद्धान्त है। श्रुति में ‘वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे’ यह वाक्य प्राप्त होता है। विश्व की सृष्टि में ब्रह्म मूल कारण है। वह ब्रह्म तत्त्व एक है अथवा अनेक। इस पर विचार करते हुए ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने कहा कि सृष्टि से पूर्व ब्रह्म तत्त्व ही था । (‘ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् एकमेव’, बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१०) ब्रह्म तत्त्व एक ही है, अनेक नहीं है। ‘तथा चेदं ब्रह्मैकमेवेति सिद्धान्तः।’ (शारीरकविमर्श, पृ.१०, हिन्दी अनुवाद संस्करण) दूसरे प्रकरण का नाम शास्त्र-ब्रह्म-मीमांसा है। यहाँ शास्त्र का अर्थ श्रुति है। ब्रह्म का ज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं हो सकता क्योंकि इन्द्रिय ब्रह्म को जानने में समर्थ नहीं है। अनुमान से ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष पर ही होता है। उपमान से ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता क्योंकि ब्रह्म के समान कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। शब्द से भी ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता है क्योंकि शब्द में भी ब्रह्म को बतलाने की शक्ति नहीं है। फिर भी शब्द ब्रह्म का संकेत मात्र करता है । वैदिकविज्ञान में शास्त्र का अर्थ वेद है और वह वेद ही ब्रह्म है। उस पर विचार करना यह शास्त्र-ब्रह्म-मीमांसा का अर्थ होता है। इस प्रकरण में छः उपशीर्षक हैं।इसी प्रकरण को आधार बना कर प्रो. के. गणपति भट्ट, ने अपने व्याख्यान में कहा कि ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने ब्रह्म के दो स्वरूपों का प्रतिपादन किया है। एक आत्मब्रह्म है और दूसरा शास्त्रब्रह्म है। ग्रन्थकार पं. ओझा जी ने बृहदारण्यक उपनिषद् के आधार पर आत्मा को वाङ्मय, प्राणमय और मनोमय इन तीन रूपों में व्याख्यायित किया है तथा इसी के आधार पर आत्मा के तीन भावों को विविध रूपों में उद्धाटित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। आत्मा के तीन भाव हैं- शान्तभाव, वीरभाव और पशुभाव । आत्मा के तीन तन्त्र हैं। यहाँ तन्त्र का अर्थ स्वरूप से है। आत्मा के तीन स्वरूप हैं- ज्ञान, कर्म और अर्थ। इन तीन तन्त्रों के द्योतक तीन वीर्य हैं। वीर्य का अर्थ सामर्थ्य होता है। आत्मा के तीन वीर्य हैं- ब्रह्म, क्षत्र और विट्। ब्रह्मवीर्य का अर्थ करते हुए ग्रन्थकार ने कहा है कि ज्ञान के उदय का जो साधन प्रतिभा अथवा तेज है वही ब्रह्म वीर्य है- ‘तत्र ज्ञानोदयौपयिकं वर्चोलक्षणं ब्रह्मवीर्यम्।’( शारीरकविमर्श, पृ. २७) कर्म की प्राप्ति उत्साह से होती है, यही क्षत्रवीर्य है। धन की प्राप्ति संग्रह से होती है, यह वीड्वीर्य है-“कर्मोदयौपयिकमित्साहलक्षणं क्षत्रवीर्यम्,वित्तसंचयौपयिकं संग्रहलक्षणं विड्वीर्यम्।” (वही) तीसरे प्रकरण का नाम वेदतत्त्वनिरुक्ति है। जिस प्रकार अद्वैतवेदान्त में ब्रह्म से सृष्टि होती है, न्याय-वैशेषिक में परमाणु से सृष्टि होती है, सांख्य-योग में प्रकृति और पुरुष से सृष्टि होती है। उसी प्रकार वैदिकविज्ञान में वेदतत्त्व से सृष्टि होती है। इस प्रकरण में कुल ग्यारह उपशीर्षक हैं। इसी प्रकरण को आधार बना कर डॉ. रामचन्द्र शर्मा, सह आचार्य, न्यायविभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वद्यालय, नई दिल्ली ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया । उन्होंने विषय को स्पष्ट करते हुए कहा कि ग्रन्थकार ने वेदतत्त्व को अनेक रूपों में व्याख्यायित किया है। वाक् तत्त्व से सृष्टि होती है। वाक् तत्त्व मन और प्राण से हमेशा युक्त रहता है। सत्य स्वरूप वाली वाक् से ये (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) वेद हैं। ये वेद आत्मा की ही महिमा हैं। यह संपूर्ण सृष्टि ब्रह्म ही है। (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)। प्रजापति ने इस विश्व को तीन रूपों में विभक्त किया है- ज्ञान, क्रिया और अर्थ। (१) ज्ञान के तीन रूप हैं- आनन्द, विज्ञान और मन। इस ज्ञान का जो प्रधान पुरुष है, वही चिदात्मा कहलाता है। इस चिदात्मा का जो महिमा है, वह मनोमय वेद है। (२) कर्म भी तीन प्रकार के हैं- मन, प्राण और वाक्। कर्म के प्रधान पुरुष को कर्मात्मा कहा जाता है। कर्मात्मा की महिमा प्राणमय वेद है। (३) अर्थ तीन प्रकार के हैं- वाक्, अप् और अग्नि। इस का जो प्रधान पुरुष है, वह भूतात्मा कहलाता है। इस भूतात्मा की महिमा वाङ्मय वेद है। ‘त्रयी वा एष विद्या तपति’ इस श्रुति वाक्य की अभिनव व्याख्या यहाँ प्राप्त होता है। पाँचवें प्रकरण का नाम वेदशाखाविभाग है। वेद की कितनी शाखायें हैं। इस विषय पर यहाँ चर्चा की गयी है। विज्ञानवेद और शास्त्रवेद इन दोनों वेद के समान रूप से विभाग होने पर वेद के एक हजार एक सौ इकतीस शाखाएँ हैं। इस प्रकरण के आधार पर व्याख्यान करते हुए डॉ. देवेश कुमार मिश्र ने बतलया कि वैदिकविज्ञान में ऋत और सत्य ये दो सृष्टिप्रतिपादक सैद्धान्तिक तत्त्व हैं। ऋत का अर्थ शून्य और सत्य का अर्थ पूर्ण होता है। आप (जल) तत्त्व ऋत और…

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