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पण्डित मोतीलाल शास्त्री स्मारक व्याख्यान/ऋषिसम्मान समारोह


प्रतिवेदन

बीसवीं शताब्दी के वैदिकविज्ञान के महान् शास्त्रचिन्तक पण्डित मोतीलाल शास्त्री संस्कृत जगत् में सुविख्यात
हैं। उन्होंने राष्ट्रभाषा में एक सौ से अधिक ग्रन्थों को लिख कर एक अभिनव दृष्टि विद्वानों के सामने रखा है।
उनकी व्याख्या शैली सर्वथा नयी है। वैदिकविज्ञान में पारिभाषिक शब्दों का विश्लेषण महत्त्वपूर्ण है। इसकी
व्याख्या पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने की है। इस वर्ष २८ सितम्बर २०२६, सोमवार को श्रीलाल बहादुर
शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के वाचस्पति सभागार में यह स्मारक व्याख्यान सुसंपन्न हुआ है।



श्रीशंकर शिक्षायतन अपने स्थापना दिवस के समारोह के अन्तर्गत प्रतिवर्ष इस व्याख्यान का आयोजन करता है। इस वर्ष के व्याख्यान समारोह में दो महत्त्वपूर्ण आयोजन हुए। प्रथम, प्रख्यात संस्कृत विद्वान डॉ. श्रीकृष्ण सेमवाल को ऋषि सम्मान प्रदान किया गया। द्वितीय, पण्डित मधुसूदन ओझा की दो पुस्तकों के अंग्रेजी अनुवादों का लोकार्पण किया गया। ‘The Other Theory of Creation’ (सृष्टि का अन्य सिद्धान्त) पण्डित मधुसूदन ओझा के ग्रन्थ अपरवाद का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद है, जबकि ‘The Universe in Space’ उनके ग्रन्थ व्योमवाद का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद है। समारोह में उपस्थित विशिष्ट अतिथियों ने इन दोनों पुस्तकों का लोकार्पण किया। पण्डित मधुसूदन ओझा के इन दोनों ग्रन्थों का प्रकाशन दिल्ली के सारस्वतम् प्रकाशन ने किया है।

मुख्य व्याख्यान वाराणसी के वसन्त कन्या महाविद्यालय के संस्कृत विभाग की पूर्व आचार्या प्रो. कमला पाण्डेय ने प्रस्तुत किया। उनके व्याख्यान का विषय ‘छन्दःसमीक्षा का स्वरूप’ था।

उन्होंने कहा, “इस ग्रन्थ की गहनता और इसके मूल विषय की गम्भीरता का मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। ओझाजी का यह ग्रन्थ एक ऐसे महासागर के समान है, जिसे गहन चिन्तन-मनन की नौका से ही पार किया जा सकता है। छन्दःसमीक्षा के इस महासागर में प्रवेश करने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और वैदिक ज्ञान की पतवार, दोनों ही अनिवार्य हैं।

अब वह समय आ गया है, जब संस्कृत को हाशिये पर नहीं रखा जाना चाहिए। आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को इन संस्कृत ग्रन्थों का भी अध्ययन करना चाहिए। जब वे संस्कृत का अध्ययन अपने विषय के साथ करेंगे, तब उन्हें ज्ञात होगा कि पण्डित मधुसूदन ओझा ने मेरुप्रस्तार की व्याख्या करते हुए किस प्रकार गुरु और लघु को ० और १ के रूप में निरूपित किया है। संस्कृत की संरचना को एक संगणकीय भाषा के रूप में समझने का कार्य आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों द्वारा ही आगे बढ़ाया जाएगा।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्य विद्याध्ययन संस्थान के
आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्लः महोदय ने समागत अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पण्डित
मोतीलाल शास्त्री जी के जन्मदिवस को आधार बना कर प्रतिवर्ष वार्षिक उत्सव के रूप में यह व्याख्यान शृंखला
चलती है। पण्डित ऋषि कुमार मिश्र जी ने वेदविद्या के विकास, प्रचार, संवर्धन और ज्ञानसंरक्षण के लिए

श्रीशंकर शिक्षायतन की स्थापना २०००ई. में की थी। श्रीशंकर शिक्षायतन संस्कृत के लिए समर्पित जीवन वाले
आचार्य डॉ. श्रीकृष्ण सेमवाल जी को ऋषिसम्मान से सम्मानित करेगा ।

प्रो. भारतेन्दु पाण्डेय महोदयः आचार्य एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कार्यक्रम
की आध्यक्षता की । उन्होंने कहाँ कि पण्डित मधुसूदन ओझा महोदय की यह छन्दःसमीक्षा नामक ग्रन्थ अत्यन्त
सारगर्भित पाण्डित्यपूर्ण है। इस ग्रन्थ को बार-बार पढने पढाने से ही संस्कृत के जनमानस में, छात्र और
अध्यापकों को यह विषय बुद्धि में स्थिर होगा।

डॉ. श्रीकृष्ण सेमवाल जी को ऋषिसम्मान से सम्मानित किया गया। श्रीशंकर शिक्षायतन संस्कृतक्षेत्र में
समर्पित जीवन वाले विद्वानों को यह सम्मान प्रदान किया जाता है। श्रीसेमवाल जी ‘दिल्ली संस्कृत-अकादमी’ के
सचिव के रूप में संस्कृत संवर्धन के लिए अनेक कार्यक्रमों को समायोजित किया था। उन्होंने अपने उद्बोधन में
कहा कि मैं श्रीशंकर शिक्षायतन को नहीं जानता हूँ । फिर भी श्रीशिक्षायतन मुझे सम्मान प्रदान कर
गौरवान्वित अनुभव किया है।

प्रो. सच्चिदानन्द मिश्र जी, सदस्य सचिव, भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद्, दिल्ली ने कहा कि हमलोगों के
लिए छन्द का ज्ञान आवश्यक है । प्रायः कक्षा में बीस छन्दों को ही छात्र को पढाया जाता है ।गुरु और लघु के
आधार पर वर्ण का विचार होता है। परन्तु छन्दःसमीक्षा नामक ग्रन्थ विस्तार से वैदिक छन्दों का एवं
लौकिक छन्दों का विचार किया गया है।

व्याख्यान के प्रारम्भ में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. ओमकार
शैलूकर
जी ने वैदिक मङ्गलाचरण को एवं प्रो. महानन्द झा जी ने लौकिक मङ्गलाचरण को प्रस्तुत किया ।
कार्यक्रम का सञ्चालन जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सह आचार्य डॉ.
धनञ्जय मणि त्रिपाठी
ने किया । श्रीशंकर शिक्षायतन के शोध अधिकारी डॉ. लक्ष्मीकन्त विमल समागात
विद्वानों का धन्यवाद ज्ञापन किया।इस व्याख्यान में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के अनेक
विद्वानों ने, शिक्षकों ने, शोधच्छात्रों ने तथा संस्कृत में अनुराग रखने वाले लोगों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण
कर के कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना अप्रतिम योगदान किया।

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