राष्ट्रीय संगोष्ठी–इन्द्रविजय-सीमाप्रसङ्गविमर्श
प्रतिवेदन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० मार्च २०२४ को एक अन्तर्जालीयराष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। इस संगोष्ठी में पण्डित मधुसूदन ओझा प्रणीत इन्द्रविजय नामकग्रन्थ के पहले परिच्छेद के सीमाप्रसङ्ग पर विद्वानों द्वारा व्याख्यान के माध्यम से विचार-विमर्श कियागया। सीमाप्रसङ्ग के अन्तर्गत ग्रन्थकार ने विविध शास्त्रीय सन्दर्भों का उल्लेख करते हुए प्राचीन भारत कीपूर्वी एवं पश्चिमी सीमा का निर्धारण करते हुए इस सन्दर्भ में १४ प्रमाणों के आधार पर सीमाविषयक अनेकतथ्यों को उद्घाटित किया है। यह संगोष्ठी प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई जिसमें प्रो. महानन्द झा, आचार्य,न्याय विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, प्रो. वैद्यनाथ मिश्र,विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा एवं डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी, सहायकआचार्य, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विविद्यालय, गोरखपुर नेसीमाप्रसङ्ग के अन्तर्गत विवेचित १४ प्रमाणों में से निर्धारित एक-एक प्रमाण को आधार बनाकर व्याख्यानप्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय, जमशेदपुर केकुलपति प्रो. गंगाधर पण्डा ने अपने उद्बोधन में सीमाप्रसङ्ग के अन्तर्गत विवेचित विषय-वस्तु को उद्घाटितकरते हुए १४ प्रमाणों का संक्षेप में उल्लेख कर उनका सारतत्त्व प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इन १४प्रमाणों के अन्तर्गत ग्रन्थकार ने विविध वैदिक एवं पौराणिक सन्दर्भों के आधार पर भारत की पूर्वी एवंपश्चिमी सीमा का निर्धारण किया है। इसके विभाजक रेखा के रूप में उन्होंने सिन्धु नदी का उल्लेख किया है।पूर्व में चीन समुद्र से लेकर पश्चिम में लाल समुद्र पर्यन्त भारतवर्ष की जो सीमा बतलायी गयी है उसी कोओझाजी ने १४ प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया है- “चीनसमुद्रारब्धं रक्तसमुद्रन्तमिष्यते यदिदम्।भारतवर्षं तत्र च हेतव एते प्रदर्श्यन्ते ॥”, इन्द्रविजय, पृ.२२ डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी ने सीमाप्रसंग के छ्ठे प्रमाण को बतलाते हुए कहा कि इस प्रमाण के द्वारा यहप्रतिपादित किया गया है कि पौराणिक भुवनकोश में भारतवर्ष के अवान्तर देशों की गणना के क्रम में उत्तरीदेशों के रूप में गांधारमद्र-पारद-पह्लव-कम्बोज-शक-यवन आदि देशों का उल्लेख करने से प्राचीन काल मेंइन देशों का भारतीय होना सिद्ध होता है। बृहत्संहिता के ‘भारतवर्ष में मध्य से पूर्व आदि दिशाओं मेंविभाजित देश’ नामक शीर्षक के अन्तर्गत हैहय-पारद-शक आदि देशों का तथा पश्चिमोत्तर दिशा में तुखार-मद्र आदि देशों का उल्लेख भी उस समय में इन देशों का भारतीय होना प्रमाणित करता है-“पौराणिके भुवनकोशे भरतवर्षीयावान्तरदेश-परिगणनासूदीच्यदेशतया गान्धार-मद्र-पारद-पह्लव-कम्बोज-शक-यवनादिदेशानामुल्लेखादेषां देशानां पुरायुगेभारतीयत्वमासीदित्युपगम्यते। बृहत्संहितायां च ‘भारतवर्षे मध्यात्प्रागादिविभाजिता देशाः। इति प्रतिज्ञाय’ पश्चिमायां हैहय-पारद-शकदेशानांपश्चिमोत्तरस्यां च तुखारमद्रादिदेशानामाख्यानात् तत्कालेप्येषां भारतवर्षीयत्वंसुप्रसिद्धमिति गम्यते।”