प्रतिवेदन
श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ अक्टूम्बर २०२६, शनिवार को सायंकाल
५-७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री
प्रणीत शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘पात्रीनिर्णेजनं पुरोडाश-सम्पादन’ नामक प्रकरण पर विचार
किया गया। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।
डॉ. विश्व बन्धु, सह आचार्य, संस्कृत विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय , त्रिपुरा ने अपने निर्धारित विषय
पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि शतपथब्राह्मण का यह वचन है ‘ चतुर्धा विहितो वा अग्नेः अग्निः आस’। इस
मन्त्र की व्याख्या में हिन्दी विज्ञान भाष्य ने अभिनव दृष्टि दी है। पुरुष अग्नि है, प्रकृति अग्नि है, विराट् अग्नि है
और संवत्सर अग्नि है। अक्षर अग्नि को ही एव पुरुष अग्नि कहा गया है, यह अग्नि का पहला रूप है और यही
विश्व का सञ्चालक भी है। दूससी वस्तु स्वरूप को बनाने वाली अग्नि प्राकृत अग्नि है। तीसरी अग्नि हिरण्यगर्भ है।
इसी हिरण्य नामक अग्नि में ऋषिप्राण नामक आर्षेय अग्नि रहता है जो विराट् अग्नि है। चौथा अग्नि चयनयज्ञ की
अधिष्ठात्री सौर अग्नि है, यही सौर अग्नि संवत्सर नामक अग्नि है। (शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य पृ. ७१०)
डॉ. सत्येन्द्र कुमार यादव, सहायक आचार्य, वेदविभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
ने पात्रीनिर्णेजन विषय पर अपना विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भाष्य में पशु आलम्भन विज्ञान में पशुहिंसा
का समाधान तार्किक रूप में प्राप्त होता है। जिस प्रकार मानव में चेतना रहती है उसी प्रकार पशु शरीर में भी
चेतना रहती है। इस से यह सिद्ध होता है कि जहाँ जहाँ पशु का आलम्भन का वर्णन है वहाँ वहाँ पशु का स्पर्श
करना अर्थ ही आलम्भन का तात्पर्य है। (वही पृ. ७३७)
डॉ. अखिलेश कुमार मिश्र, सहायक आचार्य, वेदविभाग, महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल
ने कहा कि इस प्रसंग में पाँच पशुओं का वर्णन प्राप्त होता है। इन पशुओं में तीसरा पशु गौ है। गौतत्त्व की
उत्पत्ति का स्थान परमेष्ठी है। परमेष्ठीलोक ही सोमलोक है। परमेष्ठीदेवता का नाम विष्णु है। सौम्यप्राण गौतत्त्व
की आत्मा है। सौर अग्नि गौतत्त्व का शरीर है। सूर्य के एक हजार रश्मियाँ हैं। इस दृष्टि से गौतत्त्व की संख्या एक
हजार हो जाती है। एक हजार भाग में विभक्त गौ तत्त्व के ३३३ भाग पार्थिव वसुदेवता से संबद्ध हैं। ३३३ भाग
आन्तरिक्ष्य रुद्रदेवत से संबद्धा हैं, ३३३ भाग द्युस्थानीय सूर्य के साथ संबद्ध हैं।
एक बची हुई संख्या कामगवी नाम से सुविख्यात है।
पुराण की भाषा में इसी कामगवी को कामधेनु शब्द से व्यवहार होता है। ।
(वही पृ. ७५३)
डॉ. सत्यव्रत पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेदविभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, महाराजा श्रीरणवीर
सिंह परिसर, जम्मू ने पात्रीनिर्णेजन में आप्त्या होती है, इस पर अपना व्याख्यान दिया। यह आप्त्या तीन प्रकार
की होती है- एकता, द्विता और त्रिता । प्रातःसवन अग्नि प्रमुख वसु देवताओं के लिए एकता नामक आप्त्या होती
है। माध्यन्दिन सवन वायु प्रमुख रुद्रा देवता के लिए द्विता नाम वाली आप्त्या होती है। सायंसवन इन्द्र प्रमुख
आदित्य देवताओं के लिए त्रिता नाम वाली आप्त्या होती है। (वही पृ. ७२४)
प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे । उन्होंने कहा कि वैदिकविज्ञान में अग्नितत्त्व, वायुतत्त्व और
आदित्यतत्त्व की प्रधानता है। यह एक ही अग्नि अपने घन-तरल-विरल अवस्था के कारण ये तीनों तत्त्व बन जाते
हैं। इन तीनों तत्त्वों के एकरूप ही अग्नि है। (वही पृ. ७२४)
श्रीमान् उमेश शास्त्री, वैदिक, वेदविभाग, महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल ने सस्वर
वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोधसंस्थान के
शोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल और महाविद्याल
के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल