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राष्ट्रीय संगोष्ठी -शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : उदकमिश्रित-पुरोडाश-सम्पादन विमर्श (शृंखला-९)


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३० सितम्बर २०२६, बुधवार को सायंकाल ५-
७ बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘उदकमिश्रित-पुरोडाश-सम्पादन’ नामक प्रकरण पर विचार किया
गया। इस ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।

आचार्य पण्डित सञ्जय पाण्डेय, प्रख्यात वैदिक, अयोध्या, ने कहा कि यज्ञ में जल के लिए भिन्न भिन्न
पात्र होते हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं- प्रोक्षणीपात्र, मदयन्तीपात्र, स्रवन्तीपात्र, उपसर्जनीपात्र। वह पानी जो
ओषधि में प्रविष्ट होकर उन्हें रसयुक्त बनाता, वह उपसर्जनी कहलाता है। (शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य पृ. ६७०)

डॉ. अरुण कुमार मिश्र, सह आचार्य, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि वैदिक
विज्ञान में अग्नि तत्त्व और जल तत्त्व ये प्रधान हैं। जल का ही दूसरा नाम सोम है। ‘अग्निषोमाभ्यां जगत्’, यह
सिद्धान्त अत्यन्त प्रसिद्ध है। अग्नि का प्रतिष्ठा और आधार जल तत्त्व ही है। अग्नि में जल को डाल कर अग्नि
वाष्परूप में ऊपर जाता है। उपसर्जनी के जल के पिष्टद्रव्य के साथ संबन्ध है। इसमें यजुःश्रुति प्रमाण है। ‘समाप
ओषधिभिः, समोषधयो रसेन’। (वही पृ. ६७१)

डॉ. विश्वेश वाग्मी, सह आचार्य, संस्कृत विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, उत्तरखण्ड ने
कहा कि यव और गेहूँ ये अन्न औषधिपद से व्यवहार किया जाता है। ओषधि पृथ्वी है, जल हमलोगों का अन्न है।
इन दोनों के मिलन से ही हमारा शरीर बनता है। ‘तस्मादोषधयः केवल्यः खादिता न धिन्वन्ति, ओषदय उ
हापां रसः, तस्मादापः पीता केवल्यो न धिन्वन्ति, यदैवोभय्यः संसृष्टा भवन्ति अथैव धिन्वन्ति। (वही पृ. ६७४)
डॉ. नितिन आर्य, सहायक आचार्य, व्याकरण विभाग, संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने
कहा कि जो वस्तु केन्द्रभाग से परिधि की ओर फैलने वाला मनोगर्भित प्राण नाम वाला गोतत्त्व ही ‘अभिप्लव’
है।(वही पृ. ६७७)

प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, आचार्य, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय, नई दिल्ली कार्यक्रम के अध्यक्ष थे । उन्होंने कहाँ कि वैदिकविज्ञान में पाँच प्रकार से तत्त्वों का
वर्गीकरण है। स्वयम्भूमण्डल का वाक् ब्रह्म है, परमेष्ठीमण्डल का वाक् विष्णु है, सूर्यमण्डल का वाक् इन्द्र है,
पृथ्वीमण्डल का वाक् अग्नि है, चन्द्रमण्डल का वाक् सोम है। इस प्रकार से विविध विषयों की व्याख्या
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य प्राप्त होता है। (वही पृ. ६९७)


डॉ. कमलराज उपाध्याय, प्राध्यापक महर्षि गौतम संगवेद विद्यालय, बिहार के वैदिकबटुकों ने
सामूहिक सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक
शोधसंस्थान के शोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल
और महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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