, वही, पृ.१०० प्रो. वैद्यनाथ मिश्र ने सीमाप्रसंग के दशवें प्रमाण पर व्याख्यान देते हुए बतलाया कि इस प्रमाण केअनुसार श्रौतग्रन्थ, ब्राह्मण एवं मत्स्य पुराण में त्रिपुर आख्यान का वर्णन आया है। इस आख्यान द्वारासामदेश स्थित एक नगरी का पृथिवीलोक पर स्थित होना सिद्ध होता है। इस आख्यान द्वारा तीन पुरों कीस्थिति का पता चलता है। सर्वप्रथम मय नाम के असुर ने त्रिपुर की रचना की और उसके बाद अन्य लोगोंने भी त्रिपुरों की रचना की। “यतोऽथवा सर्वत्र एवं पूर्वं मयासुरेण त्रिपुरं प्रणीतम्।ख्यातस्ततोऽभूत् त्रिपुरोऽसौ पश्चात्परे त्रीणि पुराणि चक्रुः॥” , वही, पृ. १२० प्रो. महानन्द झा ने सीमाप्रसङ्ग में भारतवर्ष के पूर्व एवं पश्चिम भागों के रूप में विभाजित करनेवाली सिन्धु नदी एवं एवं सिन्धु के कारण ही सिन्धुस्तान शब्द से हिन्दुस्तान शब्द को परिभाषित करते हुएआर्यावर्त शब्द पर भी विचार विमर्श किया। उन्होंने भारत् की सीमा के विषय में श्रीमद्भागवतपुराण केअनेक उद्धरणों का भी उल्लेख करते हुए पं. मधुसूदन ओझा के द्वारा विवेचित सीमाविषयक १४ प्रमाणोंको तर्कसम्मत बतलाया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि धर्मशास्त्र के अष्टादशविवाद पदों में एकविवादपद है सीमाविवाद । जब दो देशों, नगरों, ग्रामों एवं घरों आदि में सीमा से सम्बन्धित कोई विवादहोता है तो उस पर हम किस प्रकार से निर्णय लें, उनका क्या समुचित समाधान हो, इन सब समस्याओं कासमाधान इस सीमाविवाद में किया जाता है। देश के लोगों में भारतवर्ष के पूर्वी एवं पश्चिमी सीमा को लेकरअनेक प्रकार की समस्याएँ रहती हैं, इसलिए पं. ओझाजी ने इस सीमा प्रसङ्ग को विस्तार के साथप्रमाणपुरस्सर इस ग्रन्थ में प्रतिपादन किया है। इस सीमा प्रसङ्ग का आधार पुराणों के आख्यान, उपाख्यानआदि हैं जिनमें भारतवर्ष की भौगोलिक स्वरूप के बारे में बतलाया गया है। उन्हीं पुराण वाक्यों कोसिद्धान्त मानकर ओझाजी ने इस ग्रन्थ में भारतवर्ष की पूर्वी एवं पश्चिमी सीमाओं का प्रतिपादन उन्हेंप्रमाण के रूप में किया है। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वेदविभाग के शोधछात्र श्री प्रवीण कोइराला के द्वारा प्रस्तुत वैदिक मङ्गलाचरण हुआ। संगोष्ठी का सञ्चालनश्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने तथा धन्यवादज्ञापनडॉ. लक्ष्मीकान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में देश के विविध प्रदेशों के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयोंएवं शोधसंस्थानों के आचार्यों, शोधच्छात्रों एवं संस्कृतानुरागी विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग लेते हुए इसराष्ट्रीय संगोष्ठी को सफल बनाया। वैदिक शान्तिपाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ।