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राष्ट्रीय संगोष्ठी शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य : पुरोडाशसम्पादन विमर्श -शृंखला-७


प्रतिवेदन

श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक शोध संस्थान द्वारा दिनांक ३१ जुलाई २०२६, शुक्रवार को सायंकाल ५-७
बजे तक अन्तर्जालीय माध्यम से राष्ट्रीय संगोष्ठी का समायोजन किया गया। पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत
शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य नामक ग्रन्थ के ‘पुरोडाशसम्पादन कर्म’ नामक प्रकरण पर विचार किया गया। इस
ब्राह्मणग्रन्थ के विविध विषयों को आधार बना कर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी समायोजित की गई थी।


प्रो. सुन्दर नारायण झा, आचार्य, वेद विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली ने कहा कि स्वयम्भू परमेष्ठी सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी ये पाँच सृष्टि के विभाग करने वाले तत्त्व हैं।
उनमें स्वयम्भू और् परमेष्ठी इन दोनों का अमृत स्वरूप है, सूर्य का अमृत और मर्त्य स्वरूप है तथा चन्द्रमा और
पृथ्वी इन दोनों का मर्त्य स्वरूप है। तस्मात् यत् किञ्च अर्वाचीनम् आदित्यात् सर्वं तन्मृत्युना अप्तम् । (इस प्रकार
जो कुछ आदित्य से नवीन है, वह सब मृत्यु के द्वारा प्राप्त होता है), इस शतपथब्राह्मण के वचनों के आधार पर,
पृथ्वी एवं चन्द्रमा का स्वरूप निर्धारित किया गया है। क्योंकि आदित्य से नवी ये दोनों तत्त्व हैं। ‘निवेशयन्
अमृतं न मर्त्यं च’ इस मन्त्र के आधार पर सूर्य की व्याख्या की गयी है। (शतपथब्राह्मण पृ. ५४०)


डॉ. दुर्गा शरण रथ, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीरघुनाथकीर्ति
परिसर ने कहा कि इस भाष्य में विविध विषय हैं। प्रस्तुत प्रकरण में त्रित्ववाद की व्याख्या की गयी है। ‘त्रिः
सत्या वा देवता’ इस सिद्धान्त के अनुसार त्रित्ववाद की सिद्धि होती है। ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद ये तीन
वेद त्रित्ववाद में आते हैं। देवता भी त्रित्ववाद में समाहित हैं, लौकिकव्यवहार में भी वैदिकमङ्ल का पाठ तीन
बार किया जाता है। त्रित्ववाद के अनेक उदाहरण शातपथब्राह्मण हिन्दीविज्ञान भाष्य में देखने को मिलता है।
जैसे-

पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक- ये तीन त्रैलोक्य हैं
अग्नि, वायु आदित्य- ये तीन देवता हैं।
वसु रुद्र आदित्य- ये तीन अधिदेवता हैं।

इस प्रकार से आठ उदाहरणों का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। (शतपथब्राह्मण पृ. ५११)

डॉ. सुधाकर कुमार पाण्डेय, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर ने
कहा कि प्रस्तुत प्रकरण में प्रजापति का महत्त्वपूर्ण वर्णन किया गया है । इस प्रजापति के सत्यप्रजापति और यज्ञप्रजापति
ये दो रूप हैं कृष्णमृग के प्रकरण में इसका वर्णन आता है। सत्यप्रजापति मैलिक तत्त्व है। यज्ञप्रजापति यौगिक तत्त्व है।
सत्यप्रजापति ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है। (शतपथब्राह्मण पृ. ४६७)


डॉ. निशान्त मिश्र, सहायक आचार्य, वेद विभाग, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, एकलव्य परिसर ने
अपने व्याख्यान के क्रम में कहा कि यह संपूर्ण सृष्टि पाँच भागों में विभक्त है। उनमें स्वयम्भू पहला है, परमेष्ठी
दूसरा है, सूर्य तीसरा है, चन्द्रमा चौथा है और पृथ्वी पाँचवीं है। इस विभाग के कारण ही पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्य
बल्शा कहा जाता है। जिसकी एका शाखा स्वयम्भू आदि हैं। स्वयम्भू और परमेष्ठी ये दोनों मिलकर परमधाम
कहलाते हैं, सूर्य को मध्यमधाम कहा जाता है, चन्द्रमा और पृथ्वी ये दोनों मिलकर ही अवरधाम कहलाते हैं।
(शतपथब्राह्मण पृ. ५७२)


केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीरघुनाथकीर्ति परिसर के वेदविभाग के सहायक आचार्य डॉ. अमन्द
मिश्र
ने सस्वर वैदिक मङ्गलाचरण का पाठ किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्रीशंकर शिक्षायतन वैदिक
शोधसंस्थान के शोधाधिकारी डॉ. लक्ष्मी कान्त विमल ने किया। इस कार्यक्रम में अनेक प्रान्तों के विश्वविद्याल
और महाविद्याल के आचार्य, शोधछात्र, संस्कृत विद्या मे रुचि रखने वाले विद्वानों ने उत्साह पूर्वक भाग ग्रहण
कर गोष्ठी को सफल बनाया।

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